_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सौरम गांव –

सौरम गांव में सैकड़ों महत्वपूर्ण निर्णयों की गवाह बनी सर्वखाप की ऐतिहासिक प्राचीन चौपाल स्थित है।

गांव सौरम एक प्राचीन ऐतिहासिक गांव है। इसी सौरम गांव में राजा हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान गठित हुई सर्वखाप पंचायत का केंद्र (हैडक्वार्टर) है।

कहते हैं कि वैदिक हरियाणा के अनुसार वर्तमान के 9 राज्यों की सर्वखाप महापंचायत का केंद्र बिंदु मुजफ्फरनगर जनपद की बुढाना तहसील में स्थित सोरम गांव को माना जाता है।

ऐतिहासिक खापभवन से सन 1305 से समय-समय पर देश व समाज के हित में फैसले लिए जाते रहे हैं जो आज भी जारी है।

बाहरी हमलावर लुटेरों के आक्रमण के समय भी इस ऐतिहासिक चौपाल पर कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए थे।

समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए इसी गांव की चौपाल पर सर्वखाप पंचायत आयोजित करके समाज सुधार के कई महत्वपूर्ण फैसलों पर मोहर लगाई गई थी।

सदियों से इस चौपाल पर समय-समय पर हुई पंचायतों में लिए गए अनेकों महत्वपूर्ण निर्णयों का गवाह बना चौपाल का भवन अपने आप में रचनाकारों की कारीगरी का अनूठा नमूना है। विश्व प्रसिद्ध इस चौपाल के भवन को देखने के लिए देश-विदेश के पर्यटक यहां आते रहते हैं।

चौपाल के भवन का निर्माण किस समय हुआ इस बारे में तो कोई कुछ निश्चय के साथ नहीं बता पाता है लेकिन कहते हैं कि इस भवन को किसी राजा ने अपने निवास स्थान के लिए बनवाया था। हां इस भवन पर उस समय की भाषा में चौधरी नरपत सिंह व चौधरी कर्म सिंह का नाम एक स्थान पर अंकित हुआ है।

यह भी बताते हैं कि चौपाल के नाम से प्रसिद्ध इस भवन को सालावा गांव के किसी मिस्त्री ने बनाया था।

इस चौपाल के भवन को अगर ध्यान से देखा जाए तो उस हुनरमंद कारीगर की कारीगरी को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। उस कारीगर ने इस भवन को बनाने में अपने कितने तरह के हुनर का इस्तेमाल किया है यह देख कर आम व्यक्ति तो क्या बड़े से बड़ा भवनों के निर्माण करने वाला जानकार भी दांतो तले उंगली दबा जाता है।

इस चौपाल की इमारत के दरवाजों व चौखट के रंग देखने में बिल्कुल एक जैसे हैं लेकिन दरवाजे लकड़ी के बने हुए हैं और चौखट को पत्थर से बनाया गया है। कोई भी व्यक्ति इन दोनों में जरा सा भी अंतर स्पष्ट नहीं कर सकता है। क्योंकि पत्थर की चौखट और लकड़ी के दरवाजे देखने में बिल्कुल एक जैसे लगते हैं।

कारीगरी का नमूना इस चौपाल की इमारत तीन मंजिला है। और इसकी यह विशेषता है कि यह सर्दी और गर्मी दोनों मौसम के अनुकूल इमारत है। गर्मी के मौसम में इस इमारत के किसी कमरे में गर्मी महसूस नहीं होती और सर्दी के मौसम में सूरज की किरणें यहां सीधे प्रवेश करती हैं।

इस भवन में बनाए गए रोशनदानों में भी उसने अपने हुनर का प्रदर्शन किया है। वे भी इस तरह बनाए गए हैं कि मौसम चाहे कोई सा भी हो उनमें से आती ताजी हवा का आनंद लिया जा सकता है।

एक और विशेषता इस भवन में है कि इस इमारत में बंद दरवाजों के बावजूद इसके अंदर प्रवेश किया जा सकता है तथा बाहर आया जा सकता है।

चौपाल के भवन का फर्श बनाने में बेहतरीन ईटों को इस तरह से लगाया गया है कि किसी भी तरफ से देखने पर ‘फूल’ की आकृति ही दिखाई पडती है।

इस इमारत की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि इमारत की दीवार जमीन से शुरू होकर ऊपर तक मोटाई में कम होती गई है लेकिन कोई भी भवन निर्माण करने वाला जानकार इस नीचे से चौड़ी और ऊपर से नेडी दीवार को सोल डालकर सिद्ध नहीं कर पाया है। इमारत के अंदर की दीवारें एक मीटर तक चौड़ी बताई जाती हैं। गांव वाले बताते हैं कि इस इमारत की विशेषताओं पर रिसर्च करने वाले पर्यटक यहां आते रहते हैं।

सर्व खाप पंचायतों का केंद्र रही सौरम की ऐतिहासिकता से सभी परिचित हैं।

सर्वखाप के स्वर्णिम इतिहास के ही पन्ने हैं –

सर्वखाप के योद्धाओं ने हमेशा नारी की रक्षा की है

* जब मेवाड़ राज्य के चित्तौड़गढ़ पर गुजरात के एक सुल्तान ने आक्रमण करना चाहा तो मेवाड़ की रानी करूणावती ने दिल्ली के बादशाह हुमायूं को अपनी रक्षा के लिए राखी भेजी थी। करुणावती ने अपनी रक्षा के लिए तब एक राखी सौरम सर्वखाप के पास भी भेजी थी।
रानी करुणावती की राखी मिलने के बाद मथुरा में सर्वखाप सभा बुलाई गई और उसमें रानी करुणावती की सहायता करने का निर्णय लिया गया। उस समय बुलाई गई सभा में चित्तौड़ की सुरक्षा के लिए नौ निर्णय लिये गए।
उस सभा में यह तय किया गया था कि सुल्तान नगर चित्तौड़गढ़ पर हमला किया तो हुमायूं की सहायता की जाएगी। लेकिन हुमायूं और सर्वखाप के मल्ल योद्धाओं के इंतजार में रानी करुणावती ने आग में कूदकर जान दे दी। जिस समय सर्वखाप की सेना चित्तौड़गढ़ पहुंची तो सुल्तान का भाई करूणावती के प्रति अपशब्द बोल रहा था पंचायत के मल्लों ने उसका सिर काट कर मौत के घाट उतार दिया था। रानी करुणावती के बलिदान के बाद सर्वखाप पंचायत के मल्लों ने सुल्तान बहादुरशाह को राजस्थान में हराया था।

* सत्रहवीं शताब्दी के समय की बात है सौरम गांव में एक मुसलमान पीर आकर रहने लगे थे। उन मुसलमान पीर की लड़की शरीफ उलजमा बहुत सुंदर थी। वह पीर सौरम गांव के लड़कों को अरबी और फारसी पढ़ाते थे। गोयला गांव का एक लड़का जयभगवान भी उनके पास पढ़ने के लिए आता था। जयभगवान पीर की लड़की उलजमा को सगी बहन से भी अधिक प्यार करता था। उलजमा का विवाह बिजनौर जनपद के झालू गांव में हुआ। जयभगवान भी बुंदेलखंड के राजा की सेना में सूबेदार हो गया। इसी बीच उलजमा के पति को जहर देकर मारने के बाद चलजमा को भी बंधक बना लिया गया था। जब यह खबर जयभगवान तक पहुंची तो वह सेना लेकर बिजनौर आया और उन दुराचारियों को समाप्त करके वह उलजमा को अपने साथ गोयला गांव ले आया। इसके बाद फिर पूरी उम्र उलजमा गोयला गांव में ही रही। इस किस्से को आज भी लोगों के द्वारा सुना जा सकता है।

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