_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सनातन धर्म की पावन तीर्थ नगरी हरिद्वार गंगा का जागृत तीर्थ है। पौराणिक काल में हरिद्वार में गंगा जी के तट पर सप्त ऋषियों के आश्रम थे। भागीरथ जब गंगा जी को अपने पूर्वजों को उद्धार के लिए ले जा रहे थे तो गंगा जी ऋषियों के आश्रमों से होकर सात अलग-अलग धाराओं में बंटकर बहने लगी। तभी से हरिद्वार के इस क्षेत्र को सप्त सरोवर कहा जाता है। इसी सप्त सरोवर क्षेत्र में गंगा जी के तट पर विशाल विस्तृत क्षेत्र में अद्भुत अलौकिक भगवान व्यास जी का विशाल मंदिर स्थापित है। इस मंदिर की स्थापना वाराणसी के काशी मठ संस्थान के द्वारा कराई गई है।

अति रमणीक हरे-भरे उद्यानों से युक्त विशाल प्रांगण में अष्टकोण आयताकार में बने इस मंदिर का मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व दिशा में गंगा जी के तट पर है। इस अनूठे भव्य दक्षिण भारतीय शैली में बने मंदिर का शिखर ९४ फुट ऊंचाई वाला है।

यह विश्व में एकमात्र अनुपम सुंदर मंदिर है जहां महर्षि वेदव्यास एवं उनके पुत्र श्री शुकदेव मुनि की पूजा की जाती है। इनके साथ-साथ यहां महर्षि वेदव्यास के चार प्रमुख शिष्य ऋग्वेदाचार्य श्री पैल मुनि, यजुर्वेदाचार्य श्री वैशम्पायन मुनि,सामवेदाचार्य श्री जैमिनी मुनि और अथर्ववेदाचार्य श्री सुमन्तु मुनि की भी पूजा की जाती है। सप्त सरोवर में बने इस मंदिर में सप्त ऋषियों की भी पूजा की जाती है।

इस विशाल एवं दर्शनीय मंदिर की स्थापना करने वाले वाराणसी के श्री काशी मठ संस्थान के आराध्य देवता भगवान श्री वेद व्यास हैं। इस संस्थान के श्रीमत केशवेन्द्र तीर्थ स्वामी जी बहुत पहुंचे हुए तपस्वी और ज्ञानी थे। सन १९६५ में श्री स्वामी जी वाराणसी में पंचगंगा तीर्थ स्नान एवं प्रार्थना कर रहे थे उस समय उन पर भगवान प्रसन्न हुए और उन्हें गंगा जी से महर्षि वेद व्यास जी की प्रतिमा उपलब्ध कराई। उसी समय से श्री व्यास भगवान इस संस्थान के प्रधान देवता के रूप में अनुग्रह करते आए हैं।

गंगा जी से प्राप्त प्रतिमा के अनुरूप ही काले ग्रेनाइट पत्थर की बनी भगवान वेदव्यास की आकर्षक प्रतिमा हरिद्वार के इस मंदिर में स्थापित की गई है।

पुराणों के अनुसार भगवान वेदव्यास भगवान विष्णु के अवतार हैं। वेदव्यास जी ने ही वेदों का चार भागों में वर्गीकरण किया और ब्रह्मसूत्र की रचना के द्वारा इस जगत में ज्ञान प्रदान किया। श्रीमद् भागवत व श्री महाभारत पुराण सहित अष्टादश पुराणों के द्वारा भगवान श्री हरि की भक्ति की धारा इस लोक में प्रवाहित की।

व्यास मंदिर के गर्भ गृह के मध्य में भगवान वेद व्यास जी महाराज की पूर्वाभिमुख अति दिव्य प्रतिमा ऊंचे चांदी के मेहराबदार सिंहासन पर विराजित है। इसी मंदिर में गंगा जी का एक दुर्लभ एवं अद्भुत मंदिर स्थापित है।

मंदिर में विधि विधान से त्रिकाल पूजा की जाती है। इस मंदिर में मुख्य पर्व प्रतिष्ठा दिवस फाल्गुन चतुर्दशी में अति भव्य रुप में मनाया जाता है। इस उत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त शामिल होते हैं।

यहां के विशाल प्रांगण में आधुनिक सुख सुविधाओं से युक्त अनेक भवन निर्मित है। मंदिर की संस्था के द्वारा गौशाला, यात्री निवास, अन्न क्षेत्र आदि संचालित होते हैं। यह सुंदर मंदिर हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों को बरबस ही अपनी तरफ खींच लेता है।

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