___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के १००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शिवालिक पर्वत श्रेणियां प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जानी जाती है। शिवालिक पर्वत श्रंखला इस क्षेत्र में तीन राज्यों के हरिद्वार, बिजनौर, सहारनपुर, देहरादून, यमुनानगर, अंबाला आदि जनपदों में स्थित है। इस क्षेत्र में स्थित शिवालिक पर्वत श्रेणी में बहुत से प्रसिद्ध पर्यटन स्थल और कई प्रसिद्ध मंदिर एवं सनातन हिंदू धर्म के तीर्थ स्थल स्थित हैं।

इस क्षेत्र में शिवालिक पर्वत श्रेणियों में ऋषिकेश-हरिद्वार देहरादून- मसूरी, पंचकूला में मोरनी पहाड़ियां, पोंटा साहिब, आदिबद्री, यमुनानगर में कालेसर नेशनल पार्क, हरिद्वार में राजाजी नेशनल पार्क, हथिनी कुंड बैराज आदि प्रसिद्ध स्थान स्थित हैं।

शिवालिक पहाड़ियों का नाम संस्कृत शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है शिव से संबंधित। शिवालिक दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव+अलक जिसका अर्थ है भगवान शिव की भौंहें। ऐसा क्यों कहा जाता है, इस बात का स्पष्ट उल्लेख किसी जगह पर नहीं है, लेकिन लोगों की मान्यता है कि इस क्षेत्र में शिवालिक नाम की दो नदियां बहती थी इससे ही इस पर्वत श्रेणी का नाम शिवालिक पड़ा होगा और शिवजी की दो भौंहों का उनसे कोई संबंध हो।

भूगोलवेत्ता और वैज्ञानिक इस पर्वत श्रेणी को मैनाक पर्वत कहते हैं। शिवालिक पर्वत श्रंखला के और भी नाम हैं। हिमालय के गिरीपद, यह ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां हिमालय पर्वत श्रेणी समाप्त होती है और तराई का भाभर इलाका आरंभ होता है।

हिमालय के समानांतर शिवालिक पर्वतमाला सिंधु और गंगा नदियों के मैदानों के बीच में स्थित है। शिवालिक पहाड़ियों को उपहिमालयी श्रेणी शिवालिक पर्वत श्रेणी का बाह्य हिमालय भाग भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है यह हिमालय पर्वत की सबसे बाहरी दक्षिणी पर्वत श्रेणी है। यह भौगोलिक रूप से सबसे तरुणतम श्रंखला है तथा सबसे बाद में बनी है, जो पश्चिम से पूर्व तक फैली हुई है। इसकी कई उप श्रेणियां हैं। सबसे नवीन पर्वत श्रेणी होने के कारण यहां जीवाश्म भी पाए जाते हैं जो कि हिमालय पर्वत श्रेणी में और किसी भी स्थान पर नहीं पाए जाते।

पुराने हिमालय पर्वत से मलबे द्वारा गठित शिवालिक रेत- पत्थर, मिट्टी और पिंडों के संगठन तथा एक अत्यधिक नाजुक प्रणाली के तलछटी चट्टानों से बना है। बहुत तेज बारिश के दौरान तेज बहाव के कारण यहां बहुत अधिक कटाव होता है। बाढ़ रेत और पत्थरों को बहाकर निरंतर परिवर्तित होती धाराओं में ले जाती है।

भारत में हरिद्वार से गंगा नदी से पश्चिम उत्तर दिशा में व्यास नदी तक इस पर्वत श्रंखला का विस्तार पाया जाता है। यह उत्तर प्रदेश के हरिद्वार,सहारनपुर और मसूरी के पर्वतों से निकलती है। यह पहाड़ियां गंगा के मैदानों से अचानक उठती हैं और प्रमुख हिमालय श्रेणी के समानांतर हैं। ये पहाड़ियां इस क्षेत्र के अंबाला जिले से हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले को पार कर जाती हैं।

एक और विशेषता शिवालिक पर्वत श्रेणी की यह है कि यह पर्वत श्रंखला क्रम में नहीं है यानी कि लगातार नहीं है बल्कि बीच-बीच में खंडित है।इस क्षेत्र में शिवालिक पर्वत श्रंखला क‌ई नदियों द्वारा खंडित हो गई है। हरिद्वार में गंगा नदी एवं देहरादून में यमुना नदी में इस पर्वत श्रंखला को खंडित कर दिया है। इसी कारण इन कटाव वाले क्षेत्रों में भूस्खलन होता है और गहरी घाटियां जैसे कंदरा घाटी बन जाती है।

सहारनपुर उत्तर प्रदेश से देहरादून और मसूरी के पर्वतों में जाने के लिए मोहन दर्रा इस श्रेणी का प्रधान मार्ग है।

शिवालिक पर्वत श्रेणी के उत्तरी ढलान भाग में चौरस समतल घाटियों को दून कहते हैं। देहरादून इसी तरह की घाटी है। ये दून सघन आबादी वाले क्षेत्र है।

इस क्षेत्र का पूरा शिवालिक पर्वतमाला इलाका प्राकृतिक वनस्पतियों और औषधियों वाले पौधों से भरा पड़ा है। पूरा क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहां पौधों और जानवरों की प्रजातियों की एक अद्भुत विविधता पाई जाती है। इस पर्वतश्रेणी के निचले भागों में शीशम, सेमल, आंवला,टुन, अमलतास, बांस, सागौन आदि के वृक्ष पाए जाते हैं।

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