__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सर्वखाप के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में कई बेहद रोचक जानकारियां भी हैं जो सर्वखाप के महत्व को बताती हैं।

भारत में सर्वखाप पंचायत प्राचीन काल से बने हुए सबसे पुराने संगठनों में से एक है।

सर्वखाप संस्कृत भाषा का शब्द है जो सर्व+ख+आप शब्दों से मिलकर बना है। इसमें सर्व शब्द का अर्थ है ‘सब’ और ‘ख’ का अर्थ है आकाश और ‘आप’ का अर्थ है जल। अर्थात सर्वखाप का अर्थ हुआ जो ‘सब जगह हो और आकाश की तरह व्यापक तथा जल की तरह निर्मल हो’। क्योंकि यह संगठन संपूर्ण समाज का संगठन था इसलिए इसे ‘सर्वखाप पंचायत’ कहा जाने लगा।

इतिहास से पता चलता है किसर्वखाप पंचायत की स्थापना भारत के यशस्वी सम्राट हर्षवर्धन ने की थी।

हर्षवर्धन जब 12 वर्ष के ही थे उस समय मालवा के राजा ने हर्ष के बहनोई कन्नौज के राजा गृहवर्धन की हत्या करके हर्ष की बहन राज्यश्री को कालिंजर के किले में कैद कर लिया था। हर्षवर्धन के बड़े भाई राज्यवर्धन ने मालवा के राजा का वध करके अपनी बहन को छुड़ा लिया। लेकिन बंगाल के राजा शशांक ने षड्यंत्र रचकर उनके बड़े भाई राज्यवर्धन का वध करके बहन राज्यश्री को फिर से बंदी बना लिया।

हर्षवर्धन ने 12 वर्ष की अल्पायु में ही थानेसर राज्य(कुरुक्षेत्र के पास) की बागडोर संभाल ली। अपनी बहन को कैद से छुड़ाने के लिए हर्ष ने अपनी माता, प्रमुख मंत्री और अपने वैश्य गोत्र के क्षत्रियों के साथ सलाह करके इस क्षेत्र की सभी खापों से सहायता मांगी।

सब खापों से ३० हजार शस्त्रधारी पुरुषों एवं १० हजार महिलाओं की सेना हर्ष की सहायता के लिए भेजी गई जिससे वे अपनी बहन राज्यश्री को कैद से छुड़ा सकें।

खापों की सहायता से बनी हर्ष की विशाल सेना का सामना शशांक की सेना नहीं कर पाई और भाग खड़ी हुई। इस प्रकार हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री को एक बार फिर मुक्त करा लिया।

सभी खापों के सदस्यों ने पंचायत की और हर्षवर्धन का कन्नौज के राजा के रूप में राज्याभिषेक किया। सम्राट हर्षवर्धन ने त्रिवेणी के तट पर वैदिक विधि विधान के साथ विक्रमी संवत 701 में सर्वखाप पंचायत का गठन किया।

सर्वखाप पंचायत का ध्वज ‘भगवे रंग के कपड़े पर अंकित गहरे लाल रंग का सूर्य’है।

‘सर्वखाप पंचायत’ को ‘सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत’ भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सब जातियों का प्रतिनिधित्व रहता है।

प्राचीन काल में समाज को एक स्वस्थ वातावरण देने के लिए इन पंचायतों का सहारा लिया जाने लगा क्योंकि उस समय प्रत्येक व्यक्ति राजा से स्वयं मिलकर अपनी समस्याओं को हल नहीं करा सकता था। इसलिए यह पंचायतें जरूरी हो गई। एक तरह से यह पंचायतें शासन पद्धति के रूप में काम करने लगी और गांवों तथा एक बड़े क्षेत्र में फैसले इन्हीं पंचायतों के द्वारा होने लगे।

समाज की मान्यताओं और परंपराओं को बनाए रखने के लिए अपनी मनमर्जी से और असामाजिक काम करने वालों पर नियंत्रण की आवश्यकता होती है। यदि ऐसा न किया जाए तो समाज की सभी स्थापित मान्यताएं, विश्वास, परंपराएं और मर्यादाएं समाप्त हो जाएंगी। समाज पर नियंत्रण के लिए एक व्यवस्था बनी इस व्यवस्था में परिवार के मुखिया को सबसे बड़े न्यायाधीश के रूप में स्वीकार किया गया।

खाप व्यवस्था में परिवार सबसे छोटी इकाई होता था, परिवार से ऊपर मोहल्ला और मोहल्ले से ऊपर पाना और उससे उपर गांव। कई गांवों को मिलाकर एक तपा होता हैै और कई तपों को मिलाकर एक खाप बनती है। सभी खापों को मिलाकर सर्वखाप बनाई गई है। सर्वखाप पंचायत का संगठन एक गैर जातिय और गैर सांप्रदायिक संगठन है।

किसी भी खाप का नाम कहीं गांव के नाम से तो कहीं गोत्र के नाम पर रखा गया है।

जब एक ही कुटुंब के दो परिवारों या मोहल्ले के दो परिवारों में विवाद हो जाता है और वह स्थानीय पंचायत के प्रयासों के द्वारा नहीं सुलझता तब कई गांवों के समूह की पंचायत यानी तपे की पंचायत बुलाई जाती है। जब उस विवाद को तपा की पंचायत भी सुलझापाने में असमर्थ होती है तब वह विवाद या झगड़ा खाप की पंचायत में जाता है और जब खाप की पंचायत भी वह झगड़ा या विवाद सुलझापाने में असमर्थ हो तब तपों के प्रमुखों से कहा जाता है कि वह सर्वखाप की पंचायत का आयोजन करें।

सर्वखाप का आयोजन उसी गांव में होता है जिस गांव का वह विवाद या झगड़ा होता है। उसी गांव की पंचायती जमीन या खेतों में सर्वखाप पंचायत होती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरी राजस्थान और मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा, यह वह इलाके हैं जहां खाप संगठन बने हुए हैं। वर्तमान में 3500 सर्व खापें हैं।

सर्वखाप पंचायतों के गौरवपूर्ण इतिहास व सम्मानजनक छवि के ठीक विपरीत आज सर्वखाप पंचायतों का मौलिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।

सदियों पुरानी यह सम्मानित व्यवस्था नुक्ताचीनी व विरोधाभास का विषय बन गई है। तर्कहीन फैसलों से उत्पन्न विवादों के संदर्भ में दिए जा रहे फैसलों की आलोचना भी होती है।

युवा पीढ़ी का शादी-विवाह के मामलों में परंपराओं और रीति-रिवाजों का उल्लंघन करने के कारण खाप पंचायतों से निरंतर टकराव होता रहता है।

कुछेक खाप प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थों के कारण सत्ताधारी दलों के राजनेताओं के आगे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में भी ज्यादा रुचि रखते हैं।

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