_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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चरथावल में स्थित माता नवदुर्गा सिद्धपीठ श्रद्धालु भक्तों का आस्था का केंद्र है। चमत्कारों से ओत-प्रोत इस प्राच्य देवी मंदिर की महिमा अपरंपार है। आसपास के इलाके में
भी इससे प्राचीन मंदिर और कोई दूसरा नहीं है। इस पावन स्थल पर श्रद्धालुओं द्वारा सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना मां देवी भगवती अवश्य पूरा करती हैं।

प्राचीन समय में हरे भरे वनों से घिरा रहने वाला यह टीला ऋषि मुनियों के द्वारा साधना के लिए चुना गया था। कहते हैं सैकड़ों वर्ष पूर्व टीले पर एक ऋषि मुनि के द्वारा यहां देवी की सिद्धि प्राप्त करके माता का स्थान मांगा गया था।

प्राच्य देवी मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्राचीनतम प्रतिमा के साथ अतीत के कई चमत्कारों की कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। इस मंदिर के द्वार पर देवी माता के प्रहरी के रूप में दो सिद्ध विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है जब भी कोई प्राकृतिक विपदा आई, तब माता ने इस क्षेत्र व नगर की रक्षा की है।

नवरात्रों में इस सिद्ध पीठ पर श्रद्धालु भक्तों का मेला लगा रहता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु भक्त मनोकामना पूरी होने पर माता को लाल साड़ी, श्रंगार की सामग्री, चांदी का छत्र व नारियल चढ़ा कर हलवा पूरी का भोग लगाते हैं।

सैकड़ों वर्ष प्राचीन इस मंदिर को शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र के समय भव्य ढंग से सजाया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों तक श्रद्धालु भक्तों द्वारा पूजा आराधना करने हेतु उचित प्रबंध किए जाते हैं। इस समय यहां माता की भक्ति का सैलाब पूरे चरम पर देखने को मिलता है।

जगह जगह पर पंडाल में दरबार सजा कर भक्तों के द्वारा देवी जागरण आयोजित किए जाते हैं जिनमें सारी-सारी रात तक भक्तों के द्वारा महामाई का गुणगान किया जाता है। माता के भजनों से क्षेत्र की चारों दिशाएं गूंज उठती हैं।

मंदिर परिसर में मां भद्रकाली की प्रतिमा पर सरसों तेल का दीया जलाकर आरती की जाती है। नवरात्रों के अवसर पर नवदुर्गा की प्राचीन दुर्लभ मूर्ति के समक्ष विशेष रुप से अखंड ज्योति जलती रहती है।

शारदीय नवरात्र में दुर्गा अष्टमी के अवसर पर नगर में अनेक आकर्षक झांकियों के साथ देवी मां की भव्य शोभायात्रा बैंडबाजों के साथ निकाली जाती है।

साल के दोनों नवरात्रों में बाहर से संत आकर नगर की शांति और खुशहाली के लिए भंडारा करते हैं जिसमें श्रद्धालु बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

चैत्र नवरात्र के अवसर पर लगने वाले मेले में देशभर के प्रसिद्ध स्वांगी आते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रुप से प्रचलित लोक कथाओं एवं धार्मिक कथाओं पर स्वांग कला का सजीव मंचन प्रस्तुत करके दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरतें हैं।

मंदिर परिसर में समय-समय पर होने वाली कथाओं को श्रवण करने का अवसर यहां के नगरवासियों को साल में कई बार मिलता रहता है।

ऐतिहासिक घाट मेला –

चरथावल में प्रतिवर्ष होली फाग खेलने के बाद तीन दिवसीय होली घाट मेले का आयोजन किया जाता है। यह घाट मेला आपसी भाईचारा और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है।

चरथावल के मोहल्ला तीरगान के एक छोर से मुर्दापट्टी तक लगने वाले इस मेले में खेल-खिलौने, घरेलू आवश्यकता का सामान एवं श्रृंगार सामग्री आदि की तरह-तरह के सामानों की दुकाने सज जाती हैं। मेले में लगी नौटंकी, मिनी सर्कस, झूले, मौत का कुआं, खेल-खिलौनों की दुकानों आदि पर मेला देखने आए लोगों की भारी भीड़ लगी रहती है।

चौकड़ा, कुल्हेड़ी,दधेहडू, कुटेसरा आदि गांव से बड़ी संख्या में मुस्लिम भी फाग के बाद खुशी का इजहार कर मेले का आनंद उठाते हैं।

सैकड़ों साल से लगने वाले इस मेले की खासियत परंपरागत रूप से मेले में बेर और जलेबी खरीदने का रिवाज है। इस मेले में सभी वर्गों के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

इस घाट मेले का मुख्य आकर्षण दंगल का आयोजन है। जिसमें स्थानीय एवं आसपास के जनपदों वे अन्य राज्यों से आए पहलवानों के बीच जोर आजमाइश और रोमांचित कर देने वाले कुश्ती के मुकाबले होते हैं। कई जिलों से आए पहलवान अपनी कुश्ती कौशल का प्रदर्शन कर अपना दमखम दिखाते हैं। दंगल देखने के लिए लोगों का भारी हुजूम उमड़ता है।

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