_________________(मुजफ्फरनगर जनपद-उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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यदि एक-एक व्यक्ति बदलें तो नि:संदेह राष्ट्र बदल जाएगा। ‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’इसी भावना से राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगी एक संस्था ‘शांतिकुंज’ हरिद्वार में स्थित है।

हरिद्वार का एक क्षेत्र जो सप्त ऋषियों की तपोस्थली के रूप में विख्यात है और सप्तसरोवर के नाम से जाना जाता है। इसी क्षेत्र में ऋषिकेश मार्ग पर एक बड़े विस्तृत भू-भाग में ‘शांतिकुंज’ स्थापित है। इसके उत्तरी भाग में शिवालिक की पर्वतश्रेणियां तथा दाएं ओर कलकल निनाद करती हुई गंगा जी बहती हैं।

शांतिकुंज एक बड़ा आश्रम है। यह हरिद्वार का सर्वाधिक चहल-पहल वाला आश्रम और लाखों लोगों की श्रद्धा का केंद्र है। इस तीर्थ स्थल की स्थापना सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रसंत प.श्रीराम शर्मा जी ने की थी। आचार्य श्री राम ने सन्१९७२ में दुर्गम हिमालय में कार्यरत ऋषियों की परंपरा का बीजारोपण कर शांतिकुंज को एक सिद्धपीठ के रूप में विकसित किया था। आचार्य श्री राम की धर्मपत्नी भगवती देवी का भी उनके कार्यों में पूर्ण योगदान रहता था।यह स्थान तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा व माता भगवती देवी शर्मा की तप साधना की उर्जा से अनुप्राणित है।

यहां पर गायत्री माता का एक भव्य तथा विशाल देवालय तथा सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना के साथ एक भटके हुए देवता का मंदिर भी है।शांतिकुंज के मुख्य द्वार पर सूर्य देव की एक बड़ी प्रतिमा है। आंतरिक भागों में सामूहिक हवन कुंड बने हैं।

परिसर के एक कक्ष में सन १९२६ से निरंतर प्रज्जवलित एक अखंड दीपक यहां स्थापित है। जिसके सानिध्य में नित्य करोड़ों मंत्रों का गायत्री अनुष्ठान चलता रहता है। लाखों-करोड़ों गायत्री जप यहां संपन्न हो चुके हैं।इसके सानिध्य में ही आचार्य श्री राम शर्मा ने कठोर तपश्चर्या की। आचार्य श्री राम द्वारा जलाया गया यह दीपक इस विशाल गायत्री परिवार की सारी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का मूल स्रोत है।

शांतिकुंज आश्रम की विराट यज्ञशालाओं में नित्य प्रतिदिन नियमित रूप से हजारों गायत्री साधक गायत्री यज्ञ संपन्न करते हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति के अंतर्गत सभी संस्कार जैसे पुंसवन, नामकरण,अन्नप्राशन, मुंडन, शिखास्थापन विद्यारंभ, यगोपवित, विवाह, वानप्रस्थ तथा श्राद्ध कर्म आदि यहां निशुल्क संपन्न किए जाते हैं।

शांतिकुंज परिसर में हिमालय पर्वत की एक 60 फुट चौड़ी तथा 15 फुट ऊंची दिव्य प्रतिमा स्थापित की गई है जिसने सभी तीर्थों का दिग्दर्शन किया गया है।

पं.श्री राम शर्मा का जन्म आंवलखेड़ा में हुआ था। इनके पूज्य पिताजी महामना मदन मोहन मालवीय जी के सहपाठी थे। मालवीय जी ने ही बालक का उपनयन संस्कार करवाया जिसे गायत्री दीक्षा कहा गया। गायत्री की विधिवत दीक्षा देते हुए मालवीय जी ने कहा था कि गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। इसे बिना नागा किए जपते रहना। रोजाना कम से कम पांच माला का जाप अवश्य करना। बालक राम मत्त ने इसे पल्ले बांध लिया। पुरोहित ब्राह्मण परंपरा वाले परिवार में जन्मे बालक श्री राम प्रारंभ से ही जातिगत अहंकार से ऊपर थे, वे इस बारे में कबीर से बहुत अधिक प्रभावित थे।

आचार्य श्री राम शर्मा को पंद्रह वर्ष की आयु में बसंत के पावन दिन प्रातः काल की उपासना के समय ब्रह्म मुहूर्त में उनके सामने कोठरी में एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। जिससे उनकी आंखें चुंधिया गई, विसमय और भय से वह स्तब्ध रह गए। प्रकाश के मध्य में उन्हें एक वैदिक ऋषि का सूक्ष्म शरीर दृष्टिगोचर हुआ जो अधर में लटका हुआ था। उस छवि ने बोलना प्रारंभ किया कि हम तुम्हारे कई जन्मों से जुड़े हैं और तुम्हारा मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। यह कहकर वैदिक ऋषि ने उन्हें पूर्व जन्मों का विवरण दिखा दिया। उस समय उन्हें जागृत समाधि से लग गई थी। उस योगी ने प्रसन्न मुद्रा से उन्हें अपना परिचय दिया तथा आने का कारण बताते हुए बोले हम सूक्ष्म दृष्टि से ऐसे सदपात्र की तलाश करते रहे जिसे सामयिक लोक कल्याण का निमित्त कारण बनाने के लिए प्रत्यक्ष कारण बताएं। यह हमारा सूक्ष्म शरीर है और सूक्ष्म शरीर से स्थूल कार्य नहीं बन सकते। इसके लिए किसी स्थूल शरीर धारी को ही माध्यम और शस्त्र की भांति प्रयुक्त करना पड़ता है। आजकल विषम समय है। इसमें मनुष्य का अहित होने की अधिक संभावनाएं हैं। उन्हीं का समाधान करने के लिए तुम्हें माध्यम बनाना है। जो कमी है, उसे दूर करना है और अपना मार्गदर्शन और सहयोग देना है। इसी निमित्त तुम्हारे पास आना हुआ है और तुम्हें पिछले तीन जन्मों की जानकारी प्रदान की। यह तुम्हारा दिव्य जन्म है। तुमसे वह कराएंगे जो समय की दृष्टि से आवश्यक है। तुम्हारा विवाह भी हो चुका है सो ठीक ही है। प्राचीन काल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, गणेश, इंद्र आदि सभी सपत्नीक थे। संतों-ऋषियों की भी पत्नियां थी। कारण कि गुरुकुल और आरण्यक स्तर के आश्रम चलाने में माता की भी आवश्यकता पड़ती है और पिता की भी। गुरु ही पिता है और गुरु ही पत्नी की माता है, उसी ऋषि परंपरा के निर्वाह के लिए यह उचित भी है। यह सोचना कि इससे कार्य में बाधा पड़ेगी ठीक नहीं वस्तुतः इससे आज की परिस्थितियों में सुविधा ही रहेगी एवं युग परिवर्तन के प्रयोजन में भी सहायता मिलेगी।

उस सुख शरीर धारी ऋषि ने उन्हें उस दिन सभी जीवन संबंधी थोड़ी सी बातें विस्तार से समझाईं। गायत्री महाशक्ति के चौबीस वर्ष में चौबीस महापुरश्चरण, अखंड धृत दीप की स्थापना, चौबीस वर्ष में एवं उसके बाद समय-समय पर कम्र मार्गदर्शन के लिए चार बार हिमालय अपने स्थान पर बुलाना, प्राय: छ: मांस से एक वर्ष तक अपने समीपवर्ती क्षेत्र में ठहराना आदि उन्होंने कुछ और भी विस्तृत जानकारी इस बारे में उन्हें दी तथा अंतर्ध्यान हो गए।

पंद्रह वर्ष की उम्र में अपनी मार्गदर्शक सत्ता के निर्देश और संरक्षण में चौबीस वर्ष तक कठोर तप साधना के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी, भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थों और आश्रमों की यात्रा तथा वहां के वातावरण और साधनाओं का अध्ययन, समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विभूतिवान व्यक्तियों से संपर्क और परामर्श जैसे काम भी आचार्य श्री राम ने इसी अवधि में संपन्न किए। इस अवधि में उन्होंने रामकृष्ण मिशन, महर्षि रमण और अरविंद आश्रम के साथ महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में निवास किया।

यह सब एक-एक काम ऐसे हैं जिन्हें पूरा करने के लिए पूरे एक जीवन की अवधि चाहिए और आचार्य श्री राम के द्वारा यह सब काम अकेले संपन्न किए गए।इन महत्कार्यों से अनुमान लगाया जा सकता है कि नियंता उन्हें किस तरह तैयार कर रहा था।

शांतिकुंज में ‘सजल श्रद्धा’ – ‘प्रखर स्थल’ दो समाधियां स्थापित हैं। आचार्य श्रीराम शर्मा ने इन्हें अपने सामने ही बनवा दिया था। उनका कहना था ‘जब हम शरीर छोड़ देंगे तो हमारे अवशेष इन छतरियों में स्थापित किए जाएंगे। हम लोग इस शांतिकुंज में ही निवास करेंगे। छतरियां हमारे स्थूल स्वरूप का प्रतिनिधित्व करेंगी।’

‘इन छतरियों के बारे में विशेष बात यह होगी कि ये हमारे जीते जी हमारे सामने ही निर्मित होंगी। दुनिया में शायद ही किसी का स्मारक उसके जीते जी बना होगा। लेकिन ये छतरियां हमारा स्मारक थोड़े ही होंगी। यह हमारा निवास है। जन्म के बाद मरण की स्वाभाविक प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद हमारे पार्थिव स्वरूप का निवास होंगी।’

आचार्य श्रीराम शर्मा जी के बताए हुए स्थान पर ये दो छतरियां बनाई गई है। इन समाधियों के निर्माण के लिए तीर्थों से जल रज और शिलाएं मंगाई गई थी, जिन्हें इन छतरियों के गर्भ में स्थापित किया गया। आचार्य श्रीराम शर्मा ने ही इनका नामकरण ‘प्रखर प्रज्ञा’ और ‘सजल श्रद्धा’ किया था।

अध्यात्म और विज्ञान के समन्वित स्वरूप को सरल तथा सुबोध प्रस्तुतीकरण एवं वैज्ञानिक गवेषनाओं, आधुनिक यंत्रों के माध्यम से प्रमाणीकरण और इन विभिन्न विषयों पर इस संस्थान के द्वारा हजारों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

शांतिकुंज को एक आध्यात्मिक सैनिटोरियम के रूप में विकसित किया गया है। जहां शरीर, मन, अंत:करण को स्वस्थ बनाने के लिए वातावरण तथा व्यवहारिक मार्गदर्शन दिया जाता है। अध्यात्म की गूढ विवेचना का सरल व्याख्या सहित यहां नौ दिवसीय प्रशिक्षण शिविर लगाए जाते हैं।

शांतिकुंज में स्थित भव्य जड़ी-बूटी उद्यान में सैकड़ों प्रकार से भी अधिक दुर्लभ वनौषधियां हैं। विश्व भर से आयुर्वेदिक कॉलेजों के शिक्षार्थी तथा वैज्ञानिक इस उद्यान को देखने के लिए आते हैं। विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों के लिए भिन्न प्रकार की दिव्य औषधियों का एक ज्योतिर्विज्ञान से संबंधित उद्यान इस स्थान की एक विलक्षणता है। शांतिकुंज में जड़ी बूटियों के द्वारा जन सामान्य के लिए अत्यंत सस्ती, सुगम और प्रतिक्रिया रहित चिकित्सा पद्धति के विस्तार और विकास के लिए केंद्र स्थापित है।

‌ मंत्रशक्ति, ध्यान, प्राणायाम, यज्ञ आदि सभी विधाओं के विज्ञान सम्मत प्रतिपादनों से लाखों की संख्या में विचारशीलों की मान्यताएं एवं आस्थाएं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से जुड़ी हैं। अध्यात्म विज्ञान के इन महत्वपूर्ण सूत्रों को भौतिक विज्ञान के आधार पर शोध-प्रयोग द्वारा पुण: स्थापित करने का कार्य यहां के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में किया जा रहा है। दुनिया भर से विचार से लोग इसे देखने आते हैं तथा यहां के काम से प्रभावित होकर जाते हैं।

शांतिकुंज के प्रयासों से देशभर में क‌ईं हजार प्रज्ञा मंदिर बने हैं और इसके पत्राचार विद्यालय से भी देश विदेश के जिज्ञासुओं व प्रज्ञा परिवार के सदस्यों के जीवन में दैनंदिन आने वाली समस्याओं के निपटारे के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है। यहां से कई भाषाओं में ‘अखंड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ नामक मासिक पत्रिका प्रकाशित होती है। देश-विदेश के लाखों पाठक इन पत्रिकाओं को पढ़ते हैं। शांतिकुंज में सारे विश्व वैज्ञानिक व शोधार्थी आते हैं जिनके लिए यहां एक भव्य पुस्तकालय तथा वाचनालय बनाया गया है।

शांतिकुंज की विशेषता महिलाओं एवं पुरुषों का सर्वांगीण शिक्षण है। जिसके अंतर्गत यहां प्रशिक्षण सत्रों का संचालन किया जाता है। जिसके अंतर्गत नैतिक, बौद्धिक तथा सामाजिक उत्थान के लिए अध्यापक- अध्यापिकाओं ,विद्यार्थियों तथा व्यवसाय में रुचि रखने वाले नवयुवकों व नवयुवतियों को प्रशिक्षित किया जाता है।

नारी प्रशिक्षण सत्रों में स्वास्थ्य संरक्षण, गृह व्यवस्था, पाककला, गृह वाटिका, सिलाई-बुनाई तथा अन्य अनेक उपयोगी घरेलू उद्योग जैसे मोमबत्ती, बिस्कुट, डबल रोटी, अगरबत्ती, चिप्स व अचार-मुरब्बा बनाना आदि सिखाया जाता है। इसके अलावा स्वयं का आत्म परिष्कार करने हेतु प्रवचन, गोष्टी, संगीत, सत्संग तथा विभिन्न माध्यमों से प्रभावशाली जानकारी दी जाती है।

गायत्री मंत्र पर शांतिकुंज में अच्छी प्रकार से शोध हुई है और मानसिक शांति के लिए इस मंत्र का ध्यान पूर्वक उच्चारण और मन ही मन पाठ बड़ा प्रभाव कर पाया गया है

हजारों उच्च शिक्षित कार्यकर्ता शांतिकुंज में स्थाई रूप से सपरिवार निवास करते हैं। ये कार्यकर्ता निर्वाह हेतु नाम मात्र का भत्ता संस्था से लेते हैं।

अनेकों लोगों के लिए शांतिकुंज एक सिद्ध पीठ की तरह है। वे यहां अपने बच्चों के मुंडन, नामकरण, यगोपवित आदि संस्कार कराते हैं। सैकड़ों लोग प्रतिदिन जन्मदिन और विवाह दिन मनाने यहां आते हैं। आश्रम में बिना दहेज के नाममात्र के खर्च में विवाह संपन्न कराने की व्यवस्था है। वर वधु के परिवार अपने बेटे बेटियों को लेकर यहां आते हैं और उन्हें गृहस्थाश्रम में दीक्षित कर हंसी खुशी वापस लौटते हैं।

शांतिकुंज में पूरी दुनिया के अनेक देशों में इस मिशन के आलोक तथा भारतीय संस्कृति के चिंतन को फैलाया है।

शांतिकुंज को सच्चे अर्थों में युग तीर्थ कहा जा सकता है।इतनी महत्वपूर्ण गतिविधियों के केंद्र को लोग उत्तराखंड का अभिनव तीर्थ कहते हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

हजारों लोग जो उत्तराखंड के बद्री केदार की यात्रा पर जाते समय शांतिकुंज आते हैं और यहीं से अपनी तीर्थ यात्रा आरंभ करते हैं। यहां आने वाला हर व्यक्ति यहां के नैसर्गिक सौंदर्य तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रभावित होता है और बार-बार यहां आने के लिए लालायित रहता है।

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