_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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उत्तराखंड की हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं के बीच आसमान छूता श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र प्राचीन सुरकंडा देवी का पुराण प्रसिद्ध सिद्धपीठ स्थित है। यह सिद्धपीठ मसूरी से मात्र ३२किलोमीटर दूर स्थित है।

धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक छटा और सुरम्यता के कारण यह क्षेत्र पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है। प्रसिद्ध पर्यटन स्थल धनोल्टी यहां से मात्र 5 किलोमीटर दूर है।

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद में जौनपुर के सुरकूट पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर धनोल्टी और कानाताल के बीच स्थित है। चंबा-मसूरी रोड पर मसूरी से 22 कि.मी. दूर कद्दूखाल कस्बे से डेढ़ किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर सुरकंडा माता मंदिर पहुंचा जाता है। यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर देवदार वन के बीच बहुत ही रमणीय स्थल पर स्थित है।

यह मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है, जो कि देवी के नौ रूपों में से एक है। मंदिर के गर्भ गृह में काले पाषाण की गले से सिर तक की देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ ही यहां लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं भी हैं तथा दोनों कोनो में अखंड ज्योति जलती रहती है।

अनेक पौराणिक किंवदंतियां इस स्थल से जुड़ी हुई हैं। सुरकंडा देवी के मंदिर का उल्लेख केदारखंड एवं स्कंद पुराण में भी मिलता है। पौराणिक कथानुसार देवी सती का सिर इस स्थान पर गिरा था, जहां सुरकंडा देवी मंदिर स्थित है। सिर कंधे से गिरने के कारण इसका नाम सिरकंधा पड़ गया जो बाद में स्थानीय गढ़वाली बोली के कारण सुरकंडा हो गया। पौराणिक समय में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण होने के कारण इस मंदिर का नाम ‘सुरकंडा देवी मंदिर’ रखा गया। पौराणिक मान्यता है कि देवताओं को हराकर दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं ने माता सुरकंडा देवी के मंदिर में जाकर प्रार्थना की कि उन्हें उनका राज्य सिर से प्राप्त हो जाए। देवताओं की मनोकामना पूरी हुई और देवताओं ने दैत्यों को युद्ध में हराकर स्वर्ग पर फिर से अपना आधिपत्य स्थापित किया।

एक अन्य कथा के अनुसार देवताओं और दानवों के युद्ध में देवी जगदंबा ने दैत्यों को मार-मार कर उनके धड़ो को तो नेपाल और सिरों को गढ़वाल के इस सिरकूट नामक पर्वत पर जहां आज देवी का स्थान है पहुंचाया था। दानवों को मारने के बाद वह इसी स्थान पर विश्राम करने लगी तभी उनकी बारह बहनें उनसे मिलने यहां आती थी शायद बारह बहनों से मतलब देवी के बारह रूपों से होगा।

स्कंद पुराण के केदारखंड में इस पर्वत का नाम सिरकूट ही लिखा है। जिसका अर्थ सिर-देवता, कूट-पर्वत होता है।

पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि इंद्र पर एक बार ब्रह्म हत्या का पाप चढा। ब्रह्म हत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिए इंद्र देवी की आराधना करने के लिए यहां आए थे। उसी समय से इस स्थान का नाम सुरकूट और देवी का नाम सुरेश्वरी पड़ा जो बाद में सुरकूट से सुरकंडा हो गया।

ऐसा माना जाता है कि सुरकंडा देवी का मंदिर बहुत प्राचीन मंदिर है। वास्तविक प्राचीन मंदिर की स्थापना का तो पता नहीं चलता है। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया है। कहा जाता है कि यहां रहने वाले एक देवी भक्त को सैकड़ों साल पहले स्वप्न में मां ने दर्शन देकर मूर्ति के बारे में बताया और मंदिर बनाने को कहा। गांव वाले जब उनके साथ ऊंचे पर्वत पर गए तो उन्हें काले पत्थर की मां दुर्गा की गले से सिर तक की प्रतिमा मिली। बाद में वहीं मंदिर बनाया गया, जिसे 1947 में स्वामी शीतल दास ने पक्का बनवाया।

सुरकंडा देवी का मंदिर चार पहाड़ी पट्टियों के बीच स्थित है। इस मंदिर के प्रति आस्था यहां के पहाड़वासियों में ही नहीं, नीचे मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों में भी बहुत है।

सुरकंडा देवी मंदिर के सामने शंकर भैरव का मंदिर है। बताया जाता है कि यह मंदिर भी बहुत प्राचीन है। मंदिर परिसर में ही शिव पार्वती एवं हनुमान जी का मंदिर स्थित है। मंदिर के निकट ही इंद्र गुफा भी है। सर्दी में कितनी भी बर्फ गिरे यात्रा हर समय होती है।

श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र सुरकंडा देवी मंदिर में आने वाले भक्तों का कहना है कि यहां रात में कई बार अपने आप घंटे-घड़ियाल बजने लगते हैं और कभी-कभी तो शेर भी यहां आकर बैठा।

सुरकंडा देवी मंदिर के प्रति असीम आस्था का ही परिणाम है कि यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर कठिन चढ़ाई के बाद ही यहां पहुंचा जा सकता है, इसके बावजूद बच्चे और बूढ़े, स्त्री एवं पुरुष मन में मनोकामना लिए यहां आते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां आने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता। लोग अपनी मनोकामना के साथ यहां मौली (धागा) बांधते हैं। श्रद्धालुओं के विश्वास का अंदाज उनके द्वारा यहां बांधे धागों और घंटियों और मां के नाम चढ़ाई गई अनगिनत चुनरियों से होता है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु घंटियों के साथ अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट-पूजा चढ़ा कर जाते हैं।

प्राचीन समय से यहां जयेष्ठ माह(मई के अंतिम पखवाड़े और जून के प्रारंभिक पखवाड़े के मध्य में) में गंगा दशहरा के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है। गंगा दशहरा पर देवी के दर्शनों का विशिष्ट धार्मिक महत्व आना जाता है। इस अवसर पर यहां देशभर से श्रद्धालु आते हैं, इसके अलावा आसपास के जनपदों के दूरदराज के गांवों से भी यहां हजारों की संख्या में बच्चे-बूढ़े, वयस्क स्त्री-पुरुष माता के दर्शन हेतु आते हैं। ‌ नवरात्रों के पर्व भी विशेष रूप से मनाए जाते हैं।

सुरकंडा देवी के पावन स्थल पर पंच मकार (मांस-मदिरा) आदि से पूजा नहीं होती, पशु बलि आदि भी नहीं दी जाती। मान्यता है कि इंद्र की पूजा से प्रसन्न होकर देवी ने इंद्र से स्वयं कहा था की जोक व्यक्ति मांस-मदिरा से मेरा पूजन करेगा नरक का भागी होगा। स्थानीय रूप से देवी सुरकंडा से संबंधित कई लोक कथाएं हैं जिन्हें यहां गाया जाता है।

धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक छटा और सुरम्यता के कारण यह क्षेत्र पर्यटकों एवं सैर-सपाटा करने वालों के आकर्षण का केंद्र भी है। यह स्थान समुद्र की सतह से 10,500 फीट की ऊंचाई पर देवदार वृक्षों के बीच बहुत ही रमणीक है। मसूरी(देहरादून) से यहां तक आने का रास्ता देवदार व बुरांस के घने जंगलों से आच्छादित है। मसूरी से चंबा तक का पूरा रास्ता पर्वतमालाओं के बीच देवदार-चीड़-बुरांस आदि वृक्षों से आच्छादित मनोहरी प्रकृति की छटा बिखेरे पड़ा है। यहां की छटा देखते ही बनती है।

यहां से हिमालय की बर्फीली चोटियां बड़ी सुंदर दिखाई देती हैं। माता के दरबार से उत्तर दिशा की ओर हिमालय का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, तुंगनाथ, चौखंबा, गौरीशंकर, नीलकंठ आदि सहित कई पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई देती हैं। दक्षिण दिशा में देहरादून और ऋषिकेश शहरों का सुंदर नजारा देखा जा सकता है।

इस इलाके को फ्रूट बेल्ट के रूप में भी जाना जाता है। यहां का सेव देशभर में जाना जाता है। सुर्ख लाल डेलिशिश सेव से लदे पेड़ों को देखकर पर्यटक आनंदित हो उठते हैं। बेमौसम की सब्जियां जैसे टमाटर, मटर, सेम, फरासबीन यहां बारहों महीने मिलती हैं जिनकी दूर-दूर के महानगरों में बड़ी मांग है।

सुरकंडा देवी के आसपास धनोल्टी, कानाताल और चंबा जैसे कई सुरम्य स्थल भी हैं। कद्दूखाल के आसपास धनोल्टी, कानाताल आदि में अनेक अच्छे होटल भी खुल चुके हैं। मसूरी आने वाले पर्यटकों में से अधिकांश सुरकंडा देवी के दर्शनों के लिए भी अवश्य आते हैं।

इस क्षेत्र में जखोली ब्लॉक प्राकृतिक सुंदरता के रूप में अपूर्व है। यहां के पवाली, मारियम, काण्टा तथा क्युडी स्थानों पर स्कींग भी हो सकती है। यह स्थल दस से तेरह फुट की ऊंचाई पर है। यहां का खतलिंग ग्लेशियर ट्रेकिंग की शान है।

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