____________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.-प्र.-भारत) के लगभग १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और पवित्र धार्मिक स्थल के बारे में – –

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देवी माता का कुंजापुरी मंदिर एक सिद्धपीठ के रूप में प्रतिष्ठित है। यह पवित्र स्थान ऋषिकेश से 21 कि.मी. तथा नरेंद्र नगर से मात्र 8 कि.मी. दूर समुद्र तल से 6500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। नरेंद्र नगर से 6 कि.मी. हिंडोलाखाल तक सड़क मार्ग है और यहां से कुंजापुरी जाने के लिए 2कि.मी. का पैदल रास्ता है।

कुंजापुरी सिद्धपीठ होने के साथ-साथ एक ऐसा स्थान है जहां से उत्तराखंड के लगभग सभी पवित्र तीर्थ स्थानों के दर्शन का लाभ हो जाता है। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ धाम सहित अनेक पुण्य धामों के दर्शन का लाभ केवल कुंजापुरी से ही हो जाता है।

देवी के सिद्धपीठ से चारों दिशाओं में प्रकृति के अपरिमित नैसर्गिक वैभव के दर्शन होते हैं।

उत्तर दिशा में हिमालय की हिम से आच्छादित ऊंची चोटिया बंदरपूंछ, गंगोत्री, जोगिन, थलैया सागर, बंतकाठा, केदारनाथ, खार्चाकुण्ड चौखंबा, बद्रीनाथ, नीलकंठ तथा सुरकुंडा आदि अनेक हिम शिखरों के अपरिमित नैसर्गिक वैभव के दर्शन होते हैं।

कुंजापुरी की दक्षिण दिशा में पवित्र गंगा के तट पर स्थित लक्ष्मणझूला, स्वर्गाश्रम, ऋषिकेश, हरिद्वार तीर्थ स्थलों के दर्शनों के साथ-साथ सहारनपुर तथा शिवालिक की पर्वतमाला सहित सुरम्य दून घाटी दिखाई देती है।

पूर्व दिशा में कुंजापुरी के समीपवर्ती पौड़ी गढ़वाल की अनेक वनाच्छादित मनोहर पर्वतमालाएं तो दिखाई देती ही हैं,साथ ही नीलकंठ शिखर की छवि भी दिखाई देती है।

पश्चिम दिशा में देहरादून घाटी, मसूरी, चकराता की पहाड़ियां तथा फूलों एवं हरियाली से सुसज्जित दिखाई देते हैं।

रात्रि के समय तो इस स्थान से विभिन्न नगरों के बिजली की रोशनी से टिमटिमाते दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे कि चुपके से धरती पर आसमान का तारामंडल ही उतर आया हो।

पौराणिक प्रसंगों के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के द्वारा करवाए जा रहे महायज्ञ में अपने पति भगवान शिव को सम्मान नहीं मिलने पर सती ने स्वयं को अग्नि में प्रवेश करके भस्म कर लिया।

देवी सती के अग्नि प्रवेश के उपरांत क्रोधित भगवान शिव के भेजें उनके प्रमुख गण वीरभद्र और शिवगणों की सेना ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस कर दिया।

भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लिए हुए सारे ब्रह्मांड में घूम रहे थे। सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान शिव का क्रोध शांत करने के लिए विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती की देह को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया। माना जाता है कि देवी सती के कुंजा का भाग इस स्थान पर गिरा था। इससे इस स्थान को सिद्धपीठ की महिमा प्राप्त हुई।

इस मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र के दिनो में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते हैं। अष्टमी तिथि को यहां मेला लगता है।

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