_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शामली महाभारत एवं मराठा कालीन संस्कृति को समेटे हुए है।शहर के चारों कोनों व मध्य में हजारों वर्ष पुराने सिद्धपीठ शिवालय स्थित है। मान्यता है कि यह प्राचीन मंदिर महाभारत व मराठा काल में निर्मित कराए गए थे। इन मंदिरों के बारे में अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। नगर के चारों कोनों में स्थापित सभी सिद्धपीठ रामायण व महाभारत काल के बताए जाते हैं। इन सिद्धपीठ मंदिरों के बारे में अलग-अलग कहानियां और कहावतें यहां बताई जाती है। श्रावण माह में भारी संख्या में श्रद्धालु इन मंदिरों में पहुंचकर शिवलिंगों का जलाभिषेक एवं विशेष पूजा अर्चना करते हैं। हरिद्वार से कांवड़िए पैदल गंगाजल लाकर यहां स्थापित शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं। इन सिद्धपीठ शिवालयों में नियमित जलाभिषेक से भगवान भोले शंकर श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के समय मराठा सेना की एक टुकडी ने शामली में पड़ाव डाला था, क्योंकि शामली से पानीपत केवल 40 -45 किमी की दूरी पर ही है। कहा जाता है कि शामली के चारों प्रमुख मंदिर एक दूसरे से सुरंग से आपस में जुड़े हुए थे,इन सुरंगों के द्वारा सैनिक एक दूसरे स्थान पर‌ आ जा सकते थे और अपने शत्रुओं पर भी नजर रखते थे।

शामली शहर के मराठाकालीन शिवालय हैं –

* गुलजारी वाला मंदिर – यह मंदिर कैराना रोड पर स्थित है।

* भाकूवाला मंदिर – यह मंदिर माजरा रोड पर स्थित है।

* सती वाला मंदिर – यह मंदिर मौहल्ला पंसारियान नई बस्ती स्थित है।

* सदाशिव मंदिर – यह मंदिर रेलपार स्थित है।

नगर के चारों सिद्धपीठ शिवालयों पर सावन मास में पूजा- अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार से पैदल कांवड में गंगाजल लाकर इन मंदिरों के शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इन मंदिरों के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां नियमित ४१ दिन तक पूजा – अर्चना और जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

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*** गुलजारी वाला शिव मंदिर –

पानीपत – खटीमा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित यह प्राचीन शिवालय सिद्धपीठ स्थान है। यह शिवालय प्राचीन काल से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है।

इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह मंदिर महाभारत कालीन है। कौरव- पांडव में युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र जाते समय भगवान श्री कृष्ण ने श्यामली (शामली) में कुछ समय विश्राम किया था। इसी समय श्री कृष्ण ने शिवलिंग स्थापित कर पूजा अर्चना की थी।

इस मंदिर के बारे में एक मान्यता यह भी है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई के दौरान मराठा सैनिकों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था।

इस प्राचीन शिवालय की शिल्पकला और वास्तु की विशेषता है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर के शिवलिंग पर पड़ती है।

लगभग 850 वर्ष पूर्व इस मंदिर का जीर्णोद्धार शामली के नगर सेठ गुलजारीलाल ने कराया था। तब से इस मंदिर को गुलजारी वाला शिवालय कहा जाने लगा। कहते हैं कि एक रात नगर सेठ गुलजारीलाल को भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर आदेश दिया कि उक्त स्थान जर्जर होकर खंडहर हो चुका है उसका जीर्णोद्धार करवाओ। भगवान शिव के आदेश के बाद सेठ गुलजारीलाल ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

इस शिवालय के जीर्णोद्धार के समय की एक रोचक बात प्रचलित है कि सेठ गुलजारीलाल बहुत धनवान व्यक्ति थे। भगवान शंकर के आदेश पर मंदिर का जीर्णोद्धार कराते समय शिवालय परिसर में स्थित गड्ढों को भरवाने के लिए मिट्टी के स्थान पर केसर का प्रयोग किया गया था। जिसके कारण बहुत लंबे समय तक इस मंदिर के आसपास से गुजरने वाले लोगों को केसर की सुगंध आती रहती थी।

मंदिर की इमारत पर बेहतरीन नक्काशी के कारण यह अपने आप में आकर्षण का केंद्र है।इस मंदिर में शिल्प कला एवं चित्रकला का बेजोड़ और अनूठा संगम देखने को मिलता है। मंदिर में अंदर की ओर तथा शिखर पर चूने के मिश्रण से बनाई गई कलाकृतियां एवं मंदिर में की गई चित्रकारी अपने आप में अनूठी है।

इस मंदिर के पास ही एक सुरंग है, कहा जाता है कि यह सुरंग कैराना के पास जाकर खुलती है। यह भी बताया जाता है कि मराठाओं ने इस मंदिर के पाताल में बनी सुरंगों में रहकर ही अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध युद्ध नीति बनाई थी।
लेकिन सैंकडो सालो से इस सुरंग में कोई आना-जाना नहीं होने के कारण सुरंग में जहरीले जीव-जंतुओं की संख्या बहुत अधिक हो गई थी, इस कारण इस सुरंग को बहुत समय पहले बंद कर दिया गया था।

इस मंदिर में प्राचीन काल से ही सिद्ध मुनि रहते आए हैं। यह सिद्ध मुनि मंदिर में स्थित सुरंग के द्वारा पूजा अर्चना के लिए जाते थे और उसी मार्ग से वापस आकर अपने ध्यान में लग जाते थे।

इस मंदिर में स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ हरियाणा पंजाब से आने वाले श्रद्धालुओं की भी बहुत आस्था है।

*** भाकू वाला मंदिर –

यह मंदिर शामली में माजरा रोड पर स्थित है।

इस स्थान के बारे में बताया जाता है कि रामायण काल में हनुमान जी शक्ति लगने से मूर्छित हुए लक्ष्मण जी की मूर्छा को दूर करने के लिए सुषेण वैद्य द्वारा बताई गई संजीवनी बूटी को लाते समय पर्वत सहित इस स्थान पर रुके थे और यहां पर भगवान शिव की पूजा अर्चना की थी।

इस स्थान पर कई संत – महात्माओं ने तपस्या करके सिद्धियां प्राप्त की हैं।

मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग के बारे में बताया जाता है कि बहुत समय पहले भाकू नामक किसान जब अपने खेत की जुताई कर रहा था, उस समय उसके हल का फाल अचानक किसी वस्तु से टकराया। जब उसने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां शिवलिंग निकला था। बाद में उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया।

इस मंदिर में प्राचीन शिल्प कला को आज भी देखा जा सकता है।

मंदिर के प्रांगण में स्थित 51 फुट ऊंची भगवान शंकर की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है।

*** सती वाला मंदिर – (मुक्तेश्वर महादेव मंदिर)

यह मंदिर शामली में मोहल्ला पंसारियान की नई बस्ती में
स्थित है।

बताया जाता है कि यह मंदिर बहुत पुराना है। यहां शिवलिंग के साथ – साथ मां पार्वती का मंदिर भी है। जिससे इस मंदिर को सती वाला मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर स्थल पर कई विस्मयकारी चमत्कार भी हुए हैं जिन्हें सुनकर आज भी श्रद्धालु भक्त आश्चर्यचकित हो जाते हैं। इस मंदिर में वर्षों पहले तक नाग – नागिन और सांपों का वास रहता था। जिससे यह शिवालय श्रद्धालुओं के विशेष आस्था का केंद्र था।
नगर के आखरी छोर पर होने के बावजूद यहां श्रद्धालु भक्तों का तांता लगा रहता है। एकांत स्थान में स्थित होने के कारण यहां शिवभक्त अपने आराध्य की एकांत में साधना कर सकते हैं।

*** सदाशिव मंदिर –

शामली में यह मंदिर रेल पार स्थित है।

बताते हैं कि यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। यहां आकर श्रद्धालु भक्तों के मन में शांति का अनुभव होता है। यह मंदिर भी मराठाकालीन है। मराठाकाल में ही इस मंदिर को झाड़ – झंकडों के बीच स्थापित किया गया था। बताते हैं की मराठा सैनिक सुरंग के जरिए यहां पहुंचकर भगवान शंकर का जलाभिषेक करने के साथ ही शत्रुओं पर भी नजर रखते थे।

इस मंदिर में देवगिरी बाबा की समाधि है।

इस सिद्धपीठ शिवालय में प्रतिवर्ष विशाल महारुद्राभिषेक यज्ञ – हवन का आयोजन भी किया जाता है।

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* साईं मंदिर –

शामली में सहारनपुर रोड पर विशाल साईं मंदिर का निर्माण किया गया है। इस मंदिर के निर्माण में हर संप्रदाय के लोगों का पूर्ण सहयोग रहा है। पश्चिमी यूपी का यह सबसे अधिक ऊंचे शिखर वाला साईं मंदिर है। साईं धाम सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बन गया है। इस साईं धाम पर मुसलमान समुदाय के लोग भी मांगी गई मुरादें पूरी होने पर मन्नत मांगने के लिए आते हैं।

बृहस्पतिवार के दिन होने वाली साईं महा आरती में हजारों साईं भक्त भाग लेते हैं। साईं धाम पर समय-समय पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहता है।

* श्री रघुनाथ मंदिर –

शामली की पंजाबी कॉलोनी स्थित प्राचीन रघुनाथ मंदिर प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में श्री राम दरबार, पंचमुखी हनुमान जी, मां वैष्णो देवी, श्री लक्ष्मीनारायण, मां सरस्वती, श्री शिव पार्वती, गणेश जी, लड्डू गोपाल, बालाजी, श्रीगोवर्धन महाराज जी ,दुर्गा मां आदि देवी-देवताओं के श्री विग्रह विराजमान है।

* श्री गंगा मंदिर –

रेशमी कटरा में स्थित श्री गंगा मंदिर में हर वर्ष चैत्र माह में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। जिसमें हजारों बच्चे महिला पुरुष आकर मां त्रिपुर बाला सुंदरी के दर्शन करके पूजा अर्चना करते हैं।

* आठ्ठे वाला मंदिर – भवानी देवी मंदिर –

300 वर्ष से भी अधिक पुराने इस मंदिर की भव्यता आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर शामली नगर का प्राचीन मंदिर है और यहां के अलावा दूरदराज के क्षेत्रों में भी प्रसिद्ध है।

यह मंदिर शामली के बड़ा बाजार पुरानी सब्जी मंडी में स्थित है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से देवी भगवती के दरबार में माथा टेकता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

वासंतीक और शारदीय नवरात्रों की अष्टमी को यंहा विशाल मेला लगता है। यहां श्रद्धालु मां भगवती को हलवा पुरी का भोग लगाकर नवरात्र के व्रत खोलते हैं।

प्रतिवर्ष इस मंदिर में माता शाकुंभरी देवी का जन्म दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

इस मंदिर में मां भगवती के अलावा मां काली, भैरों देव, शिव परिवार, भगवान विष्णु के श्रीविग्रह विराजमान है।

कुछ दशक पहले इस मंदिर के प्राचीन वटवृक्ष की जड़ से शिवलिंग प्रकट हुआ था।

मंदिर में समय-समय पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।
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