__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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थाना भवन कस्बा अपनी अलौकिक – चमत्कारिक शक्तियों एवं धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरे देश ही नहीं विदेशों में भी जाना जाता है। थाना भवन के नाम के बारे में भी कई किंवदंतियां प्रचलित हैं।
थानाभवन कस्बा बहुत प्राचीन है। महाभारत काल से इसका संबंध जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसको पांच पांडवों में से एक भीम ने बसाया था। भीम ने इसका नाम भीम का थाना रखा था। यह भी बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन से पहले यह एक विशाल नगर था। चारों ओर दीवारों से घिरा यह नगर पूरी तरह सुरक्षित था। चारों दिशाओं में नगर से बाहर आने जाने के लिए चार दरवाजे बने हुए थे। कहा जाता है कि उस समय यहां पर एक नवाब का शासन था। अंग्रेज इसको अपने अधीन करना चाहते थे और उन्होंने यहां पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना को भेजा। नवाब की सेना ने कासी के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया। लेकिन नवाब की सेना के पास रसद और हथियारों की कमी थी। उसकी फौज अंग्रेजी फौज का सामना नहीं कर पाई। अंग्रेजों की सेना ने तोपों से गोले बरसा कर इस नगर को ध्वस्त कर दिया। थाना भवन कस्बे के पश्चिम में स्थापित जस्सोवाला मंदिर अंग्रेजों के हमले का गवाह है। जहां अंग्रेजों की तोपों के गोले गिरे थे वहां इस समय भी गहरे तालाब हैं। जो जस्सूवाला मंदिर में स्नान के लिए प्रयोग हो रहे हैं।

पांडवों के द्वारा बसाया गया भीम का थाना यह स्थान भू गर्भ से देवी भगवती की प्रतिमा सहित मंदिर के अवतरण से यह कस्बा थाना भवन के नाम से जाना जाने लगा।

यहां के पुराने लोग बताते हैं कि इस कस्बे में एक बार एक टीले की खुदाई की जा रही थी। उसी समय मां भगवती का यह मंदिर टीले की खुदाई के दौरान निकला। जिसमें देवी भगवती की प्रतिमा, भगवान शंकर महादेव का शिवलिंग एवं ठाकुर जी की तीन इंच ऊंची प्रतिमा विराजमान थी। इस दिव्य और अलौकिक चमत्कार से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। यह भी बताया जाता है कि शिवालिक पर्वतमाला पर वास करने वाली माता शाकुंभरी देवी मंदिर के ऊपर यहां से गया हुआ झंडा ही सबसे पहले चढ़ाया जाता है। यह मंदिर कस्बे के बीचो-बीच स्थित है और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

सिद्ध पीठ श्री कचोरी नाथ मंदिर –

थाना भवन के कचोरी नाथ मंदिर में स्थापित भगवान शंकर महादेव की पिंडी भूगर्भ से अवतरित है। यह शिव पिंडी अपनी चमत्कारिक विविधता के लिए प्रसिद्ध है श्रावण मास में विशेष रूप से श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना पूरी होने की कामना लेकर जलाभिषेक करने आते हैं।

कहा जाता है कि प्राचीन समय में भगवान शंकर की पिंडी जमीन से अवतरित हुई थी। उस समय यहां भंडारे का आयोजन किया गया था। बड़े बुजुर्गों के कहे अनुसार भंडारे के समय घी समाप्त होने पर यहां के महंत ने मंदिर के सामने के ब्रह्म तालाब से जल मंगा कर कढ़ाई में डलवाया था और उसी में पूरियां तलवाई गई थी। उसी समय से इस मंदिर का नाम कचोरी नाथ शिव मंदिर पड़ गया। कुछ वर्ष पूर्व इस शिव पिंडी पर एक नाग नागिन का जोड़ा भी प्रगट हुआ था। जिसके हजारों श्रद्धालुओं ने दर्शन किए थे। कुछ समय बाद यह नाग नागिन का जोड़ा अदृश्य हो गया था। श्री कचोरी नाथ शिव मंदिर क्षेत्र में अगाध आस्था, श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है।

श्री कचोरी नाथ शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में यह भी किवदंती है कि वर्षों पूर्व इस शिवलिंग की लंबाई नापने का प्रयास किया गया था। लेकिन काफी गहराई तक खुदाई कराने पर भी यहां स्थापित शिवलिंग का कोई अंतिम सिरा नहीं दिखाई दे रहा था। इस कारण आगे खुदाई को रोक दिया गया। आज भी इस शिवलिंग की पिंडी पर खुदाई के निशान मौजूद है। कहते तो यह भी हैं कि यह शिवलिंग समय-समय पर अपने आकार में बदलाव करता रहता है। यह कभी छोटा नजर आता है तो कभी बड़े स्वरूप में इस शिवलिंग के दर्शन होते हैं। श्रावण मास में यहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। श्रावण मास की महाशिवरात्रि के दिन बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार से पैदल कांवड़ लाकर इस शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को भी यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा अर्चना एवं जलाभिषेक के लिए आते हैं।

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थाना भवन के प्रसिद्ध मंदिर दयाल आश्रम में हर वर्ष वार्षिक उत्सव मनाया जाता।
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पंचतीर्थि आश्रम महान संत अमर देव की कर्म स्थली है।
यहां वेद पूजा के साथ प्रतिवर्ष वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। जिसमें देश के दूरदराज से हजारों श्रद्धालु भाग लेने आते हैं।
वार्षिक समारोह के अवसर पर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों स्वामी जी के शिष्य भाग लेते हैं। इस समारोह के अवसर पर सैकड़ों पंजाबी समाज के लड़के- लड़कियों के रिश्ते भी यहां तय किए जाते हैं। वार्षिक समारोह में कई धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
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थाना भवन में स्थित श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर भी श्रद्धा का केंद्र है।
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सिद्ध पीठ लाला नरहरी दास बाबा रामनाथ मंदिर श्रद्धा का केंद्र है।
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थाना भवन के शुगर मिल परिसर में दिल्ली के अक्षरधाम की तर्ज पर भव्य मंदिर में भगवान श्री राम दरबार और अन्य देवगणों की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं।
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जसू वाला मंदिर –

इस पुरातन मंदिर की थानाभवन के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका है। मंदिर नगर के अंतिम छोर पर पश्चिम दिशा में सैकड़ों बीघा भूमि पर फैले एक विशाल परिसर में स्थित है। मंदिर की बनावट और बड़े बुजुर्गों के कहे अनुसार यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। यहां निर्मित छह मंदिरों में से भगवान शिव का मंदिर सबसे प्राचीन है। कहते हैं कि मराठा सेना के सरदार ने इस स्थान की महत्ता को समझते हुए मंदिर की उत्तर दिशा में एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया। इसके अलावा माता शाकंभरी देवी भैरव बाबा, बालाजी के साथ साथ एक और शिव मंदिर का निर्माण भी हुआ है। शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग में एक बड़ा छेद है। जो मंदिर की ऐतिहासिकता और प्राचीनता को दर्शाता है।
इस मंदिर में एक बहुत बड़ा तालाब है। तालाब के पास एक सती मंदिर स्थित है। यह तालाब आकर्षण का केंद्र है। इस सुंदर स्थान पर आकर मनुष्य का हृदय स्वतः ही खिल उठता है। मंदिर में स्थित कुएं का जल सभी ऋतु में मीठा रहता है।

मान्यता है कि जो दंपत्ति जोड़े सहित यहां श्रावण माह में सच्चे मन से प्राचीन शिवलिंग का जलाभिषेक और पूजा अर्चना करते हैं। उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

मराठों ने थानाभवन के समीप गांव गोसगढ़ के शासक पर हमला करके जीत प्राप्त की और यहां रहना शुरू कर दिया। उस समय यहां एक छोटा सा मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि इस स्थान पर अति प्राचीन शिवलिंग पहले से ही मौजूद था।

मंदिर क्षेत्र में सांपों का बसेरा बहुत पहले से ही रहा है। समय बीतने के साथ मराठों को यह स्थान छोड़ना पड़ा और स्थानीय लोगों का ध्यान भी इस मंदिर की ओर से हट गया। लेकिन बाद में अंग्रेज शासन के दौरान यहां के कुछ जागरूक लोगों का ध्यान पुणः इस ओर गया और उन्होंने फिर से इस मंदिर में पूजा अर्चना शुरू की।

सन १९५१ में आयोजित रुद्र महायज्ञ के आयोजन में यहां एक अद्भुत घटना उस समय घटी जब यज्ञ के पहले दिन यज्ञ के प्रधान देवता के आहवान पर मंत्रोचार के द्वारा अग्नि को प्रज्ज्वलित किया जा रहा था। तो उस समय सती मंदिर के पास आम के पेड़ों पर और पास की जमीन पर भी एक से दो फुट लंबाई के लाल मुंह वाले सर्प विचरण करने लगे।

सर्पों के इस दृश्य को देखकर यज्ञ में आए श्रद्धालु घबरा गए और यज्ञ में आए धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज एवं शंकराचार्य कृष्ण बोध आश्रम जी महाराज से सर्पों से बचाने के लिए प्रार्थना की। तब आचार्य के द्वारा यज्ञ स्थल पर आकर मंत्रोच्चारण करने से सर्प तालाब में चले गए थे। यह भी बताया जाता है की इस नगर और आसपास के स्थानों पर फैली महामारी के निवारण के लिए इस यज्ञ को कराने से वह महामारी भी बाद में लुप्त हो गई थी। इसके पश्चात यहां पर दूसरे यज्ञ का आयोजन सन १९६१ तथा तीसरे यज्ञ का आयोजन १९७५ में विशाल पैमाने पर किया गया था।

जस्सू वाला मंदिर परिसर मैं स्थित काले मुंह वाले महात्मा की समाधि की धूल जानवरों की बीमारी को हर्ती है।

मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में सर्पों के होने के बावजूद मंदिर परिसर और उसके आसपास सर्प के काटने की कोई भी घटना नहीं घटती है।

सन 1857 की क्रांति के बाद थानाभवन के लाला धन प्रकाश के पूर्वज लाला जस्सूमल का नाम मंदिर से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि मंदिर परिसर की भूमि उनकी थी इसलिए मंदिर का नाम उनके नाम पर जस्सूवाला मंदिर पड़ा।

समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार और नव निर्माण का कार्य कराया जाता रहता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मन मंदिर की भव्यता और सुंदरता को देखकर खिल उठता है तथा यहां से जाने का उनका मन नहीं करता है। समय-समय पर यहां धार्मिक कार्यक्रमों एवं कथाओं का आयोजन होता रहता है।

शारदीय नवरात्रों में मंदिर के तालाब पर देवी की सांझी सलाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। चैत्र माह में रामनवमी पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है। थानाभवन में स्थित इस सिद्ध पीठ मंदिर की बहुत मान्यता है।

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थाना भवन नगर के पश्चिम में विश्वविख्यात मौलाना अशरफ अली थानवी की मजार है। देश-विदेश से लोग यहां सजदा करने के लिए आते हैं।

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