_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** बिजनौर जनपद
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** नहटौर कस्बा –
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नहटौर के चांदपुर चुंगी चौराहे पर बिकने वाले समोसे और गोलगप्पे बहुत प्रसिद्ध है। पूरे नगर में यहां के समोसे और गोलगप्पो की धूम है।
यहां साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। इस कारण हर कोई यहां आकर समोसे और गोलगप्पे खाने का आनंद लेना चाहता है। इस स्थान को खानपान का खास ठिकाना बनाने के लिए कड़ी मेहनत की गई। ग्राहकों की विश्वसनीयता बनाने के लिए उनके मन के मुताबिक शुद्ध और अच्छी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। आलू को अच्छी तरह मलने के बाद धनिए का छौंक लगाया जाता है। इसके बाद हल्की आंच पर चलाते हुए भूना जाता है। बाद में इसमें भुनी हुई मिर्च तोड़कर मिलाते हैं। काला नमक, सादा नमक, उबली हुई मटर डालते हैं। थोड़ी देर बाद हल्का गरम मसाला मिलाया जाता है। समोसों को पूरे ध्यान से तला जाता है। यह सारी प्रक्रिया ग्राहकों के सामने ही होती है कभी भी पहले से तैयार चीजों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

गोलगप्पे में उसके पानी का अहम रोल होता है। हर दिन गोलगप्पे का पानी अपने तरीके से तैयार किया जाता है। भीगी हुई इमली को पीसकर उसमें गुड मिलाते हैं। बाद में उसमें काला नमक और सादा नमक, हल्का गरम मसाला मिलाकर घी और जीरे का छौंक लगाया जाता है। फिर इसमें इनो डाला जाता है। जिससे इसका स्वाद हल्का तीखा हो जाता है। इस सब के बाद पुदीना, हरी मिर्च, हरा धनिया बारीक पीसकर इस पानी में मिलाया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद गोलगप्पे का बेहतर स्वाद वाला पानी तैयार होता है। यह पेट के लिए भी फायदेमंद होता है।

इन्हीं सब बातों से यह ग्राहकों का पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है।

** नजीबाबाद कस्बा –

यहां की लाजवाब सोहन पापड़ी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली है। नजीबाबाद के लोगों में जैसे परंपरा सी बन गई है कि जब कभी वे अपने दूरदराज के रिश्तेदारों-परिचितों के यहां जाते हैं या उनके यहां वे मेहमानदारी में आते हैं उस समय यहां की सोहनपापड़ी खरीदकर देना नहीं भूलते हैं।

जी हां नजीबाबाद के इंदर की सोहनपापड़ी का स्वाद ही कुछ ऐसा है कि एक बार जिसने इसका स्वाद चख लिया वह इसका मुरीद हुए बिना नहीं रहता। कड़ी मेहनत से तैयार की जाने वाली सोहनपापड़ी मुंह में रखते ही घुलकर इसके लाजवाब स्वाद को खाने वाला कभी नहीं भूलता है।

बाहर के रहने वाले सरकारी अधिकारी या कर्मचारी जो जिला बिजनौर में नौकरी करते हैं। वे भी छुट्टियों में अपने घर-परिवार जाते हैं तब यहां से अपने घरों और नाते- रिश्तेदारों में बांटने के लिए सोहन पापड़ी ले जाना नहीं भूलते।
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*** बागपत जनपद
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** बिनौली गांव –

बिनौली का कलाकंद मशहूर है। यहां के मशहूर हलवाई के कलाकंद की मिठाई देस ही नहीं विदेशों में भी जानी जाती है। यहां से विदेशों में जाकर बस गए लोग जब कभी यहां आते हैं तो बिनौली के कलाकंद को अपने साथ ले जाना नहीं भूलते। यहां का कलाकंद दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब आदि प्रांतों में भी पसंद किया जाता है और एजेंटों के माध्यम से वहां भेजा जाता है। कलाकंद के अलावा यहां की गोंद की बर्फी भी बहुत पसंद की जाती है।

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** अग्रवाल मंडी टटीरी –

अग्रवाल मंडी टटीरी की बालूशाही के स्वाद का अपना अलग है रुतबा है। कुछ दशक पहले शुरू हुआ स्वाद का यह सफर अभी भी जारी है। यहां की बनी बालूशाही का अपना अलग ही स्वाद है। हर रोज सुबह से ही इस बालूशाही के स्वाद के प्रशंसकों की भीड़ दुकान पर लगी रहती है। किसी समय इस कस्बे में एक या दो दुकान बालूशाही की हुआ करती थी। लेकिन अब इस मिठाई के व्यवसाय का सफर आसपास के नगरों से लेकर कई राज्यों में फैल चुका है। इसका स्वाद इतना मशहूर हुआ कि अन्य नगरों के रहने वालों ने भी इस तरह से बनाई गई बालूशाही को अपने नगर के नाम से ही जोड़ दिया।

इस छोटे से कस्बे को बालूशाही के स्वाद ने एक अलग ही पहचान दी है इसका स्वाद लेने के लिए यहां अपने देश से ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं। जो इसे एक बार खा लेता है वह इसके स्वाद को भूल नहीं पाता है।

इस बालूशाही का स्वाद जितना अनूठा है इसे बनाने की प्रक्रिया उतनी ही कठिन है। शुद्ध देसी घी के साथ इसको बनाने में पूरा दिन लग जाता है। हर दिन नई चासनी और नई खुशबू के साथ इसके स्वाद का आनंद लेने वालों की कमी नहीं है।

यहां की बालूशाही का स्वाद बागपत जनपद से निकल कर आसपास के नगरों शामली, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद शाहदरा साथ साथ दिल्ली उत्तराखंड हरियाणा और गुजरात आदि राज्यों तक प्रसिद्ध है।
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*** सहारनपुर जनपद
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** सहारनपुर नगर –

सहारनपुर का हलवाई हट्टा जिसका नाम सुनते ही इसके बारे में जानने वाले लोगों के मुंह में पानी आ जाता है। अपने नाम के अनुसार यह सहारनपुर का खाने- पीने की चीजों का एक प्रमुख बाजार है। मिठाई दूध – रबड़ी, पूरी – कचोरी कि यहां प्रसिद्ध दुकान हैं। चटपटी चाट खानी है या गोलगप्पे का स्वाद लेना है हलवाई हट्टा सहारनपुर की मशहूर जगह है। हरियाणा उत्तराखंड के लोग जब इधर से होकर जाते हैं चाट का स्वाद लेने यहां भी आते हैं। हलवाई हट्टा की मशहूर सुहाली, मट्ठी – पकवान व पंचरत्न नमकीन की दुकान । यहां की बनी सुहाली( फिक्की मठरी) इतनी मशहूर है की विदेशों में बसे लोग भी किसे अपने साथ ले जाते हैं। यहां के रहने वाले अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को तीज – त्यौहारों के अवसर पर इसे मिठाई के साथ अवश्य  भेजते हैं।
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*** गाजियाबाद जनपद
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** मोदी नगर   –

भारत की प्रसिद्ध शिकंजी

मोदीनगर की शिकंजी, ब्रेड पनीर पकोड़ा और शिकंजी मसाला बहुत प्रसिद्ध है।

यहां के प्रसिद्ध शिकंजी वालों के होर्डिंग राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर मोदीनगर के दोनों ओर कई किमी पहले से ही नजर आने शुरू हो जाते हैं।

मोदीनगर की शिकंजी को इतना टेस्टी बनाता है मोदीनगर की शिकंजी का सीक्रेट  क्रंची मसाला। मोदीनगर के शिकंजी मसाले की विशेषता ही है जो यहां की शिकंजी को भारत भर में प्रसिद्ध बनाता है।

मोदीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है यह व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग है इस मार्ग पर पर्यटकों और यात्रियों की भारी आवाजाही होती है किसलिए मोदीनगर में यहां की प्रसिद्ध शिकंजी के स्वाद का आनंद लेने वालों की हर समय भीड़ लगी रहती है।

मोदीनगर का शिकंजी मसाला भी बहुत प्रसिद्ध है यह भी अब दूर-दूर तक पैकेट में आम दुकानों पर उपलब्ध हो जाता है।
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*** मुजफ्फरनगर जनपद
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** बुढ़ाना कस्बा

* बुढाना के सांवरिया की बालूशाही –

एक शताब्दी से भी अधिक समय हो गया जब से सांवरिया की बालूशाही का स्वाद लोगों की जुबान पर बसा हुआ है।

यहां के लोग बताते हैं कि सांवरिया की बालूशाही पुराने जमाने से प्रसिद्ध है। वे बताते हैं कि अंग्रेजों के राज के समय में भी सांवरिया की बालूशाही का वैसा ही नाम था जैसे कि आजकल के समय में।

सांवरिया की बालूशाही मिठाई का स्वाद वे बड़े बूढ़े भी ले सकते हैं जिनके मुंह में दांत नहीं है। क्योंकि इस दुकान पर तैयार की गई बालूशाही इतनी भुरभुरी व नरम होती है जो होठों से भी टूट जाती है।

सांवरिया की मिठाई की दुकान की यह मशहूर मिठाई है। लोग इसे इतना पसंद करते हैं कि कहीं बाहर जा रहे हो तो अपने साथ पैक करा कर जरूर ले जाते हैं। शुद्ध देसी घी से बनी इस बालूशाही मिठाई की विशेषता है कि एक माह तक भी यह खराब नहीं होती है।

आसपास के जिलों के और कई नगरों जैसे मवाना, लोनी, मेरठ आदि में भी इसी प्रकार की बालूशाही बनाई जाती है लेकिन वह मिठाई बालूशाही नहीं मक्खनबड़ा नाम की मिठाई होती है। मक्खनबड़ा और बालूशाही मिठाई में अंतर यह होता है कि मक्खनबड़ा मिठाई को दही डालकर तैयार किया जाता है। जबकि यहां इस दुकान पर तैयार होने वाली बालूशाही में दही का प्रयोग नहीं किया जाता। तैयार होने के बाद सांवरिया की दुकान की बालूशाही इतनी नरम होती है कि होठों से भी टूट जाती है।

इस दुकान की विशेषता है कि इस मिठाई को बहुत कम
मार्जिन पर बेचते हैं।

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** छपार गांव

* छपार का पेड़ा –

जनपद मुजफ्फरनगर के एनएच-58 पर बसा छपार गांव यहां बनने वाले स्वादिष्ट पेड़ों के कारण देश विदेश में प्रसिद्ध होने से इसकी अपनी अलग पहचान बनी हुई है।

छपार गांव में हाईवे पर ही बनी हुई बहुत पुरानी लच्छी सेठ की छोटी सी हलवाई की दुकान प्रसिद्ध है।

इस दुकान पर पूरी शुद्धता के साथ स्वयं के ही द्वारा बनाए हुए पेड़े आम और खास लोगों में बहुत पसंद किए जाते हैं। इस मार्ग से हरिद्वार तीर्थ आने जाने वाले बहुत लोग इनकी दुकान पर रुक कर पेड़े खरीदते हैं।
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** सीकरी गांव (भोपा कस्बा)

* सीकरी का पेड़ा –

भोपा व भोकरहेड़ी कस्बों के पास स्थित सीकरी गांव का पेड़ा अपना अलग रंग और स्वाद रखता है। इस गांव का पेड़ा आसपास के क्षेत्र के साथ-साथ देश विदेशों में भी सीकरी के पेड़े के नाम से प्रसिद्ध है।

सीकरी गांव मुजफ्फरनगर जनपद के भोपा गांव से 12 किलोमीटर दूर बसा हुआ है और यह गांव सीकरी गांव के पेड़े के नाम से जाना जाता है।

इस गांव में पेड़ा बेचने वाली कई प्रसिद्ध दुकानें हैं। इस क्षेत्र मे जब भी कोई राजनीतिक व्यक्ति या सरकारी अधिकारी आता है तब यहां के लोग उन्हें सीकरी के पेड़े ही भेंट करते हैं।

सीकरी गांव में किसी भी वर्ग का घर हो उसके यहां जब भी कोई मेहमान आता है तो उसकी खातिरदारी के लिए सबसे पहले पेड़ा ही परोसा जाता है इसके बाद ही कोई अन्य चीज खाने-पीने के लिए दी जाती है।

सीकरी गांव में लगने वाले सालाना उर्स के अवसर पर दूरदराज से आने वाला हर श्रद्धालु सीकरी के पेड़े अपने साथ ले जाना नहीं भूलता।

** तेवड़ा गांव (थाना ककरौली)

* तेवड़ा गांव का कलाकंद –

तेवड़ा गांव का कलाकंद अलग ही स्वाद लिए होता है। इस कलाकंद को तैयार करने का यहां के हलवाइयों के पास गजब का हुनर है। बहुत ही कम दाम पर कलाकंद को बेचना यहां के हलवाइयों का कमाल ही है। बहुत ही कम दाम पर दूध को खरीद कर यहां के हलवाई कलाकंद तैयार करते हैं। बाद में थोक के भाव बहुत ही कम दाम पर बेचते हैं। आसपास के जनपदों के नगरों व कस्बों में हलवाइयों की दुकानों पर जाकर तेवड़ा गांव का यही कलाकंद महंगे दामों पर बिकता है।

तेवड़ा गांव के कुछ लोग कलाकंद बनाने के धंधे में लगे हैं। वह सस्ता मगर स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ तैयार करते हैं, जिससे उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है।

पहले-पहल गांव में एक या दो दुकानों पर स्थानीय ग्रामीणों की जरूरत के अनुसार कलाकंद बनाया जाता था। लेकिन अब यह व्यवसाय विस्तार ले चुका है।

यहां के कलाकंद बनाने वाले लोगों का दावा है कि जिस लागत से वे ऐसी मिठाई तैयार कर सकते हैं जिसे निर्यात भी किया जा सकता है। यहां के कई हलवाइयों का दावा है कि उनका यह कलाकंद दूसरी मिठाइयों की तरह पाचन क्रिया को खराब नहीं करता है।

तेवड़ा गांव के कलाकंद का सस्ता होने पर लोग कहते हैं कि इतना सस्ता कलाकंद नकली मावे से ही बनाना संभव है। इस आलोचना का यहां के हलवाई पूरी तरह से खंडन करते हैं और कहते हैं कि तेवड़ा में कलाकंद के अलावा मावा भी तैयार किया जाता है लेकिन कलाकंद तैयार करने वाले हलवाई मावा तैयार करने वाले हलवाई उसे कोई वास्ता नहीं रखते।

तेवड़ा गांव में प्रतिदिन कई कुंतल कलाकंद तैयार होता है और स्थानीय गांव के अलावा मुजफ्फरनगर बिजनौर तक के हलवाइयों की दुकानों पर इसकी प्रतिदिन आपूर्ति की जाती है।

* तेवड़ा गांव के कलाकंद और सीकरी गांव के पेड़े को यदि ठीक प्रकार से प्रोत्साहन मिले तो निश्चित रूप से यह कारोबार तो पनपेगा ही, साथ ही स्थानीय दुग्ध उत्पादों को भी उनके दूध के अच्छे दाम मिलेंगे।

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