___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** गोकुला देवी मंदिर –

मुजफ्फरनगर जनपद के शाहपुर कस्बे में अपने देश का सबसे अलग एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां नंद बाबा और माता यशोदा की कन्या गोकुला देवी की पूजा की जाती है।

द्वापर युग में ब्रज के गोकुल में नंद यशोदा के घर जन्मी कन्या के नाम पर इस मंदिर का नाम गोकुला देवी पड़ा।

श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन है कि मथुरा के राजा कंस ने जब यह आकाशवाणी होने के बाद कि देवकी के आठवें पुत्र के हाथ से ही उसकी मृत्यु होगी। उसने अपनी बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को जेल में बंदी बना लिया था।

देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्री कृष्ण भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मध्य रात्रि के समय कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से जन्मे थे। जिन्हें वासुदेव जी आधी रात में ही यमुना के रास्ते गोकुल में नंद बाबा के यहां छोड़ आए थे तथा अपने साथ यशोदा एवं नंद बाबा के घर जन्मी पुत्री को लेकर कंस के कारागार आ गए थे।

जब अत्याचारी कंस ने देवकी वासुदेव की अन्य सातों संतानों की भांति ही उस कन्या को भी जब पत्थर पर पटक कर मारना चाहा तो वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

मान्यता है कि वह कन्या ही गोकुला देवी के नाम से जानी जाती हैं। सैकड़ों वर्षों से मां गोकुला देवी के नाम से ही इस अति प्राचीन सिद्धपीठ मंदिर का नाम प्रचलित है। विशाल एवं भव्य मंदिर में मां दुर्गा के स्वरूपों के साथ-साथ गोकुला देवी की पूजा की जाती है।

शाहपुर के गोकुला देवी मंदिर में मां गोकुला की अष्ट भुजाधारी दिव्य एवं अलौकिक मूर्ति स्थापित है। इनके साथ साथ ही मां दुर्गा के नौ स्वरूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, मां गौरी व सिद्धिदात्री के विग्रह विराजमान हैं।

मंदिर प्रांगण में नवग्रह, श्री राम दरबार, शिवपरिवार, लक्ष्मी एवं विष्णु भगवान की दिव्य प्रतिमाएं स्थापित है।

माता के श्रद्धालु भक्त सदियों से इस ऐतिहासिक मंदिर को सिद्ध पीठ मानकर पूजा अर्चना करते रहे हैं। चैत्र एवं आश्विन मास की चौदस तथा नवरात्रों के अवसर पर हजारों श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

** गोकुला देवी का चतुर्दशी मेला –

गोकुला देवी मंदिर के सामने के विशाल मैदान में प्रतिवर्ष चैत्र माह में रामनवमी से देवी की चौदस तक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।

ग्रामीण अंचल के इस मेले में सर्कस, मौत का कुआं, काला जादू, झूले, खेल-खिलौनौं व अन्य सामानों की दुकानें तथा खाने-पीने के सामान की दुकान पर सभी जाति व धर्मों के लोग हिस्सा लेकर कस्बे व क्षेत्र की एकता का परिचय देते हैं।

छह दिवसीय मेला चतुर्दशी में रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

सिद्ध पीठ मंदिर में हजारों की संख्या में महिला पुरुष पहुंचकर पूजा अर्चना करते हैं और विशाल भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं।

मेले का शुभारंभ विधिवत पूजन एवं अर्चन के साथ प्रारंभ होता है। रामनवमी के दिन विभिन्न आकर्षक झांकियों और भजन कीर्तन मंडली के देवी के गुणगान के बीच प्राचीन शिव मंदिर से शोभा यात्रा निकाली जाती है। भगवान श्री राम की पालकी के साथ अन्य झांकियों से सजी शोभा यात्रा बैंड बाजों के साथ नगर के मुख्य मार्गो पर बाजारों से गुजरती है। श्रद्धालु भक्त शोभा यात्रा पर पुष्पों की वर्षा करते हैं।

दुर्गा चतुर्दशी के दिन मां भगवती की भव्य पदयात्रा श्री पिपलेश्वर हनुमान मंदिर में मां शेरों वाली की अखंड ज्योति जलाए जाने के साथ धूमधाम के साथ संपन्न होता है।

** पहाड़न माता एवं छोटी माता –

दशहरे के बाद शाहपुर कस्बे में स्थित पहाड़न माता एवं छोटी माता का पूजन करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। इन माताओं की पूजा अर्चना करने से घर में बच्चों को छुआछूत की बीमारी नहीं होती और इसके साथ-साथ कस्बे में दैवीय आपदा जैसे संकट नहीं आते।

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