_________________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और पौराणिक धार्मिक स्थल के बारे में – – –

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दून घाटी का संबंध महाभारत कालीन गुरु द्रोणाचार्य से है। इसी से इसको द्रोण घाटी भी कहा जाता है। यहां गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी और यह स्थान उनकी ससुराल भी है।

इसी घाटी में गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्य राजकुमारों को शस्त्र विद्या का ज्ञान देते थे। दून घाटी युद्धाभ्यास के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसी आधार पर अंग्रेजों ने भी यहां भारतीय सैन्य अकादमी की स्थापना की थी और इसके मुख्य द्वार का नाम गुरु द्रोणाचार्य की स्मृति में द्रोण द्वार रखा।

दून घाटी में गुरु द्रोणाचार्य ने तीन स्थानों पर भगवान शंकर की आराधना करके कई अमोघ शस्त्रों को प्राप्त किया था और उन्हें चलाने की विद्या सीखी थी। यहीं कौरवों के कुलगुरु कृपाचार्य ने अपनी बहन कृपी से उनका विवाह किया था। इस तरह यह स्थान गुरु द्रोणाचार्य की कर्मस्थली और ससुराल दोनों है।

महाभारत काल में इस स्थान पर घना वन हुआ करता था। आज के समय में देहरादून में जो स्थान सहस्रधारा के नाम से जाना जाता है, कहते हैं कि उस समय गुरु द्रोण ने यहीं तपोवन के पास स्थित पहाड़ी के ऊपर एक गुफा में शिवलिंग की स्थापना करके लंबे समय तक कठिन तपस्या की थी।

कहते हैं कि इसी कंदरा में तपस्या करके उन्होंने भगवान शंकर की कृपा से समस्त शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया था, तथा विलक्षण धनुर्विद्या का ज्ञाता होने का वरदान प्राप्त किया था। कालांतर में इस गुफा के ऊपर से पानी के कई स्रोत फूटे और धारा बरसाने लगे। इससे इस स्थान का नाम सहस्त्रधारा पड़ गया।

इसी दून घाटी में टौंस नदी के किनारे एक गुफा में स्थित देवेश्वर महादेव शिवलिंग है। यहां गुफा के अंदर शिवलिंग के ऊपर निरंतर पानी टपकते रहने के कारण कालांतर में यह स्थान ‘टपकेश्वर महादेव’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। बताते हैं कि कुछ सौ साल पहले तक यहां दूध की धारा गिरा करती थी।

टपकेश्वर महादेव के विषय में पुराणों में बताया गया है कि यहां गुरु द्रोणाचार्य ने तपस्या करके पुत्र प्राप्ति का वरदान प्राप्त किया था। उनके कल्पान्तजीवी पुत्र अश्वत्थामा का जन्म भी यहीं हुआ था।

गुरु द्रोणाचार्य यहां अपने राजकुमार शिष्यों को धनुर्विद्या के साथ-साथ युद्धकला एवं विभिन्न शस्त्रों की शिक्षा देते थे। गुरु द्रोणाचार्य समस्त विद्याओं में पारंगत होते हुए भी निर्धन ब्राह्मण का जीवन व्यतीत करते थे।

बाल्यावस्था में एक दिन राजकुमार शिष्यों को दूध पीता हुआ देखकर गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा ने भी अपनी माता से दूध के लिए आग्रह किया। अश्वत्थामा के बालहट और अपनी निर्धनता को जानते हुए द्रोण ने अश्वत्थामा से कहा कि बेटा भगवान शंकर के पास बहुत दूध है, तू उन्हीं के पास जाकर दूध मांग वे तेरी अभिलाषा पूरी कर देंगे।

पिता द्रोण के कहने पर अश्वत्थामा ने गुफा में स्थित देवेश्वर महादेव शिवलिंग के पास जाकर दीनहीन वाणी में शंकर से दूध की याचना करते हुए कहा कि -‘दुग्धं देहि महादेव पितर प्रेषितोऽस्म्यहम्’ – ‘हे महादेव, मुझे दूध दीजिए। मैं पिताजी के द्वारा दूध के निमित्त भेजा गया हूं।’

भक्तवत्सल भगवान शंकर बालक अश्वत्थामा की करुण पुकार सुनकर द्रवित हो ग‌ए और उन्होंने बालक अश्वत्थामा के लिए यहां टप-टप ध्वनि के साथ दूध की धारा प्रवाहित कर दी।

गुफा से टप-टप करके गिरती दुग्ध धारा से दूध पीकर अश्वत्थामा बहुत प्रसन्न हुआ और महादेव का विधि विधान से स्तुति तथा पूजन करने के बाद वापस आकर अपने पिता को संपूर्ण घटना का विवरण बताया।

टपकेश्वर महादेव के दर्शन का महत्व बताते हुए स्कंद पुराण के केदार खंड में कहा गया है कि’उनके दर्शन मात्र से मनुष्य सर्वविध पापों से विमुक्त हो जाता है।’

प्रकृति की गोद में बसा यह मंदिर यहां की प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है। प्रत्येक सोमवार के दिन यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। महाशिवरात्रि का पर्व यहां पूरी श्रद्धा-निष्ठा और समारोह पूर्वक मनाया जाता है। इस अवसर पर यहां बहुत बड़ा मेला लगता है।

शिवरात्रि के अवसर पर गुफा में स्थित टपकेश्वर महादेव शिवलिंग के दर्शन और जलाभिषेक करने के लिए आधी रात से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। दोपहर बाद तक लाखों की संख्या में श्रद्धालु पंक्तिबद्ध होकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।

देहरादून आने वाले अधिकांश पर्यटक गढ़ी कैंट स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन जरूर करते हैं। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के द्वारा ‘दून दर्शन’ के अंतर्गत बाहर से आने वाले पर्यटकों को देहरादून के रमणीक धार्मिक स्थलों का भ्रमण कराने वाले स्थलों में टपकेश्वर महादेव मंदिर भी शामिल है।

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