____________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के१००किमी के दायरे में गंगा यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र _________________________________________

भक्ति व  शक्ति  का प्रतीक  मां महामाया देवी का त्रिदिवसीय मेला

मोदीनगर शहर से ही लगा हुआ गांव सीकरी खुर्द, यहां प्रतिवर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की षष्टि, सप्तमी और अष्टमी तिथि को तीन दिवसीय महामाया देवी का मेला लगता है।

सैकड़ों वर्षों से सीकरी खुर्द गांव में लगने वाला यह धार्मिक मेला इस क्षेत्र की ग्रामीण संस्कृति का प्रतीक है। यह मेला पूर्णतः ग्रामीण संस्कृति पर आधारित है। इस अवसर पर प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु दूरदराज के क्षेत्रों से अपनी-अपनी भैंसाबुग्गीयों, ट्रैक्टर- ट्रालियों, रिक्शा, तांगा तथा छोटा हाथी, टम्पू – बसों और अपने निजी वाहनों से पहुंचते हैं। इधर से गुजरने वाली अधिकतर ट्रेनों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।

तीन दिवसीय मेले के दौरान प्रायः ट्रेन चालक भी मेला स्थल के निकट ट्रेन रोककर देवी को श्रद्धावश प्रणाम करते हैं। उनके इस कार्य से ट्रेन के द्वारा मेले में आने वाले श्रद्धालु भक्त भी इसी स्थान पर ट्रेन से उतर कर मेला स्थल पर पहुंच जाते हैं।

ग्रामीण महिलाएं रंग-बिरंगे परिधानों में देवी के गीत और भजन गाती हुई देवी मंदिर पहुंचती हैं।

श्रद्धालु यहां महामाया देवी के साथ-साथ काली माता, दुर्गा माता आदि अन्य कई मंदिरों में नारियल – चुनरी व इलायची दाना का प्रसाद चढ़ाकर नाना प्रकार की मनोतियां मांगते हैं। श्रद्धा पूर्वक सच्चे मन से  देवी के समक्ष  मत्था टेक कर मांगी गई मनौती पूर्ण होती है।

मेले में  छोटे- बड़े कई प्रकार के झूले, सर्कस, जादूगर – शो, मौत का कुआं, सचल सिनेमाघर, वैरायटी शो आदि मनोरंजन के साधन होते हैं।

कुछ दशक पूर्व तक यहां काली माता व दुर्गा देवी को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों की संख्या में निर्दोष मुर्गों और बकरों की बलि चढ़ाई जाती थी। लेकिन कुछ प्रगतिशील नौजवानों और धार्मिक संगठनों के प्रबल विरोध के बाद अब यह बलि प्रथा बंद हो गई , तब से मंदिर में पशु बलि नहीं चढ़ाई जाती। अब देवी को केवल चुनरी – नारियल, प्रसाद, छत्र आदि चढ़ाए जाते हैं।

मेले में क्रय विक्रय हेतु खेल- खिलौना, सौंदर्य प्रसाधन के सामान, मिट्टी के रंग बिरंगे बर्तन, लोहे की वस्तुएं, लहसुन तथा अन्य अनेक दैनिक उपयोग की वस्तुएं आती हैं। खाने-पीने की अनेक वस्तुओं के ठेले और स्टाल सजाए जाते हैं। गरम जलेबी और खजलों की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ लगी रहती है।

मिट्टी के सुंदर आकर्षक मटके, हंडिया, हुक्कों की चिलमें तथा अन्य कई प्रकार के बर्तन यहां खरीदने – बेचने के लिए आते हैं।

 

यह मेला गधा – खच्चर मेले के नाम से भी जाना – जाता है। प्रजापति समाज के लोग अपने गधों – खच्चरों को रंग – बिरंगे रंगों में रंग कर लाते हैं। मेले के अवसर पर भारी संख्या में यहां खच्चरों, गधों और टट्टूओं का क्रय – विक्रय होता है।

 

 

 

 

 

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