__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शिवालिक के वन में विराजमान सुरेश्वरी देवी जिनके दर्शन मात्र से सभी के संताप मिट जाते हैं।

हरिद्वार के प्रमुख वंदनीय स्थलों में सुरेश्वरी देवी का मंदिर भी शामिल है। जगत जननी मां सुरेश्वरी देवी का सिद्ध पीठ राजाजी नेशनल पार्क में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) के निकट रानीपुर रेंज कक्ष नंबर 2 में रानीपुर वन विभाग चेक बैरियर से उत्तर की ओर सूरकूट पर्वत की उपत्यका के गहन वन में अतीव रमणीय, एकांत व शांत वातावरण में स्थित है। हरिद्वार रेलवे रोड से एक रास्ता बिल्केश्वर महादेव मंदिर को जाता है उसी रास्ते पर आगे भेल स्टेडियम से निकलकर चौराहे से दाहिने हाथ पर मंदिर को रास्ता कट जाता है। स्थानीय लोग इस मंदिर को जंगल वाला मंदिर के नाम से भी संबंधित करते हैं।
यहां अनादि काल से सभी मनोकामनाएं को पूरा करने वाली परमेश्वरी सुरेश्वरी देवी विराजती हैं।

देवी भगवती के सभी ५१ शक्तिपीठ सती के एक-एक अंग से प्रादुर्भूत हुए परंतु हरिद्वार मायापुर के समीपस्थ सभी क्षेत्रों में तो देवी सती की नित्य दिव्य लीला प्रकट होती है यह सती की प्रादुर्भावस्थली है। यहां तो सृष्टि के अनादि काल से ही सब ओर मां भगवती के अलौकिक दिव्य शक्ति पीठ प्रतिष्ठित हैं जिनमें मां मंसा,मां चंडी,मां माया,मां काली देवी के साथ ही मां सुरेश्वरी देवी का धाम भी शिव शक्ति का नित्य विहार स्थल है।

स्कंद पुराण के केदारखंड में हरिद्वार से लेकर केदारनाथ पर्यंत प्राचीन दिव्य तीर्थों नदियों, पर्वतों के व्यापक वर्णन के साथ देवी सुरेश्वरी के इस दिव्य सिद्ध पीठ का वर्णन किया गया है।

शास्त्रों में कहा गया है कि सर्व मनोकामनाओं को पूरा करने वाली सुरेश्वरी देवी के दर्शन मात्र से सभी के संताप मिट जाते हैं।

स्कंद पुराण के केदारखंड में सुरेश्वरी देवी पीठ के माहत्म के वर्णन में एक स्थान पर भगवान कार्तिकेय जी नारद जी को बताते हैं कि गंगा के निकट सूरकूट पर्वत है वहां सुरेश्वरी देवी सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं। इस स्थान पर अष्टमी नवमी एवं चतुर्दशी के दिन अर्धरात्रि के समय देवी सुरेश्वरी के दर्शन के लिए सभी देवता आते हैं।

देवी सुरेश्वरी समस्त रोगों का नाश करती है। सूरकूट पर्वत के ऊपर जितनी भी धाराएं नियमित रूप से बहती है उन्हें भी निसंदेह गंगा जी के समान ही समझना चाहिए।

सुरेश्वरी देवी की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान कार्तिकेय ने नारद जी को बताया कि देवराज इंद्र ने सुरेश्वरी देवी की आराधना की थी और तभी से सब आपत्तियों का नाश करने वाली देवी भगवती का नाम सुरेश्वरी देवी के नाम से विख्यात हुआ। यहां सुरेश्वरी नाम से ही भगवान महादेव का एक शिवलिंग भी स्थापित है।

स्कंद पुराण में ही देवी सुरेश्वरी की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान कार्तिकेय जी नारद जी को बताते हैं की पूर्व काल में चंद्रवंश में एक रजि नाम के राजा हुए थे। उनका सागर पर्यंत समस्त भूमि पर शासन हुआ करता था। एक बार देवराज इंद्र का व्यक्तियों के साथ युद्ध हुआ जिसमें व्यक्तियों ने इंद्र को परास्त करके उनका इंद्रासन छीन लिया।

दैत्यों से पराजित होने के बाद इंद्र ने राजा रजि से सहायता मांगी। राजा रजि ने इंद्र की सहायता करते हुए अपनी चतुरंगिणी सेना को साथ लेकर दैत्यों के साथ लंबा युद्ध किया। उन्होंने दैत्यों का वध करके उन्हें हराया। इंद्र ने राजा रजि को अपने पिता के समान बताया। राजा रजि ने इंद्र को पुण: इंद्रासन पर आसीन किया।

महाराजा रजि के पांच सौ पुत्र बड़े पराक्रमी थे। महाराजा रजि के वृद्ध होते ही उनके पुत्रों ने इंद्र से स्वर्ग का राज्य उन्हें देने को कहा। जिस पर देवराज इंद्र ने राजा रजि के पुत्रों के साथ युद्ध किया। लेकिन इस युद्ध में देवताओं के राजा इंद्र को परास्त हो गए। पराजित इंद्र का रजि पुत्रों ने पीछा किया लेकिन इंद्र क्षीर सागर में जाकर छुप गए। उसी समय देवगुरु बृहस्पति जी यहां आए तथा उन्होंने इंद्र को बाहर आने के लिए कहा। देवगुरु बृहस्पति जी ने इंद्र को भगवान विष्णु की तपस्या करने का आदेश दिया।

इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति के निर्देश के अनुसार भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। इंद्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने इंद्र से कहा कि शुभ केदार मंडल के मायापुरी (हरिद्वार) गंगा के पश्चिम में शिवालिक पर्वत मालाओं की सूरकूट पर्वत की उपत्यका में सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी भगवती परमेश्वरी सुरेश्वरी देवी विराजती हैं। वे ही आपकी अभिलाषा पूर्ण कर सकती हैं आप उनकी आराधना करें।

भगवान विष्णु की आज्ञा के अनुसार इंद्र ने सूरकूट पर्वत की उपत्यका में सुरेश्वरी देवी की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया। सुरेश्वरी देवी ने प्रकट होकर इंद्र को वरदान दिया और कहा कि तुम अपने पराक्रम से निश्चय ही अपने राज्य को प्राप्त करोगे। मैं रजि पुत्रों को मोहित करूंगी जिससे उन दूरात्माओं का शीघ्र ही बल समाप्त हो जाएगा। देवी सुरेश्वरी इंद्र को यह कह अंतर्ध्यान हो गई।

देवराज इंद्र ने अपनी वृत्रासुर विनाशी देवसेना के साथ मिलकर देवी की माया से मोहित रजि पुत्रों का हनन किया और अंत में देवी सुरेश्वरी की कृपा से इंद्र को उनका इंद्रासन पुण:प्राप्त हुआ।

सुरेश्वरी देवी मंदिर हरिद्वार का प्रमुख एवं प्राचीन धार्मिक स्थल है।चैत्र एवं आश्विन नवरात्र में हजारों श्रद्धालु यहां दर्शनार्थ आते हैं।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में पहुंचने पर सबसे पहले सुरेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन होते हैं। सुरेश्वर महादेव मंदिर के पीछे माता सुरेश्वरी देवी का मंदिर बना है। पुराणों में इस स्थान का वर्णन है। इस स्थान पर देवराज इंद्र व अन्य देवताओं ने माता काली स्तुति की और उन को प्रसन्न कर उनसे यह आशीर्वाद लिया था कि वह दानवों का नाश वह देवताओं की सहायता करेंगी। यहां देवी मां अवतरित हुई थी इसलिए यह सिद्ध पीठ है। सुरेश्वरी देवी मंदिर परिसर में ही थोड़ी ऊंचाई पर काली माता का मंदिर है।

राजाजी नेशनल पार्क घोषित होने के बाद सुरेश्वरी देवी मंदिर का भी विकास हुआ। यहां प्रतिदिन देवी सुरेश्वरी के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु एवं तीर्थयात्री आते हैं। हरिद्वार 7 किलोमीटर दूर है और यहां ऑटो, कार, निजी वाहन से सुरेश्वरी देवी मंदिर पहुंचा जा सकता है।

राजाजी टाइगर रिजर्व नेशनल पार्क के रानीपुर हरिद्वार रेंज के गेट पर पहुंचने पर जंगल विभाग के कर्मचारी गाड़ी की एंट्री अपने रजिस्टर में करते हैं और निर्धारित शुल्क लेकर पर्ची काटते हैं।

सुरेश्वरी देवी मंदिर क्योंकि वन में स्थित है, इसलिए यहां पर वन्यजीवों का आना सामान्य बात है। हिरण, जंगली सूअर, हाथी व गुलदार यहां पर आते हैं। इसलिए
मंदिर को कटीली बाढ़ लगाकर घेरा गया है। मंदिर के चारों ओर वन है इससे मंदिर में बहुत शांति है लेकिन आपको पक्षियों की चहचहाहट की आवाज सुनाई देती रहेगी। हिदायत दी जाती है कि श्रद्धालु जंगल के अंदर मत जाएं।

हाथी व लेपर्ड के लिए प्रसिद्ध इस वन में वन विभाग का निर्धारित शुल्क देकर यहां जंगल सफारी को भी जाया जा सकता है। यह ट्रैक लगभग आना-जाना 28 किलोमीटर का है।

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