______________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और स्थान के बारे में – – – -____________________________________________

देहरादून के आसपास फैले रमणीय स्थानों में से सबसे पहले बाहर से आये सैलानी पर्यटक जिस स्थान की तरफ आकर्षित होते हैं वह है सहस्त्रधारा। जैसे कि नाम से ही ज्ञान हो जाता है, अगणित धाराओं के रूप में निरंतर गिरती जलधाराएं।जिसकी सुंदरता से हर कोई आगंतुक मोहित हो जाता है।

यहां प्राकृतिक रूप से सल्फर जल के स्रोत व शीत गुफाएं हैं। यहां के पर्वतीय व मनोहारी दृश्य पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। दोनों तरफ हरे-भरे पहाड़ और उनके बीच बलखाती बाल्दी नदी की शीतल जलधारा, एक ऐसा दृश्य जिसे कोई भी प्रकृति प्रेमी शायद ही भुला पाएगा।

सहस्रधारा पहुंचने पर सैलानियों को एक अद्भुत दृश्य के दर्शन होते हैं। एक झुकी हुई पहाड़ी पर से लगातार टपकती हुई जल की बूंदें यह अहसास कराती हैं जैसे कि बारिश हो रही है। नीचे बहती छोटी पहाड़ी नदी दृश्य को और भी मनोहारी बना देती है।

इस झुकी पहाड़ी के नीचे पहुंचने पर म‌ई-जून के गर्मी के मौसम में भी सर्दी का अनुभव होता है और पूरे शरीर में एक झुरझुरी ही दौड़ जाती है।

पहाड़ से झरती सहस्त्रौं धाराओं में भिगकर भी सैलानियों को आनंद का अनुभव होता है। खासतौर पर गर्मियों में तो इस पानी में भिगने से अलग ही आनंद आता है। भीगने के अलावा नदी में गोते लगाने का मन भी सैलानियों को होता है।

यहां के प्रसिद्ध गंधक के चश्में में नहाने का लोभ भी पर्यटकों में होता है। गंधक(सल्फर) की चट्टानों से निकलने वाले पानी का औषधीय महत्त्व है।इस जल में स्नान करने से त्वचा के अनेक रोग ठीक हो जाते हैं। चर्म रोगों से ग्रस्त लोगों को यहां धटों तक नहाते देखा जा सकता है।

सहस्रधारा पर पहाड़ी के एक संकरे से रास्ते को पार करके पर्यटक जब ऊपर पहुंचते हैं तो उन्हें अनेक गुफाएं दिखाई देती हैं। इन औसत ऊंचाई वाली गुफाओं से लगातार पानी टपक कर नीचे गिरता रहता है और एक प्राकृतिक झरने के रूप में बहकर नीचे बाल्दी नदी में गिरता है।

चूना पत्थर के पहाड़ में बनी गुफाओं से कैल्शियम कार्बोनेट पानी के साथ घुल कर गुफाओं में बूंद-बूंद करके टपकता रहता है। हजारों साल से हो रही इस यौगिक क्रिया से गुफाओं की छत पर कैल्शियम कार्बोनेट जमकर लटकी हुई नुकीली शलाकाओं का रूप ले चुका है। गुफाओं के फर्श पर भी इसी तरह के नुकीली शलाका खंम्भों की तरह खड़ी हुई दिखाई देती हैं। गुफाओं में जहां-जहां पानी टपकता है, वहां-वहां यह आकृतियां बन जाती हैं। गुफाओं में बने प्रकृति के इस अद्भुत दृश्य को देखकर पर्यटक अचरज में पड़ जाते हैं।

इसी पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर भी है,जिसे द्रोणाचार्य के मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि इस स्थान पर द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी।

यहां चूना पत्थर की पहाड़ी होने के कारण बड़ी संख्या में चूना पत्थर खदानों के पट्टे बांटे गए। कई दशक तक इन पहाड़ियों के चूने के पत्थर का जमकर दोहन हुआ। जिससे यहां के पेड़-पौधे नष्ट हो ग‌ए भू-स्खलन और भू-क्षरण की घटनाएं हुई। पहाड़ से टपकने वाले पानी में भी कमी आयी। नतीजतन धीरे-धीरे यह स्थान एक सुंदर पर्यावरण वाले स्थान की जगह एक विकृत पहाड़ियों वाली जगह में बदलता चला गया।

दून घाटी के नागरिक और ग्रामीण सहस्रधारा और समूची घाटी की दुर्दशा को देखकर बेहद चिंतित हुए। इसको लेकर उन्होंने आंदोलन किए और न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कई साल तक किए ग‌ए संघर्ष के बाद न्यायालय ने चूना खदानों को बंद करने के आदेश दिए। इस विजय के बाद गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों तथा सरकारी योजनाओं से यहां की पहाड़ियों को फिर से हरा-भरा करने की कोशिश की गई। इतनी कोशिशों के बाद भी सहस्रधारा की पुरानी खूबसूरती नहीं लौट पायी।

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