___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सनातन हिंदू धर्म के ६८ प्रमुख धार्मिकस्थलों एवं तीर्थों में से एक महाभारतकालीन शुकतीर्थ की ४ कोसीय
(१२ कि.मी.) परिक्रमा भी श्रद्धालु भक्त ब्रज के गोवर्धन पर्वत की भांति ही नंगे पैर चल कर पड़ी श्रद्धा से करते हैं।

महाभारत काल में महाभारत के नायक धनुर्धारी अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित को ऋषि श्राप की मुक्ति के लिए शुकदेव मुनि ने अनवरत एक सप्ताह तक श्रीमद् भागवत की कथा का रसास्वादन शुकतीर्थ में कराया था। ऐसी मान्यता है कि उस समय ८८ हजार ऋषि मुनि भी इस श्रीमद् भागवत की कथा का श्रवण करने के लिए यहां पधारे थे।
हनुमत धाम के संचालक स्वामी केशवानंद ने ८ साल के प्रयास के बाद शुकतीर्थ परिक्रमा मार्ग का जिला प्रशासन के साथ-साथ इतिहासवेत्ता, पुरातत्व विभाग व धर्माचार्यों का सहयोग लेकर शुकतीर्थ परिक्रमा मार्ग का निश्चय करके उसे मूर्त रूप दिया।

महाभारतकाल में संपूर्ण भरतखंड के दूरस्थ स्थान-स्थान से पधारे समस्त ऋषि-मुनियों ने तब यहां शुकतीर्थ में अनेक दिवसों तक प्रवास करके श्री शुकदेव मुनि के श्रीमुख से राजा परीक्षित को सुनाई गई श्रीमद् भागवत कथा का अमृतपान किया था। उन सब ऋषि मुनियों के यहां की तत्कालीन आवासीय शिविरों व पूजा केंद्रों को ध्यान में रखकर पुरातत्त्ववेत्ताओं व धार्मिक आचार्यों की मंत्रणा के बाद शुकतीर्थ परिक्रमा का पैदल मार्ग तय किया गया है।

पतित पावनी गंगा के घाट पर दर्शन पूजन के बाद हनुमत धाम स्थित नक्षत्र वाटिका के कल्पवृक्ष से प्रारंभ यह परिक्रमा गंगा किनारे होते हुए बिहारगढ़ स्थित माता काली के मंदिर, शिव मंदिर इलाहाबास, बहूपूरा शिव मंदिर, फिरोजपुर जंगल में स्थित आदिकाल का सिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर,आदि ग्रामों से निकलती हुई नीलकंठ महादेव के दर्शन के बाद प्राचीन पार्वती मंदिर होते हुए पुणः शुकतीर्थ के दुर्गा धाम, शिव धाम, शुकदेव आश्रम पर प्राचीन अक्षय वटवृक्ष की पूजा परिक्रमा और शुकदेव मंदिर व आश्रम परिसर के अन्य देवदर्शन और स्वामी कल्याण देव जी की समाधि के दर्शन के बाद गणेश धाम से होकर हनुमतधाम में दर्शन करके नक्षत्र वाटिका पर परिक्रमा पूर्ण होती है।

दीनदुखियों के हितों के लिए इस परिक्रमा मार्ग का निर्माण किया गया है। पैदल परिक्रमा करने के लिए किसी विधि विधान की आवश्यकता नहीं है। कीर्तन व भगवान नाम का जाप करते हुए श्रद्धालु भक्त आगे बढ़ते हैं। इस परिक्रमा को करने से साधक की समस्त इच्छाएं पूरी होंगी, द्वादश मंत्र जाप से जो साधक यह परिक्रमा करेगा उसकी फलश्रुति कई गुना बढ़ जाएगी ऐसा श्रद्धालुओं का विश्वास है।

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