हस्तिनापुर एक पौराणिक नगर है। इस स्थान का न केवल पुरातात्विक महत्व है बल्कि प्रकृति के अत्यधिक निकट होने के कारण पर्यटन के दृष्टिकोण से भी यह लोगों को अपनी और खींचता है।
प्राचीन काल में यह नगर कौरवों व पांडवों की राजधानी के रूप में जाना जाता था लेकिन समय के साथ साथ महाभारत कालीन हस्तिनापुर नगर पतित पावनी गंगा नदी के तट पर मिट्टी के ऊंचे टीलों में दबकर लुप्त होता चला गया।

यहां दूर तक फैले ऊंचे ऊंचे टीलों और भग्नावषों की एक लंबी श्रंखला सहज ही देखी जा सकती है। इन को छूती हुई गंगा की पुरानी धारा बूढ़ी गंगा प्रवाहमान है।

हस्तिनापुर के टीले अपने गर्भ में भारतीय संस्कृति और इतिहास के अमूल्य साक्ष्य संजोए हुए हैं।

प्राचीन काल में गंगा की मुख्य धारा हस्तिनापुर नगर से सटका रही बहा करती थी। लेकिन अब गंगा की मुख्यधारा यहां से काफी दूर चली गई है।

महऋषि वेदव्यास ने हस्तिनापुर नगर और महाभारत युद्ध का अपने ग्रंथ महाभारत पुरानी विस्तार से किया है। इनसे जुड़ी अतीत की स्मृतियां भारतीय जनमानस के मन में आज भी सजीव है।

देश व विश्व को साहित्य,दर्शन, धर्म,राजनीति,अर्थशास्त्र, चिकित्सा, ज्योतिष, कला, शिल्प और मानव जाति को शिष्टाचार सिखाने वाली, शासन एवं भारतीय लोक निर्माण मनीषा, सार्वभौम चक्रवर्ती वैभव की आदित्य छाप छोड़ने वाली हस्तिनापुर नगरी।

हस्तिनापुर नगरी को देवी – देवताओं, महर्षियों एवं धर्म व कर्मवीरों की चिरस्मरणीय परंपरा का गौरव हासिल है।

चार बार समय के गर्भ में समा चुकी हस्तिनापुर नगरी की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक पहचान आज भी कायम है।
काल के थपेड़ों से नुकसान के बावजूद इतिहासकारों को यहां मिले प्राचीन धरोहरें निर्विवाद इसकी प्राचीनता को बताती है ।

हस्तिनापुर नगरी आज भी मानव जाति के इतिहास का ऐसा नीव का पत्थर है जिसका नाम विश्व के प्रमुख कालक्रमो में अतीत के पन्नों पर अंकित है।

कुरु संस्कृति के अध्ययन के मूल स्रोत वेद, पुराण, ब्राह्मण ग्रंथ, अरण्यकोपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथों से लेकर वर्तमान साहित्य तक इसका उल्लेख है।

यह वही हस्तिनापुर नगर है जिसने हमें ऐसा इतिहास दिया जिसे हम कभी भुला नहीं पाएंगे। कौरवों और पांडवों की जो घटनाएं हस्तिनापुर में घटी हैं वह तो अधिकतर लोग जानते ही हैं लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं की यह नगर उससे भी बहुत पुराना है।

ऐसा माना जाता है कि कौरवों और पांडवों के बीच हुए महाभारत युद्ध को जीतने के बाद ३६ वर्ष व आठ माह कलयुग की शुरुआत होने तक पांडवों ने यहां शासन किया।

पुराणों व कई प्राचीन ग्रंथों में हस्तिनापुर का उल्लेख है।
इन ग्रंथों में इस नगर का कई नामों के द्वारा उल्लेख किया गया है जैसे-गजनगर, हत्थिनापुर, हस्तीनागपुर, गजपुर, हस्तिनापुर आदि।

द्वापर युग के प्रधान राजनीतिक घटनाओं से संबद्ध कुरु राज्य का केंद्र हस्तिनापुर का नाम तत्कालीन सर्वाधिक प्रभावशाली नगर केंद्रों में आता है

वैदिक काल के बाद के काल खंड में भारत के जिन बड़े नगरों का अस्तित्व प्रकाश में आया था उनमें प्रमुख काशी व अयोध्या के साथ हस्तिनापुर का ही उल्लेख होता है।
हस्तिनापुर का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी है।

महाभारत पुराण व अन्य पुराणों और प्राचीन ग्रंथों आदि में हस्तिनापुर की स्थापना और इसके राजवंश का विस्तार से वर्णन किया गया है।

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार वैवस्वत मनु की पुत्री इला का विवाह सोम के पुत्र बुध से हुआ था। इन दोनों के संयोग से पुरूरवा उत्पन्न हुए। पुरूरवा ऐल की चौथी पीढ़ी में ययाति
हुए । ययाति के पांच पुत्र हुए जिनसे इस वंश की पांच शाखाएं चली। इनमें पुरु सबसे अधिक प्रतापी राजा थे। पुरू ने पौरव राज्य की स्थापना की तथा हस्तिनापुर को इसकी राजधानी बनाया।

हस्तिनापुर के पुरूवंशी राजा दुष्यंत ने शकुंतला से गांधर्व विवाह किया था। दुष्यंत शकुंतला के पुत्र महाराजा भरत हुए जनश्रुतियो के अनुसार इन्हीं महाराजा भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत वर्ष पड़ा। महाकवि कालिदास ने इसी प्रसंग पर अपनी अमर कृति -अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना की।
भरत की छठी पीढ़ी में हस्तिन हुए। हास्तिन बड़े योग्य शासक थे। हस्तिनापुर की समृद्धि में इनका बड़ा योगदान रहा।
माना जाता है कि इन्हीं के नाम पर इस नगर का नाम हस्तिनापुर पड़ा। लेकिन हस्तिन की नई पीढ़ी पूर्व भी हस्तिनापुर नाम प्रचलित था और हास्तिन के पूर्वज भरत और दुष्यंत आदि के राज्य काल में भी हस्तिनापुर कुरु प्रदेश की राजधानी थी। संभवतः इस क्षेत्र में हाथियों के बाहुल्य था इसलिए इस नगर को गजपुर व हस्तिनापुर कहकर पुकारा जाता था।

बाद में अर्जुन के पौत्र महाराजा परीक्षित ने यहां शासन किया।
कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र के महा युद्ध के बाद हस्तिनापुर का पतन आरंभ हुआ। गंगा नदी यह अपमान न सह सकी और गंगा में बाढ़ आ गई और जब बाढ़ समाप्त हुई तब गंगा हस्तिनापुर को अपनी धाराओं से अलग कर चुकी थी।

यह नगर वैदिक संस्कृति का प्रधान केंद्र माना जाता था। लेकिन बाढ़ की विनाश लीला व अन्य विपत्तियों के कारण राजा नीचक्षु अपने पूर्वजों का यह स्थान छोड़कर कौशांबी जाने को विवश हुए।

पुरातात्विक उत्खनन से भी इस बात की पुष्टि हुई है। बार बार आने वाली बाढ़ से यह नगरी कई बार उजाड़ चुकी है।

स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस पौराणिक ऐतिहासिक नगर के महत्व को समझते हुए इसे आबाद करने के प्रत्यन किए। इसके लिए उन्होंने 1952 में हस्तिनापुर सेल लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर नए हस्तिनापुर के निर्माण के लिए नींव रखी।

अनेक विपदाओं की मारी हस्तिनापुर नगरी आज भी विकास की बाट देख रही है।
आज हस्तिनापुर की 50 किलोमीटर परिधि के भी सभी लोग यह नहीं जानते कि महाभारत का हस्तिनापुर नगर उनके इतने निकट है।

००० ००० ००० ००० ०००

जैन धर्म में हस्तिनापुर का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।
हस्तिनापुर जैन धर्म के तीन भगवंतो भगवान शांतिनाथ, भगवान कुन्थुनाथ व भगवान अरहनाथ की जन्मभूमि के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।।

_________ ___________

बौद्ध ग्रंथों में भी कुरु जनपद और उसकी राजधानी हस्तिनापुर के बारे में बड़ी महत्ता के साथ उल्लेख मिलता है।

जातक ग्रंथों में भी कुरु जनपद का वर्णन किया गया है।

_________ ___________

हस्तिनापुर नगरी के पास ही सैफपुर गांव में सिख धर्म के पंज प्यारे भाई धर्म सिंह जी की जन्म स्थली है। सैफपुर में भाई धर्म सिंह जी की स्मृति में एक विशाल गुरुद्वारे और पवित्र सरोवर का निर्माण किया गया है। यहां प्रतिवर्ष सिखों का जोड़ मेला लगता है जिसमें देश विदेश के लाखों श्रद्धालु आते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *