__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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तीर्थ नगरी हरिद्वार पौराणिक काल से ही देवी देवताओं की नगरी रही है। मोक्ष दायिनी देवनगरी हरिद्वार को मायापुरी के नाम से भी जाना जाता है। संसार की रचना और संहार करने वाली साक्षात माया भगवती का यह निवास क्षेत्र रहा है।

हरिद्वार एक बड़ा तंत्र साधना का केंद्र भी है। हरिद्वार कि यदि भौगोलिक स्थिति को देखा जाए तो इसकी स्थापना भी एक देवी के त्रिकोण यंत्र पर आधारित है।। तंत्र साधकों के अनुसार देवी के पूजन के यंत्र में भी इस त्रिकोण का विशेष महत्व है।

हरिद्वार में पूर्व दिशा में गंगा के किनारे नील पर्वत तंत्र शक्ति का केंद्र है। नील पर्वत के शिखर पर पौराणिक चंडी देवी का मंदिर, पश्चिम में शिवालिक पर्वत के शिखर पर पौराणिक मनसा देवी का मंदिर तथा दक्षिण में सिद्ध पीठ भगवती श्री माया देवी का पौराणिक मंदिर एक त्रिकोण के आकार में स्थित हैं।

कुछ प्राचीन ग्रंथों में गंगा की प्रमुख प्राचीन नीलधारा के तट पर विख्यात दक्षिण काली के मंदिर का वर्णन भी देखने को मिलता है।

श्री दक्षिण काली मंदिर तंत्र साधना एवं अनुष्ठान के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। हरिद्वार में नीलधारा के बिल्कुल किनारे एकांत स्थान में स्थित दक्षिण काली का यह मंदिर एक अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक सिद्ध पीठ है।

शताब्दियों पूर्व इस दक्षिण काली मंदिर की स्थापना आल्हा उदल व रानी मंछलावती के शासन के समय विख्यात तांत्रिक कहे जाने वाले नाथ संप्रदाय के योगी गुरु अमरा बाबा अर्थात बाबा कामराज जो प्रख्यात योद्धा आल्हा ऊदल के गुरु थे ने की थी। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा कामराज जी ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। नील पर्वत का क्षेत्र बाबा कामराज की तपस्थली थी और यहां कामराज जी ने तंत्र साधना की थी। कहा जाता है कि गुरु अमरा जब भ्रमण करते हुए इस क्षेत्र में आए थे तो यहां पूर्व स्थापित काली प्रतिमा की अद्भुत चुंबकीय शक्ति से प्रभावित होकर वहीं रह गए और तंत्र मंत्र की साधना में जुट गए। आल्हा ऊदल के किले के अवशेष आज भी इस क्षेत्र में देखे जा सकते हैं।

बाबा कामराज ने काली के इसी मंदिर में शिवत्व को प्राप्त किया तथा स्वत: ही कुछ मंत्रों की रचना भी की थी। इससे पहले मंदिर में काली का स्थान पिंडी स्वरूप था जिस पर बाबा कामराज ने १०८ नरमुंडो की बलि देकर संपूर्ण रूप में देवी को जागृत किया था।

यह नरमुंड जीवित व्यक्तियों के नहीं थे अपितु उन मृत व्यक्तियों के शव थे जिन्हें बाबा कामराज ने गंगा की धारा में से उठाकर जान फूकीं थी। तंत्र साधना के अनुसार जो साधक काली देवी की साधना करते हैं उनके आसन के नीचे नरमुंड अवश्य होते हैं।

कुछ तांत्रिकों के मतानुसार काली की साधना में नर मुंडो के स्थान पर नारियल दबाए जाते हैं। इस संदर्भ में अलग-अलग तांत्रिक विद्वान ‌अलग-अलग विचार व्यक्त करते हैं।

वास्तव में यदि देखा जाए तो यही लगता है कि यहां स्थित काली की संपूर्ण मूर्ति मानव गठित नहीं है और यह भी नहीं मालूम कि कब से और कैसे यहां है? इस प्रसिद्ध दक्षिण काली मंदिर की स्थापना भी विशुद्ध तांत्रिक पद्धति के अनुसार हुई है और इस काली मंदिर का निर्माण भी श्रीयंत्र के अष्ट कमल के आधार पर हुआ है।

ऊपर के मंदिर का निर्माण जिसे गद्दी कहते हैं बाबा कामराज के शिष्य श्री कालिका नंद जी ने कराया था। गद्दी के पीछे ही भैरव जी की पिंडी है। काली के दर्शन के बाद भैरव जी के दर्शन करना अनिवार्य होता है और संपूर्ण पूजा फलित होती है।

इस काली मंदिर के गर्भ गृह में एक गुफा भी है कहा जाता है कि पहले यह गुफा नीचे गंगा की नीलधारा के तट पर कालीकुंड तक जाती थी। बाबा कामराज जी इसी गुफा के रास्ते गंगा स्नान के लिए जाया करते थे। बहुत पहले इस गुफा को बंद करवा दिया गया था।

कुछ श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा कामराज आज भी जीवित हैं और चंडी देवी मंदिर के वन में कहीं बाहर भाग्यशाली श्रद्धालुओं को दर्शन दे चुके हैं। बताते हैं कि कुछ श्रद्धालुओं को इस नील पर्वत पर लंगड़े बाबा और शेर के रूप में बाबा कामराज जी दर्शन दे चुके हैं।

चंडी देवी के दर्शन के लिए जाते समय चढ़ाई शुरू होते ही दक्षिण काली का यह प्रसिद्ध मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण दिखाई देता है। यहां नीचे कल-कल करती पावन गंगा और चारों तरफ हरियाली लिए हुए घने वृक्षों से आच्छादित वन का दृश्य श्रद्धालुओं के चित्त को एक विलक्षण शांति से भर देता है।

जिस स्थान पर आज चंडी देवी मंदिर स्थित है, वहां श्री कालिका नंद जी का पूर्व में पूजा का स्थान था। सन 1920 के वन विभाग सर्वे ऑफ चीफ कंजेर्वेटिव के आदेशानुसार भी चंडी देवी पर्वत तथा मंदिर पर जाने का एकमात्र अधिकार श्री दक्षिण काली मंदिर के पुजारियों को ही था। सन 1935 के बाद स्थापित चंडी देवी के मंदिर के बारे में कहा जाता है कि श्री कालिका नंद जी के शिष्य श्री देवी चंद जी ने ही इसकी स्थापना की है। ‌

श्री दक्षिण काली मंदिर पर प्रतिवर्ष कामराज का वार्षिक भंडारा तथा नवरात्रों में सप्तमी पर विशेष आयोजन होता है। मंगलवार तथा शनिवार के दिन यहां श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है।

आज भी देश के कोने कोने से तांत्रिक साधना करने के लिए साधक यहां साधना करने के लिए आते हैं। दक्षिण काली मंदिर नवरात्रों के समय विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है यहां दूर-दूर से आए हुए तांत्रिकों का जमघट लगा रहता है। सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए देवी काली के इस दक्षिण काली मंदिर में पूजा अर्चना और आराधना करने वाला कोई भी श्रद्धालु व्यक्ति कभी निराश नहीं लौटा है।

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