शिवालिक पर्वत मालाओं के बीच स्थित मां शाकुंभरी देवी सिद्ध पीठ करोड़ों लोगों की श्रद्धा आस्था और मान्यताओं का केंद्र है। शाकुंभरी देवी का वर्णन महाभारत,मार्कण्डेय पुराण, शिव पुराण तथा देवी भागवत आदि प्राचीनतम ग्रंथों में मिलता है।

शाकुंभरी देवी सिद्ध पीठ जनपद मुख्यालय सहारनपुर से 41 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर शिवालिक पहाड़ियों की गोद में स्थित है। बेहट से माता शाकुंभरी देवी भवन की दूरी 14 किलोमीटर है।

शाकुंभरी देवी का मंदिर अति प्राचीन है। कहा जाता है कि लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व अपने प्रवास काल में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य शाकुंभरी देवी के निकट बृहदहट (वर्तमान बेहट) नामक स्थान पर रहे थे और वे प्रतिदिन बेहट से मां शाकुंभरी देवी के दर्शनार्थ जाया करते थे। इस बात से यह स्पष्ट होता है कि उस प्राचीन काल में भी इस मंदिर की बहुत मान्यता थी।

शिवालिक पर्वतमाला की उपत्यका में स्थित यह प्राचीन मंदिर उस युग में भी बढ़ा पवित्र माना जाता था और भगवती शाकुंभरी देवी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां प्रतिवर्ष आया करते थे। उस समय यह मंदिर घनघोर वनों के बीच स्थित था और हिंसक वन जीवों के कारण दिन के समय भी यहां आना जाना भयभीत माना जाता था। इसी कारण शाकुंभरी देवी के दर्शन करने वाले यात्री बेहट नगर में ठहर कर दिन के समय टोली बनाकर शाकुंभरी देवी के दर्शन करने जाया करते थे।

शाकुंभरी देवी मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि देवी ने एक सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रत्येक मास के अंत में मात्र एक बार शाकाहार करते हुए घोर तप किया था और उस तप के प्रभाव से उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली । उनके तप की कीर्ति से प्रेरित होकर हजारों ऋषि मुनि उनके दर्शनार्थ यहां पहुंचे थे। तब देवी ने शाकाहार से उन सबका आतिथ्य- सत्कार किया था। कहा जाता है कि माता शाकुंभरी देवी तभी से यहां साक्षात विराजमान रहती हैं और अपने आस्थावान भक्तों की शुद्ध सात्विक मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।

देवी भागवत की एक कथा के अनुसार देवी भगवती ने शुंभ निशुंभ नाम के दो राक्षसों के वध करने के उपरांत प्रार्थना करते हुए देवताओं को वरदान देते हुए देवी कहती हैं ‘भविष्य में एक बार भारी अनावृष्टि होगी, तब मैं मुनियों के आह्वान पर प्रगट होकर अपनी देर से इतना शाक उत्पन्न करूंगी कि वर्षा होने तक इसी से संसार की प्राण रक्षा होगी।

एक और पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी से अपराजित रहने का वरदान प्राप्त करने के बाद महिषासुर ने इंद्र को परास्त कर दिया। जिससे अन्न और जल का अकाल पड़ गया और चारों और त्राहि-त्राहि मच गई। देवताओं को भूखा प्यासा देखकर देवी शाकंभरी के नेत्रों में जल भर आया। शाकुंभरी देवी के नेत्रों की जल की धाराओं से जल के स्रोत पुणः भर गए और धरती साग भाजी और वृक्षों आदि से फिर से हरी-भरी हो गई। तब देवताओं ने प्रसन्नचित्त मुद्रा में शताक्षी नाम से देवी का पूजन किया। बाद में देवी ने महिषासुर राक्षस का वध भी किया।

मंदिर में देवी शाकुंभरी की स्वयंभू प्रतिमा स्थापित है। इसके विपरीत कुछ लोगों की धारणा है कि आदि शंकराचार्य यहां आए थे और उन्होंने यहां तपस्या की थी तथा मंदिर की वर्तमान मूर्तियां उन्हीं के द्वारा प्रतिष्ठापित हैं। प्रसिद्ध इतिहास
कार डॉक्टर सत्यागिरी द्वारा लिखित प्रसिद्ध ऐतिहासिक पुस्तक चंद्रगुप्त चाणक्य के अनुसार इस मंदिर की स्थापना ईसा पूर्व ३२६ के आसपास लगती है।

शाकुंभरी देवी मंदिर से आठ किलोमीटर पहले दक्षिण दिशा में एक छोटी सी रियासत है जसमोर यह मंदिर और इसके चारों और का क्षेत्र जसमोर रियासत के राज परिवार के अधिकार क्षेत्र में था। यह भी बताया जाता है कि यहां के नरेश पुंडीर का संबंध कलिंग देश के राजवंश से है। आज भी शाकुंभरी देवी मंदिर का अधिकार जसमोर रियासत के परिवार के पास है।

माता शाकंभरी देवी के प्राचीन मंदिर के प्रमुख गर्भ गृह में चार प्रतिमाएं प्रतिस्थापित हैं। माता शाकुंभरी देवी के दाएं और भीमा, भामरी देवी तथा बाई ओर शताक्षी देवी है। दाहिनी ओर बाल गणपति की भी मूर्ति है। यह सभी देवी के विविध रूप कहे जाते हैं। दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में इन चारों देवियों के स्वरूप का वर्णन मिलता है। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में चार प्रतिमाएं अवश्य है लेकिन मंदिर मुख्य रूप से माता शाकुंभरी देवी के नाम से ही जाना जाता है।

वीर खेत –

माता शाकुंभरी देवी के भवन के सामने ही पर्वतीय क्षेत्र से आने वाले स्वच्छ – शीतल जल की निर्मल धारा बहती है, जिसमें श्रद्धालु यात्री स्नान भी करते हैं। इस जलधारा के दूसरी ओर वीर क्षेत्र (वीर खेत) का विशाल मैदान है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसी मैदान में देवी दुर्गा ने महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था। इसी मैदान में मंदिर जैसा एक स्मारक बना हुआ है। इसके बारे में कहा जाता है कि पूर्व नरेश राणा जीवन सिंह की पत्नी फूलदेई अपने पति के साथ यहां सती हुई थी।

भूरा देव –

शाकुंभरी देवी भवन से लगभग एक किलोमीटर पहले भूरा देव का प्राचीन मंदिर है। भूरा देव माता शाकुंभरी देवी के पहरेदार के रूप में विख्यात हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु देवी शाकुंभरी के दर्शन करने से पहले उनके पहरेदार भूरा देव के दर्शन अवश्य करते हैं। यह सत्य है कि बिना भूरा देव की दर्शन पूजा किए शाकुंभरी देवी के दर्शन का पुण्य लाभ नहीं मिलता।

भूरा देव मंदिर से आगे माता शाकुंभरी देवी मंदिर जाने का पथरीला मार्ग है। मेलों – पर्वो के अवसर पर जब यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। उस समय इस पथरीले मार्ग को पैदल ही तय करना होता है। इस मार्ग में कई स्थानों पर पहाड़ियों से झरने बहते रहते हैं। झरनों का शीतल जल स्रोत पार करते, इनमें स्नान करते हुए भक्तगण माता शाकुंभरी देवी का जयकारा बोलते हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

भूरा देव मंदिर से ही मार्ग के दोनो ओर प्रसाद, छत्र, नारियल, चुनरी आदि पूजा के सामानों की सुंदर-सुंदर दुकाने बड़ी मनभावन लगती हैं। भूरा देव मंदिर से थोड़ा आगे जाते ही इस शिवालिक पर्वत क्षेत्र में अनेकों मंदिरों व आश्रमों की श्रंखला शुरू हो जाती है। माता के भवन से पहले चारों ओर से घिरी पर्वत मालाओं के बीच एक ऊंची पहाड़ी पर बाएं ओर माता छिन्नमस्तका का प्राचीन मंदिर है। इसके निकट ही कमलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। यही आस पास ही यात्रियों के लिए कई धर्मशालाएं हैं।

माता शाकुंभरी देवी का अनन्य भक्त सिमरन गुर्जर –

माता शाकुंभरी देवी भवन पहुंचने पर भवन की सीढ़ियां चढ़ने पर दाएं और माता के अनन्य भक्त सिमरन गुर्जर की समाधि है। सिमरन गुर्जर के बारे में बताया जाता है कि इन्हें ही सर्वप्रथम सैकड़ों वर्ष पूर्व मां शाकुंभरी देवी ने वनों में विलुप्त हो रहे अपने मंदिर के जीर्णोद्धार का आदेश दिया था। जबकि माता का यह गुर्जर भक्त नितांत अंधा था।

इस बारे में यह बताया जाता है कि महाभारत काल के बाद माता शाकुंभरी देवी का यह स्थान बियाबान जंगल और झाड़ – झंखाड़ के पीछे छिपा हुआ था। एक दिन चमत्कारिक रूप से मां शाकुंभरी देवी ने स्वयं के वहां होने का एहसास पास के ही गांव माफी नगला के निवासी दृष्टिहीन ग्वाले सिमरण गुर्जर को स्वयं प्रकट होकर कराया था।

सिमरन गुर्जर दृष्टिहीन होते हुए भी जंगल में गाय चराने में अभ्यस्त था। एक दिन वह जंगल में बैठा स्वयं के जन्मांध होने का दुखड़ा रोता हुआ देवी से प्रार्थना कर रहा था। अपने भक्त की करुण पुकार सुनकर देवी मां ने वहां प्रकट होकर सिमरन को दृष्टि प्रदान की और अपने विरान पडे स्थान की साफ-सफाई करके नित्य पूजा- आराधना करने का आदेश दिया।

सिमरन अपनी आंखों में ज्योति पारकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने देवी मां की आदेश के अनुसार उनके जंगल में छिपे स्थान को तलाश किया और उसकी साफ सफाई कर नित्य उनकी पूजा स्तुति में लग गया। इस प्रकार बहुत समय से काल के गर्त में छिपा माता शाकुंभरी का यह सिद्ध पीठ पुनः प्रकाश में आया। सिमरन के ब्रह्मलीन होने पर उनकी समाधि माता के भवन में उनके चरणों में ही बनवा दी गई।

श्रद्धालु भक्त माता शाकुंभरी देवी के मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए सबसे पहले मां शाकुंभरी देवी के अनन्य भक्त सिमरन गुर्जर की समाधि पर नतमस्तक होना नहीं भूलते हैं।

माता शाकुंभरी देवी मंदिर –

देवी माता के ऊंचे दरबार में मुख्य गर्भ गृह में शाकुंभरी देवी की स्वयंभू प्रतिमा स्थापित है। यहां आदि शंकराचार्य ने तीन मूर्तियां और स्थापित की थी। मां शाकुंभरी देवी के साथ-साथ मां के तीन अन्य रूप मां शताक्षी देवी, मां भीमा देवी तथा मां भ्रामरी देवी के साथ-साथ बाल गणपति के दर्शन भी होते है।

मां शाकुंभरी देवी के परिक्रमा क्षेत्र(मंदिर भवन के प्रांगण) में सबसे पहले बटुक भैरव, भगवान शंकर, माता काली तथा गणेश जी के सुंदर विग्रह हैं। इनके अलावा मंदिर प्रांगण में गर्भ ग्रह के समीप ही हनुमान जी की विशाल प्रतिमा भी स्थित है।

मां शाकुंभरी देवी के भवन से लगभग एक किलोमीटर उत्तर में पहाड़ी पर मां रक्तदंतिका का सुंदर प्राचीन मंदिर है।

माता शाकुंभरी देवी के रक्षक पंच महादेवों के पांच मंदिर –

मां शाकुंभरी देवी क्षेत्र में माता के भवन के चारों ओर भगवान शंकर महादेव के पांच प्राचीन मंदिर हैं। कहा जाता है कि शंकर भगवान के यह पांचों मंदिर भी मां शाकुंभरी देवी के मंदिर जितने ही प्राचीन हैं। शंकर भगवान के पांचों मंदिरों को माता शाकुंभरी देवी का रक्षक बताया जाता है।

१ – भगवान शंकर का पहला मंदिर मां शाकुंभरी भवन के निकट ही बाईं ओर मटकेश्वर महादेव है।

२ – भगवान शंकर का दूसरा मंदिर मां के भवन के सामने शंकराचार्य आश्रम के बाईं ओर कमलेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है।

३- भगवान शंकर का तीसरा मंदिर मां शाकुंभरी के भवन के पीछे शाकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। इस प्राचीन मंदिर का मार्ग मां के भवन के बाईं ओर से जाता है।

४- मां शाकुंभरी देवी के चौथे रक्षक इंद्रेश्वर महादेव का मंदिर छिन्नमस्तिका मंदिर के पीछे पहाड़ी पर स्थित है।

५- माता शाकुंभरी देवी के पंच महादेव में से मां के पांचवे रक्षक बड़केश्वर महादेव का मंदिर माता के भवन से लगभग ५ किलोमीटर दूर रामपुर बडकला गांव के निकट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।

इस क्षेत्र में इन पंच महादेवों की बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु भक्त मां शाकुंभरी देवी के दर्शन करने के बाद इन पांच महादेवों के दर्शन करते हैं। उनकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।

पिछले कई दशकों से प्रत्येक माह की चतुर्दशी पर माता शाकुंभरी देवी के दर्शन करने वाले श्रद्धालु बताते हैं कि सन १९७० से पहले देवी के भवन के चारों ओर घना जंगल था। उस समय बसें भी केवल बेहट तक ही जाती थी। तब आधी रात के समय जंगल की ओर से देवी का अनन्य सेवक शेर मां के भवन की सीढ़ियों पर रोजाना माथा टेकने आता था। लेकिन जब से बसों – गाड़ियों आदि का आवागमन माता के भवन तक आना – जाना शुरू हो जाने के बाद किसी ने भी शेर को देवी माता के सन्मुख माथा टेकते हुए नहीं देखा। इसके बावजूद अभी भी चतुर्दशी के दिन आधी रात गए भवन के चारों ओर जंगल में शेर की गर्जना सुनाई पड़ती है।

पुराणों के अनुसार शाकुंभरी क्षेत्र का विस्तार ५ कोस के मध्य माना गया है। इसलिए ही इसे पंचकोशी भी कहते हैं। इसमें लगभग १२ दर्शनीय एंव पूजनीय स्थान है। जिनमें से अभी भी कुछ स्थानों की पहचान नहीं हो पाई है। पंचकोशी यात्रा में भूरा देव, जनकेश्वर महादेव, छिन्नमस्तिका, माता शाकुंभरी देवी, शंकराचार्य आश्रम (मडकाली गुफा), भीमा देवी, गौतम गुफा, सहस्र ठाकुर, रक्तदंतिका एवं साकेश्वर महादेव विशेष उल्लेखनीय हैं।

भगवान संहसरा ठाकुर मंदिर-

माता शाकुंभरी देवी भवन के सामने वाली ऊँची पहाड़ी के उस पार एक अन्य पहाड़ की तलहटी में शाकुंभरी देवी भवन से लगभग ६ किलोमीटर दूर भगवान सहंसरा ठाकुर(विष्णु भगवान जी) का एक विशाल एंव सुंदर मंदिर है। यह मंदिर भी शाकुंभरी देवी जितना ही प्राचीन बताया जाता है। दुर्गम पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद श्रद्धालु भक्त वहां तक पहुंचते हैं। यह प्राचीन एंव पौराणिक मंदिर भी इस पावन पर्वत श्रंखला का एक दर्शनीय स्थान है। इस प्राचीन मंदिर में विष्णु भगवान, भगवान राम, भगवान कृष्ण एंव गणेश जी की सुंदर
प्रतिमाएं स्थापित हैं। भगवान विष्णुजी को ही सहंसरा ठाकुर कहा जाता है।

सहंसरा ठाकुर मंदिर की मुर्तियां अपने आप में दुर्लभ और अनोखी हैं। इन प्राचीन प्रतिमा के तमाम हिस्ससा पर विभिन्न देवी – देवताओं की मूर्तियां बनी हैं। माना जाता है कि इस प्रकार की प्रतिमाएं ईसा से पूर्व काल में बनाई जाती थी।
इस स्थान पर गौतम ऋषि ने तपस्या की थी। इस मंदिर के प्रांगण में गौतम् ऋषि ने एक विशाल शिवलिंग स्थापित किया था।

सहंसरा ठाकुर मंदिर के निकट ही गौतम् ऋषि की गुफा भी है, जहां वे एकांत में साधना करते थे। इसी पहाड़ी पर एक शीतल झरना है जो सात कुंडों से होकर बहता है। इन सात कुंडों के नाम गौतम कुंड, सूरजकुंड, परी कुंड, रामकुंड, तथा तीन नरम कुंड है। कहते हैं कि सूरजकुंड के बहते हुए शीतल जल में स्नान करने से सभी प्रकार की चर्म रोग चमत्कारिक रूप से दूर हो जाते हैं।

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आश्विन चतुर्दशी मेला –

धार्मिक मान्यताओं को परिलक्षित करने वाला माता शाकुंभरी देवी का असोज की चौदस का पांच दिवसीय मेला शारदीय नवरात्र के समाप्त होते ही शुरू हो जाता है। सिद्ध पीठ शाकुंभरी देवी मंदिर के प्रांगण से सटे कई किलोमीटर के क्षेत्र में हजारों लोग शंकराचार्य आश्रम समेत यहां की अनेकों धर्मशालाओं के साथ साथ वीर खेत तथा अन्य स्थानों पर टेंट व टमोटियों के अस्थाई निवासों में रहने के लिए आते हैं और चार-पांच दिन पूजा अर्चना के पश्चात ही अपने घरों को लौटते हैं।

मेले का मुख्य प्रसाद संराल और अखरोट

शाकुंभरी देवी का मूल प्रसाद यही के वनों में पैदा होने वाला कंदमूल फल सराल है। जिसे लोग श्रद्धा पूर्वक ग्रहण करते हैं।

 

 

 

 

 

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