__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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हरिद्वार अनादि काल से ही देवताओं तथा ऋषि-मुनियों की पावन तपोभूमि रहा है। यहां ऐसे विभिन्न अति प्राचीन मंदिर हैं जिनका संबंध सनातन हिंदू धर्म के पुराणों तथा शास्त्रों से रहा है।

हरिद्वार के इन पौराणिक मंदिरों में से कुछ तो यहां आने वाले श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की श्रद्धा और आस्था प्रमुख स्थल है।

हरिद्वार के पौराणिक मंदिरों में तंत्र साधना के केंद्र नील पर्वत की चोटी पर अत्यंत रमणीय तथा चित्त को प्रसन्न करने वाले वातावरण में स्थित मां चंडी देवी का प्राचीन तथा पौराणिक मंदिर मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला सिद्ध मंदिर कहलाता है।

मां चंडी देवी मंदिर हरिद्वार रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। यहां ऑटो, बैटरी रिक्शा, टैक्सी के अलावा निजी वाहनों से पहुंचा जा सकता है।
चंडी घाट का डेढ़ किलोमीटर लंबा पुल पार करने के पश्चात श्रद्धा अनुसार भक्त लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की कठिन चढ़ाई पार करते हुए मां के दरबार तक पहुंचते हैं। मंदिर तक उड़न खटोला (रोपवे) से भी पहुंचा जा सकता है।

नवरात्र के रहस्यमय दिनों में मंदिर के चारों ओर शक्ति का सुचालक आभामंडल बन जाता है। चारों तरफ हरियाली, शांत वातावरण, शुद्ध शीतल हवाएं और जंगली फूलों की लुभावनी खुशबू यात्रियों का मन मोह लेती है।

गंगा की मुख्यधारा इस नील पर्वत से सट कर बहती है। यहां मां चंडी का दरबार अनादि काल से है।चंडी देवी का मंदिर सिद्ध तांत्रिक पीठ है। मंदिर के बाहर लगे एक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण एक तांत्रिक ने करवाया था। इसके बाद कश्मीर के राजा सुचेत सिंह ने सन 1872 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इस मंदिर परिसर में कभी ताला नहीं लगाया जाता, गर्भगृह के दरवाजे भी बंद नहीं किए जाते।

पौराणिक कथाओं के अनुसार कभी इस क्षेत्र में शुंभ निशुंभ नाम के राक्षस रहते थे। शुंभ निशुंभ ने तपस्या के द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली। जब शुंभ निशुंभ ने इस धरती पर पढ़ने मचाया हुआ था तब देवताओं ने उनका संहार करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इन राक्षसों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं और ऋषियों ने भोलेनाथ के दरबार में गुहार लगाई। तब भोलेनाथ के देवताओं के तेज से मां चंडी ने अवतार लिया और चंडी रूप धारण कर उन दैत्यों को दौड़ाया। शुंभ निशुंभ इस नील पर्वत पर मां चंडी से बचकर छिपे हुए थे। यहीं आदि शक्ति मां चंडी खंब रूप में प्रकट हुई थी। उस तेज पुंज चंडी मां ने यहीं उन दैत्यों का वध किया था। इसके उपरांत देवी मां ने देवताओं से वर मांगने को कहा। स्वर्ग लोक के सभी देवताओं ने मानव जाति के कल्याण के लिए देवी मां को इसी स्थान पर विराजमान रहने का वर मांगा। तब से ही मां चंडी हां पर विराजमान होकर अपने भक्तों का कल्याण कर रही हैं।

एक अन्य पौराणिक आख्यान त्रेता युग में रामावतार के समय का है। राम रावण युद्ध के दौरान लंकाधिपति रावण का भाई अहिरावण रात्रि के समय अपने सैन्य शिविर में सो रहे श्रीराम व लक्ष्मण को चंडी देवी की बलि देने के लिए उठाकर पाताल लोक ले गया था। इस बात की जानकारी पवन पुत्र हनुमान जी को मिलने पर वह पाताल लोक जा पहुंचे और एक मक्खी का रूप बनाकर मंदिर में प्रवेश कर चंडी देवी की प्रतिमा के पीछे छिप गए।

अहिरावण ने जैसे ही श्रीराम और लक्ष्मण की बलि चढ़ाने के लिए खड़ग उठाया उसी समय हनुमान जी प्रकट हो गए और अहिरावण का वध कर श्री राम लक्ष्मण को मुक्त कराकर पृथ्वी लोक लौट आए।

मान्यता है कि आदिदेव श्री राम के अपमान से क्षुब्ध होकर मां चंडी देवी उसी समय पाताल लोक छोड़ कर पृथ्वी पर चली आई और हरिद्वार के नील पर्वत की चोटी पर निवास करने लगी।

श्रद्धालुओं का मानना है कि मां चंडी देवी आज भी इस चोटी पर अदृश्य रूप में निवास करती हैं। वह आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

इस स्थान के आसपास हजारों वर्ष पहले विकसित सभ्यता थी। आज भी इस स्थान के पास में ही मछलाकुंड है,मछला रानी का महल है। चंडी घाट से चीला रोड पर आज भी उस समय के किले के तमाम अवशेष फैले पड़े हैं। इन अवशेषों में 2 फुट चौड़ी ईटें पाई जाती हैं। उस युग की विकसित सभ्यता के स्थापत्य कला के अवशेष यहां आज भी चारों ओर देखे जा सकते हैं।

यह स्थान प्राचीन काल से ही बहुत महत्वपूर्ण है। लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व यहां मामा भांजे गोपीचंद-भर्तहरि साधु रूप में आए थे, जो बाद में अमर हो गए।

ऐसा कहा जाता है कि यहां भगवान बुद्ध ने भी तपस्या की थी। महान वीर आल्हा ऊदल के गुरु तांत्रिक आमरा ने भी यहां तपस्या की थी। गुरु आमरा के गुरु थे गुरु औघड़नाथ और उनके गुरु मछेन्दर नाथ। यह स्थान नाथ संप्रदाय के योगियों की तपस्थली भी रहा है। यही वह स्थान है जहां कभी आल्हा पुत्र इंदल ने अपनी भेंट चढ़ा दी थी।

श्रद्धालुओं में एक मान्यता प्रचलित है कि इस मंदिर में नित्य शेर आता है। श्रद्धालु मानते हैं कि एक शेर नित्य ही मां चंडी के दर्शन करने आता है। नील पर्वत के चारों और घनघोर वन है और अनेक प्रकार के वन्य जीव यहां रहते ही हैं। शेर आता है या नहीं यह बहस का विषय हो सकता है और इस बारे में कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता है।

अंग्रेजों के शासन के दौरान एक अंग्रेज अफसर इस क्षेत्र में शिकार खेलने आया था। कहा जाता है कि उस अंग्रेज ने यहां एक शेर पर गोली चला दी जो शेर के पैर में जाकर लगी। उस अंग्रेज अफसर ने शेर का पीछा किया। आगे सीता कुंड पर वह अंग्रेज पहुंचा तो उसने देखा कि एक वृद्ध संत पानी से अपने पैर का घाव साफ कर रहे थे। वह अंग्रेज अफसर हतप्रभ रह गया।

उस अंग्रेज अफसर के प्रयास से ही तभी इस मंदिर क्षेत्र के 3 किलोमीटर के दायरे में शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया।

यह भी बताया जाता है कि जितने भी श्रद्धालुओं को शेर के दर्शन हुए हैं उन सभी ने शेर के लंगड़े होने की बात स्वीकार की है। उनकी बातों से स्पष्ट है कि वह शेर के रूप में कोई साधक या संत है। कोई श्रद्धालु उन्हें लाल बाबा कहते हैं और कोई लंगड़े बाबा, लेकिन आज तक भी उस शेर के द्वारा किसी श्रद्धालु पर हमला नहीं किया गया है।

आठवीं शताब्दी में मां चंडी देवी के मंदिर का जीर्णोद्धार जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने विधिवत रूप से कराया था। इस मंदिर में देवी के दो रूपों के दर्शन होते हैं। आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित प्रतिमा सिंदूर से पुती हुई है। दूसरी प्रतिमा शिला रूप स्तंभ में है। ऐसी मान्यता है कि यही प्राचीन और मूल प्रतिमा है।

मां चंडी देवी मंदिर हरिद्वार के प्रमुख पांच तीर्थों में से एक नील पर्वत पीठ के नाम से भी जाना जाता रहा है। अनादि काल से मां चंडी देवी मंदिर में मां की आराधना भक्तों को अकाल मृत्यु, रोगनाश, शत्रुभय आदि कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाली और प्रत्येक प्रकार की मनोकामना पूर्ण कर अष्ट सिद्धि प्रदान करने वाली है

चैत्र और आश्विन नवरात्र के बाद चौदस पर यहां चंडी चौदस का बड़ा भारी मेला लगता है। इस अवसर पर दूरदराज के क्षेत्रों से आए श्रद्धालु चंडी माता के दर्शनों के लिए यहां पहुंचते हैं।

आश्विन नवरात्रों के बाद आने वाली चौदस पर आसपास के इलाकों में रामलीला आयोजित करने वाले राम, लक्ष्मण, सीता तथा हनुमान जी का अभिनय करने वाले पात्रों को बैंड बाजे, ढोल नगाड़ों के साथ लेकर यहां आते हैं और चंडी देवी मंदिर पर देवी का ध्वज चढ़ाते हैं। कई संस्थाओं द्वारा विशाल भंडारा भी आयोजित किया जाता है।

चंडी देवी मंदिर तक जाने की यह यात्रा अब तो बहुत सरल हो गई है। उड़नखटोले (रोपवे) बनने से कुछ दशक पहले तक नील पर्वत के ऊपर स्थित चंडी देवी मंदिर तक जाने का पैदल रास्ता कठिन चढ़ाई वाला था। बहुत पहले तो यात्री पहाड़ों की चट्टानों पर सरक-सरक कर और झाड़ियां पकड़कर जाया करते थे। उस समय जंगली जानवर भी अधिक मिलते थे पहाड़ी पर हाथी भी नित्य आते थे। रोपवे बनने के बाद अब यहां की यात्रा करना बहुत सरल हो गया है।

हरिद्वार की शोभा को बेहद बढ़ा देने वाले चंडी देवी मंदिर पर स्थित रोपवे को खड़ी पहाड़ी काट कर निर्मित किया गया है अतः उड़न खटोले में बैठे यात्रियों को खतरनाक दिखाई पड़ने वाली खाइयों से होकर गुजरना पड़ता है। रोपवे से कनखल नगरी का भव्य दृश्य दिखाई देता है। साथ ही नील पर्वत एवं शिवालिक पर्वतमाला के दूर-दूर तक के सूरम्य दृश्य दिखाई पड़ते हैं।

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