_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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लोककथा जलालाबाद की राजकुमारी और लोकनायिका सांवल-दे की

यह लोक कथा शामली जनपद के प्रसिद्ध व ऐतिहासिक कस्बे जलालाबाद की है, जो सैकड़ों वर्ष पहले मनहार खेड़ा के नाम से जाना जाता था।

होली गीत, रागिनी और स्वांग में लोक नायिका राजकुमारी सांवल-दे की कहानी आज भी सुनी जाती है। सैकड़ों वर्ष पहले का मनहार खेड़ा और आज के समय के जलालाबाद कस्बे में उनके किले और महल के खंडहर अभी भी मौजूद हैं।

यहां के निवासियों का कहना है कि सांवल केवल किस्से कहानियों की पात्र नहीं है, बल्कि वह ऐतिहासिक पात्र है। जिसे आज भी लोग याद करते हैं। उसके महल और किले के अवशेष आज भी शामली के जलालाबाद कस्बे में देखे जा सकते हैं।

राजकुमारी सांवल-दे ने सर्पदंश से अपने पति को बचाया था।

मनहार खेड़ा के राजा केसरी सिंह के कोई पुत्र नहीं था राजा केसरी सिंह ने पुत्र नहीं होने के कारण अपनी पुत्री सांवल का विवाह करके उसके पति राजा कारक को घर जंवाई बना लिया था।

‌‌एक दिन राजा कारक अपनी पत्नी सांवल को लेकर मनहारखेडा से इंद्रप्रस्थ जा रहे थे। मार्ग में राजा कारक ने बरगद के पेड़ पर बैठी एक चील के पंजे में नाग को फंसे देखा, राजा कारक ने चील के पंजे से नाग को छुड़ाने के लिए तीर चला दिया। तीर का निशाना ठीक जगह नहीं लगा और राजा कारक तीर उतारने के लिए बरगद के पेड़ पर चढ़े, लेकिन नाग ने राजा कारक को डंस लिया। जिससे उनकी मृत्यु हो गई।

समाचार मिलने पर सांवल के पिता केसरी सिंह उस स्थान पर पहुंचे। राजकुमारी सांवल ने अपने पिता से पति के साथ सती होने की इच्छा जताई, लेकिन केसरी सिंह ने अपनी पुत्री सांवल से कहा कि यह निर्णय करने का अधिकार कारक के पिता को है।

केसरी सिंह ने सांवल को उसकी ससुराल इंद्रप्रस्थ भेज दिया। सांवल के अपनी ससुराल इंद्रप्रस्थ पहुंचने पर, उसके सास-ससुर ने सांवल को ही अपने पुत्र कारक की मृत्यु का जिम्मेदार माना। सांवल के सास-ससुर ने उसको घर से निकाल दिया और अपने पुत्र कारक का शव यमुना में बहा दिया।

व्यथित सांवल ने अपने पति के प्राण वापस लाने का प्रण लिया। सांवल ने दो दिन की मेहनत के बाद मछुआरों की मदद से अपने पति के शव को यमुना से ढूंढ निकाला।

किसी मछुआरे ने सांवल को बताया कि धनवंतरी कारक में प्राण फूंक सकते हैं। एक माह की कोशिश के बाद सांवल की मुलाकात धनवंतरी से हुई और उन्होंने अपनी जड़ी-बूटियों के द्वारा कारक की निर्जीव देह में जान डाल दी।

तब से ही रानी सांवल की कहानी ने लोककथा का रूप ले लिया और यह लोग कथा आज भी लोकगीतों के रूप में गांव गांव में गाई जाती है।

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