___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के१००किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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गाजियाबाद जनपद में सिरसागढ़ गांव उर्फ शमशेरपुर गांव का संबंध गुजरात के प्रसिद्ध भक्त कवि संत नरसी मेहता से है।

प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार कई शताब्दियों पूर्व सिरसागढ़ के निवासी मनशा सेठ का विवाह जूनागढ़ गुजरात के एक धनवान वैश्य परिवार की पुत्री हरनंदी के साथ बड़ी धूमधाम के साथ हुआ था।

भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त नरसी भगत हरनंदी के भाई थे। कालांतर में हरनंदी के भाई नरसी भगत की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई।

कुछ समय के अंतराल के बाद हरनंदी  अपनी पुत्री के विवाहोत्सव के अवसर पर भात देने के लिए अपने भाई नरसी भगत को भात न्योत  कर आई।

नरसी भगत  बहन के द्वारा अपनी पुत्री के विवाह का निमंत्रण और भात न्योंतने के बाद अपनीआर्थिक स्थिति को जानते हुए दुविधा में थे कि भांजी के विवाह के अवसर पर भात देने जाएं या न जाएं ? नरसी भगत सोचने लगे अगर वह बहन के यहां जाते हैं तो वह वहां क्या देंगे और अगर वह नहीं गए तो बहन क्या सोचेगी और समाज में बहन की जग हंसाई होगी।

नरसी भगत भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे और अपने श्री कृष्ण पर नरसी भगत का दृढ़ विश्वास था सो भांजी के विवाह का निमंत्रण श्री कृष्ण के चरणों में रख सब कुछ उन्हीं के ऊपर छोड़ दिया। भगवान श्री कृष्ण का मन ही मन स्मरण और कीर्तन करते हुए नरसी भगत समय पर अपनी बहन के गांव सिरसागढ़ पहुंच गए। बहन के घर विवाह की जोरदार तैयारियां हो रही थी।

विवाह में भात देने के अवसर पर द्वाराचार के समय बहन हरनंदी सहित घर की सभी महिलाएं द्वार पर खड़ी लोक गीत गा रही थी। उधर नरसी भगत मन ही मन भगवान श्री कृष्ण को पुकार कर कह रहे थे कि आज तो मेरी और बहन हरनंदी की लाज आपके ही हाथ में है। मैं तो बहन के द्वार पर खाली हाथ असहाय सा खड़ा हूं अब सब कुछ आपको ही करना है।

कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्त नरसी द्वारा मन ही मन की गई करुण पुकार सुनकर ऐसा चमत्कार दिखाया कि सब लोग चमत्कृत रह गए। देखते ही देखते सोना बरसने लगा भावातिरेक में नरसी भगत ने अपनी बहन से कहा—-   ‘हरनंदी, अब जितना चाहो सोना भर लो, कल का कोई भरोसा नहीं।’

ऐसा भी कहा जाता है कि उस समय जब सोना बरस रहा था, तब गांव के एक धोबी ने यह सोच घर का सोना तो घर में ही रहेगा, पहले घाट पर जाकर वहां का सोना इकट्ठा कर लूं। धोबी जब घाट पर पहुंचा तो वहां का सोना समाप्त हो चुका था धोबी जब लौटकर घर आया तब तक घर का सोना भी दूसरे बटोर कर ले गए थे। धोबी हाथ मलता ही रह गया।

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यहां प्रचलित एक जनश्रुति के अनुसार शेरशाह सूरी अपने राज्य विस्तार विस्तार करते हुए, जिस समय दिल्ली के इस तरफ गुजरा तब शेरशाह सूरी कुछ समय के लिए यहां रुका और इस स्थान का नाम सिरसागढ़ से बदलकर शमशेरपुर रख दिया। यह नाम इस समय भी प्रचलित है। यह भी कहा जाता है कि उसने दिल्ली से हस्तिनापुर तक एक सड़क बनवाई थी। जो बाद में बादशाही मार्ग के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह गांव भी उसी बादशाही मार्ग पर दाई ओर स्थित एक छोटा सा गांव है।

यहां की ग्रामीण बताते हैं कि यह गांव एक शापग्रस्त खेड़ा है। वह बताते हैं गांव में एक प्राचीन शिवमंदिर है। उस मंदिर के नीचे बहुत धन – संपत्ति दबी हुई है।इस मंदिर की मूर्तियां खंडित अवस्था में है और मंदिर में स्थापित शिवलिंग भी हिलता है। यहां के ग्रामीणों ने मंदिर की प्रतिमाएं बदलवाने के भरसक प्रयास किए लेकिन शापग्रस्त खेड़ा होने के कारण वह प्रयास असफल रहे हैं।

गांव में यदा-कदा प्राचीन वस्तुएं एवं सिक्के प्राप्त होते रहते हैं। कुछ दशक पहले यहां कुएं से एक प्राचीन शिलालेख मिला था। शिलालेख की भाषा अस्पष्ट थी उस पर अंकित केवल ‘राम’शब्द कुछ पढ़ने में आता था। एक समय सोने के कुछ सिक्के भी यहां के एक ग्रामीण को मिले थे लेकिन कहा जाता है शापवश उसका परिवार भी देखते- देखते ही नष्ट हो गया।

इस गांव में एक ऊंचा टीला है जो समय और मौसम की मार से धीरे धीरे धराशाई होता जा रहा है।

पुरातत्व विभाग की टीम भी बहुत पहले इस गांव के प्राचीन स्थानों को देख चुकी है।

एक प्रकार से इस ऐतिहासिक गांव सिरसागढ़ को शापग्रस्त गांव कहा जाता है। क्योंकि जिस गांव में कभी सोना बरसा था वह आज एक उपेक्षित गांव है।

 

 

 

 

 

 

 

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