___________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के१०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना कि धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सिद्ध पीठ श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर देवबन्द

पौराणिक काल में इस स्थान को देवी वन कहा जाता था। यह सिद्ध पीठ आदि अनादि काल से यहां पर स्थित है। प्राचीन काल में देवी का सिद्ध पीठ घने वनों से घिरा हुआ था और पतित पावनी गंगा इसी क्षेत्र से होकर बहती थी। महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के वर्णन से प्रतीत होता है कि पांडवों ने इसी वन में अपना पहला पड़ाव डालकर कुछ समय व्यतीत किया था और धनुर्धारी अर्जुन ने शक्ति की साधना इसी देवीवन में की थी।

श्री मां त्रिपुर बाला सुंदरी मां जगदंबा महाशक्ति का एक रूप है। आद्या महाशक्ति की मंत्रमयी मूर्ति श्री विद्या है और श्री विद्या ही वह परम तत्व है। जिसे उपासक ललिता महात्रिपुर सुंदरी कहते हैं। ललिता सहस्रनाम के अनुसार श्री चक्र में निवास करने वाली त्रिपुर सुंदरी श्री शिवा ललिता अंबिका शिव शक्ति के रूप में भदर रहित ऐक्यरूपा हैं। विद्वानों के अनुसार ब्रह्मा विष्णु महेश रूप तीन शरीर (पुर) जिनमें है वह त्रिपुर है और उनकी सुंदरी शक्ति त्रिपुर सुंदरी है। तंत्र सार में कहा गया है की मां भगवती राजराजेश्वरी प्रातःकाल के सूर्य मंडल की आभा वाली हैं। मां भगवती के चार भुजाएं और तीन नेत्र है । वह अपने चारों हाथों में पाश, धनुष, बान और अंकुश धारण किए हुए हैं। उनके मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है। मां त्रिपुर सुंदरी ने भंडासुर का वध किया था। भंडासुर १०५ ब्रह्मांडों का अधिपति था। एक ब्रह्मांड में १४ लोक होते हैं।

मार्कंडेय पुराण में वर्णन है। एक समय जब भंडासुर नाम के राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। देवताओं की पुकार पर मां भगवती ने अपनी शक्ति से उस राक्षस का वध किया था। जिस स्थान पर भंडासुर से त्रस्त देवताओं ने एकत्र होकर महामाया से अपने जीवन की रक्षा के लिए अनुनय किया था वह स्थान देववृन्द कहलाया।

मां त्रिपुर बाला सुंदरी के वर्तमान मंदिर को कब और किसने बनवाया इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। मंदिर के गर्भ ग्रह के द्वार पर अज्ञात भाषा में एक शिलालेख लगा है। इस शिलालेख की भाषा को अभी तक कोई पढ़ नहीं पाया है। समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा बताया जाता है। अंतिम बार इस मंदिर का जीर्णोद्धार मराठा राजा रामचंद्र द्वारा करवाया गया था। मंदिर के गर्भ गृह में बने भित्तिचित्रों की भाव मुद्राओं से मंदिर के जीर्णोद्धार के समय का पता चल सकता है। लेकिन अब भित्ति चित्र भी इतने धूमिल और नष्ट हो गए हैं कि उससे अध्येता भी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सकते हैं।

मंदिर के गर्भ गृह में मां प्राकृत रूप में एक नन्ही सी स्वयंभू प्रतिमा में विराजमान हैं। पुजारी अपनी आंखें बंद करके प्रतिदिन प्रतिमा को स्नानादि कराते हैं। स्वयंभू प्रतिमा १५ सेंटीमीटर ऊंची और १० सेंटीमीटर व्यास के लालिमा युक्त धातु के बने शिवलिंगाकार गिलासनुमा आवरण से ढकी हुई रहती हैं।

मां त्रिपुर बाला सुंदरी मंदिर के पार्श्व में माता काली का प्राचीन मंदिर है। बहुत पहले यहां बली भी दी जाती थी। लेकिन अब वह परंपरा समाप्त हो गई है। प्रतीक रूप में मेले के समय आज भी जिंदा बकरे भेंट स्वरूप यहां चढ़ाए जाते हैं। इस मंदिर के पास में ही एकनाथ योगी की समाधि है। आज भी जोगी जाति के लोग ही काली माता मंदिर के पुजारी हैं।

देवी मंदिर परिसर में और भी अनेक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर के दाईं ओर शाकुंभरी देवी का मंदिर है तथा पास में ही ग्यारह मुखी महादेव मंदिर व माता अन्नपूर्णा के चमत्कारी मंदिर हैं। इन प्राचीन मंदिरों में भी भित्ति चित्र बने हुए हैं जो इस समय धूमिल पड़ चुके हैं। सती, दूधाधारी, लौंकडिया बाबा व काल भैरव के मंदिर भी इसी परिसर में है।

देवी मंदिर के ठीक सामने 18 बीघा भूमि में फैला देवी कुंड है। कुंड के एक छोर पर स्वयं प्रकट बूढ़े महादेव का सिद्ध मंदिर है।

इस देवी कुंड के पूर्वी तट पर धानु बंजारे की समाधि है ।कहते हैं कि अपने आराध्य देवी की कृपा पाने के लिए धानू भगत ने अपना शीश काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया था। धानु के वंशज दूर- दूर से आकर देवी की पूजा करने से पहले धानु बंजारे की समाधि पर माथा टेककर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

देवी कुंड क्षेत्र में सतियों के बड़ी संख्या में सती स्मारक बने हुए हैं। इन सती स्मारकों के साथ औरंगजेब के दिल दहलाने वाले अत्याचारों की कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि औरंगजेब के शासन में हिंदुओं पर जजिया कर थोप दिया गया था। जजिया कर को अदा किए बिना किसी भी हिंदू को शव जलाने की अनुमति नहीं थी। इससे हिंदुओं में भारी रोष था। नगर के एक साहसी युवक सोल्हड मिश्र ने इस अनाचार के विरुद्ध युवकों को इकट्ठा किया और इसका प्रतिकार करने का बीड़ा उठाया। उसने इसकी शुरुआत अपनी माता के निधन पर की। जनश्रुति के अनुसार पूर्व योजना से उसने बिना कर दिए ही अपनी माता का दाह संस्कार कर दिया। फलस्वरूप मुगल सैनिकों और मिश्रा जी के साथियों में जमकर संघर्ष हुआ। जिसमें सैकड़ों हिंदू युवक काम आए। उन वीरों की पत्नियां भी उस समय की प्रथा के अनुसार अपने पतियों की चिता के साथ यहीं सती हो गई। यह स्मारक आज भी उन सतियों की गौरव गाथा का बखान कर रहे हैं।

यहां प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को इस क्षेत्र का एक विशाल मेला लगता है। जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान के श्रद्धालु देवी दर्शन के लिए आते हैं और मनोतियां पूरी करते हैं।
भक्तों की मान्यता है कि मां भगवती इस सिद्ध पीठ में चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को प्रवेश करती हैं। देवी के प्रवेश एवं प्रस्थान के समय वर्षा के साथ जोरो की आंधी आती है। जैसे ही देवी के भवन में प्रवेश का समय आता है। तेज हवाएं चलती है। हल्की वर्षा की बौछारें भक्तों के तन- मन को स्पंदित कर देती है। यह करिश्मा देवी के भक्त प्रतिवर्ष देखते हैं और आनंदित होकर श्रद्धा से देवी को नमन करते हैं। देवी के भवन से जाने के समय भी देवी भगवती इसी प्रकार का संकेत करके जाती हैं।
हजारों श्रद्धालु भक्त श्रद्धा- भक्ति, बोल- कबूल के अनुसार मंदिर में नगद धनराशि, हलवा – पूरी, प्रसाद, पुष्प, नारियल चुनरी, चांदी के छत्र आदि चढ़ाते हैं। यह मेला जनवादी भावनाओं का अनोखा संगम है। इस मंदिर में पहले से ही कथित अछूतों के लिए कभी भी प्रवेश वर्जित नहीं रहा है। देवी की चौदस का यह मेला उस समय लगता है। जब रबी की फसल कटने के लिए तैयार होती है। इसलिए इस क्षेत्र का किसान और उसका साथी खेतिहर मजदूर इस मेले को अपनी समृद्धि और उल्लास का प्रतीक मानता है।

देवबंद के सिद्ध पीठ देवी मंदिर की राजस्थान व मारवाड़ के क्षेत्रों में विशेष मान्यता है। जहां से हर वर्ष सैकड़ों भक्त यहां मनौती और उसके पूरा हो जाने के बाद पूजन करने आते हैं। यह राजस्थानी श्रद्धालु लोग राजस्थान में बसे मराठों के वंशज ही हैं। जिन्हें यहां जातरू कहा जाता है। बंजारा जाति के दूसरे प्रदेशों हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात आदि से कई परिवार तो मेला प्रारंभ होने से 15 दिन पहले से ही आने शुरू हो जाते हैं। ‘जातरू’ देवी मंदिर में प्रवेश से पूर्व धानु भक्त व सती दूधाधारी की पूजा करते हैं। रंग- बिरंगे परंपरागत वेशभूषा में सजी जातरूओं की टोलियां दिन-रात माता के गुणगान में लीन रहती हैं। इनके लोकगीत रूपी भजनों को सुनने व इनकी परंपरागत वेशभूषा में इनके नृत्यों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।

मान्यता है कि देवबंद में विराजमान माता बाला सुंदरी एवं सहारनपुर जनपद में ही शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित माता शाकुंभरी देवी दोनों सगी बहने हैं। इसलिए मां शाकुंभरी देवी के दर्शनों हेतु जाने वाले जो श्रद्धालुगन देवबंद से होकर गुजरते हैं। वह माता बाला सुंदरी के इस पवित्र स्थल के दर्शन करना भी जरूरी समझते हैं और यहां माता के दर्शन करने के बाद ही आगे देवी शाकुंभरी के दर्शन के लिए जाते हैं।

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