_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

_____________________________________________

वेदों और पुराणों में कुंभ माहात्म्य का विशद रूप से वर्णन किया गया है।

तन्येति पुमान योगेश मृतत्वाम कल्पते

देवा नमन्ति तत्रस्थानम तथा रंका धनाधियान।

अर्थात जो मनुष्य कुंभ महापर्व में सम्मिलित होकर स्नान करते हैं वे संसार बंधन से मुक्त हो जाते हैं, उनके आगे देवगण उसी प्रकार झुकते हैं जिस प्रकार धनवान मनुष्य के आगे निर्धन झुक जाते हैं।

अमृत बिंदु के छलकने से पृथ्वी पर चार कुंभ होते हैं। इस श्लोक में स्पष्ट बताया गया है –

गंगाद्वारे प्रयागेच,धारा गोदावरी तटे ।

कुंभख्यौ दिव्य योगोदयं प्रोचते शकरादिभे।।

अर्थात हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन व नासिक चारों कुंभ क्षेत्र हैं। इसी प्रकार कहा गया है –

कुंभ राशि गते जीवे तथा मेषे गते रवौ ।

गंगाद्वारे कृते स्नान पुनरावृत्ति सर्जन ।।

अर्थात कुंभ राशि पर गुरु तथा मेष राशि पर सूर्य स्थित हो तो हरिद्वार में स्नान करने से जन्म मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।

हरिद्वार में कुंभ महापर्व के अवसर पर स्नान करने के महत्व के बारे में बताया गया है –

योअस्मिन्क्षेत्रे नर: स्नायात्कुंभगेल्ये अजगेरवौ,

सतुस्याद्वावपति: साक्षात्प्रभाकर इवापर: ।

अर्थात जो हरिद्वार क्षेत्र में कुंभ राशिस्थ सूर्य वाले योग में स्नान करता है वह साक्षात बृहस्पति हो जाता है तथा साक्षात सूर्य बन जाता है।

कुंभ के महत्व के विषय में शास्त्रों में बताया गया है –

सहम्रं कार्तिकों स्नानं माघे स्नानं शतानिन्च,

बैशाखे नर्मदा कोटि कुंभ स्नानेन तत्फलम।

एक हजार कार्तिक स्नान, एक सौ माघ स्नान और नर्मदा में एक करोड़ वैशाख स्नान के बराबर कुंभ स्नान का फल मिलता है।

अश्वमेघ सहस्रतानि वाजपेय शतनि च,

लक्ष प्रदक्षिणा प्रथ्व्या: कुंभ स्नानेन तत्फलम्।

एक हजार अश्वमेघ यज्ञ, एक सौ वाजपेय यज्ञ और पृथ्वी की एक लाख परिक्रमा के पुण्य के बराबर अकेला कुंभ स्नान का फल है।

कुंभ महापर्व के संबंध में वेदों में अनेक मंत्र मिलते हैं –

कुम्भो वनिष्टुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योनियां गर्भो अन्त:।

प्लाशिव् र्यक्त: शतधार‌उत्सो दुहे न कुम्भी स्वधां पितृभ्य:।।

– शुक्लयजुर्वेद

‘कुंभ पर्व सत्कर्म के द्वारा मनुष्य को इहलोक में शारीरिक सुख देने वाला और जन्मांतरों में उत्कृष्ट सुखों को देने वाला है।

जघान वृत्रं स्वधितिर्वनेव रुरोज पुरो अरदन्न सिंधून्।

विभेद गिरिं नवभिन्न कुम्भभागा इंद्रो अकृणुत स्वयुग्भि:।।

कुंभ पर्व में जाने वाला प्राणी स्वयं दान होमादि सत्कर्मों के फलस्वरुप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जिस प्रकार गंगा नदी अपने तटों को काटते हुए प्रवाहित होती है, उसी तरह कुंभ (महापर्व स्नान ) मनुष्य के पूर्व संचित कर्मों से प्राप्त हुए शारीरिक पाप नष्ट कर देता है और नए कच्चे घड़े के समान मेघों को फोड़कर जगत में सुवृष्टि (पुण्यराशि) प्रदान करता है।

श्रद्धे कुनबे विमुं‌चन्ति ज्ञेयं पाप निषूदनम

श्राद्धयं त‌त्राक्षयं प्रोक्तं जभ्य होम तपांसि च।

कुंभ में जप-तप होम हवन आदि तथा श्राद्ध कर्म करने से पापों का क्षय होता है।

पूर्ण: कुम्भोsधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्त:।

स गया विश्वा भुवनानि प्रत्यङ कालं तमाहु: परमे व्योमन।।

– ( अथर्ववेद )

हे संतगण! पूर्ण कुंभ बारह वर्ष के बाद आया करता है, जिसे हम अनेक बार तीर्थों में देखा करते हैं। कुंभ उस समय को कहते हैं जो आकाश में ग्रह राशि आदि के योग से होता है।

अथर्ववेद में उल्लेख है –

चतुर: कुम्भांश्चतुर्धाददामि क्षीरेण पूर्णान् उदकेन दध्नौ ।

एतास्तवाधारा उपयन्तु सर्वा:।।

वेद की इस ऋचा में ब्रह्मा जी के द्वारा संबोधित करते हुए कहा गया है कि हे मनुष्य मैं तुम्हें समस्त सुखों को प्रदान करने वाले चार कुंभ प्रदान करता हूं, जो पृथ्वी को धन्य धान्य से परिपूर्ण करने वाले हैं।

यजुर्वेद में भी कुंभ को एहिक और पारलौकिक सुख प्रदान करने वाला कहा गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *