__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मुजफ्फरनगर जनपद से गहरी यादें जुड़ी हुई हैं। तब किसने सोचा था कि बचपन से ही कठिन एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहने वाला यह शख्स एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा और पूरे देश का प्रेरणास्रोत बन जाएगा।

छोटे कद तथा ऊंचे एवं दृढ़ विचारों वाले शास्त्री जी ने मुजफ्फरनगर जनपद के ग्रामीण अंचलों में स्वदेशी और स्वाधीनता का लंबे अरसे तक प्रचार किया था।

स्वाधीनता से पहले सन 1922 से 1926 तक वे मुजफ्फरनगर जनपद में रहे।

इस जनपद के बिरालसी गांव के महर्षि गुरुकुल में शास्त्री जी ने संस्कृत पढ़ाई थी। इस गुरुकुल की नींव स्वामी दर्शनानंद जी द्वारा 1905 में रखी गई थी। काशी विद्यापीठ से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी से हाई स्कूल उत्तीर्ण करने के बाद सन 1922 में शास्त्री जी की संस्कृत पढ़ाने की इच्छा उन्हें यहां खींच लाई थी। शास्त्री जी की इस गुरुकुल में बतौर शिक्षक शास्त्री नियुक्ति हुई थी। उस समय उनका वेतन मात्र ₹5 प्रतिमाह था। यहां के लोग उनके अनुशासन और सादगी के कायल थे। गुरुकुल में अध्यापन के बाद शास्त्री जी गुरुकुल की गायों को चराने के लिए जंगल ले जाते थे। गायों को चराने के लिए ले जाते समय वह अपने साथ एक मोटा डंडा (सोटा) लेकर जाते थे, उनके सिर पर बड़ी सी चोटी थी इसलिए गुरुकुल में उनकी पहचान चोटा-सोटा वाले मास्टर जी की हो गई थी। तीन वर्ष तक शास्त्री जी ने इस गुरुकुल में अध्यापन का कार्य किया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के कारण उन्हें इस गुरुकुल में संस्कृत अध्यापन छोड़ना पड़ा। पंडित मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय जी ने जब ‘लोक सेवा संघ’ की स्थापना की तब उन्होंने कार्यकर्ता के रूप में शास्त्री जी को मुजफ्फरनगर जिले में ही खादी,स्वदेशी, हिंदी, गोपालन तथा अछूतोद्धार की जिम्मेदारी सौंपी थी।

बापू से किए गए वादे को साकार करने के लिए हारमोनियम और ढोलक के साथ शास्त्री जी अपनी मंडली को लेकर गांव-गांव स्वाधीनता के प्रचार में जुट गए।
प्रचार के लिए चुने गए गांव में एक दिन पहले ही मुनादी हो जाती थी। गांव की चौपाल पर शास्त्री जी को सुनने के लिए ग्रामीण उमड़ पड़ते थे।

स्वाधीनता की अलख जगाने के लिए लाल बहादुर शास्त्री जी ने मुजफ्फरनगर जनपद के गांवों को अपना अमूल्य समय दिया था। उस समय शास्त्री जी मुजफ्फरनगर जनपद के ग्रामोत्थान में लगे शिक्षा ऋषि स्वामी कल्याण देव जी से मिले थे और उन्होंने इस कार्य में उनका सहयोग मांगा था।

मुजफ्फरनगर की धरती एवं यहां के लोगों से उन्हें गहरा लगाव था। शास्त्री जी के जीवन की बहुमूल्य स्मृतियां इस जनपद की माटी से जुड़ी हुई हैं। कई बार वह मुजफ्फरनगर आए। यहां के लोगों के नाम उन्हें जुबानी याद थे। नई मंडी के आर्य समाज में शास्त्री जी ने कई बार प्रवास किया था। बहुत कम लोगों को मालूम है कि शास्त्री जी नई मंडी की वकील रोड पर किराए की एक कोठरी लेकर रहे थे।

मुजफ्फरनगर जनपद के प्रसिद्ध तीर्थ शुकतीर्थ से उनका भावनात्मक रिश्ता रहा है। समय-समय पर वे इस तीर्थ में पधारते रहे थे। उस स्मृति को एक शिलापट पर अंकित किया गया। शुकतीर्थ में शुकदेव आश्रम में मंदिर की सीढ़ियों को चढ़ते हुए बाएं ओर वह शिलापट लगा हुआ है।

शास्त्री जी के द्वारा स्वामी कल्याण देव जी को लिखें गए पत्रों में भी शुकतीर्थ के प्रति उनकी आत्मीयता का पता चलता है। वह पत्र शुकदेव आश्रम मैं आज भी सुरक्षित हैं।

भारत के स्वतंत्र होने के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री रहते समय भी शास्त्री जी इस जनपद में पधारे थे और अपने पुराने परिचितों को भूले नहीं थे।

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