___________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सहारनपुर जनपद का सरसावा कस्बा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बहुत ही समृद्ध है। यह क्षेत्र प्राचीन समय में हमारे देश का एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र था। इतिहासकार कनिंघम द्वारा लिखे गए इतिहास में सरसावा का अनेक बार वर्णन आया है।

सरसावा की ऐतिहासिक धरती से जुड़ी हुई अनेकों बातें हैं। उत्तर प्रदेश-हरियाणा सीमा पर स्थित सरसावा कस्बे का हजारों वर्षों का इतिहास है। इसका पुराने समय में नाम सिरसापत्तन था जो बाद में सरसावा कहा जाने लगा। नगर के पश्चिमी छोर पर एक प्राचीन टीला है जिसे अब कोट के नाम से जाना जाता है। इस टीले पर प्राचीन सभ्यता के अवशेष पुरातत्व विभाग को मिले हैं।

उपजाऊ धरती के क्षेत्र में स्थित होने के कारण ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अति समृद्ध आज भी सरसावा कस्बे की गलियां लखौरी ईटों से बनी इमारतों से पटी पड़ी हैं।

प्राचीन समय में यहां बौद्ध धर्म का भी प्रभाव था। चीनी यात्री ह्वेनसांग भी यंहा आया था।

यमुना नदी सरसावा के पास के इलाके से ही खुले मैदान में प्रवेश करती है। इसीलिए कनिंघम ने सरसावा को गेट ऑफ यमुना कहा है।

इस धरती ने दनदनाते विदेशी आम्रमणकारी के धोड़ों की टापों को सहा है। हर विदेशी आक्रमणकारी गंगा के मैदानों की ओर बढने के लिए यमुना पार करके इस धरती को रौंदता हुआ ही आगे बढा।

यंहा से होकर जो विदेशी आक्रमणकारी गुजरे उनमें तैमूर जैसा निर्दयी हमलावर भी था। तैमूर हरिद्वार में लूटपाट और मारकाट मचाकर यहां से गुजरा था।

कनिंघम के अनुसारण 1019ई में महमूद गजनवी ने सरसावा के राजा चांदराय को पराजित किया था।

इतिहासकार बताते हैं कि बाबर अम्बाला होते हुए सरसावा आया था। पानीपत की लडाई से पहले उसने यहीं पडाव डाला था। पानीपत की लडाई जितने के बाद सरसावा को उसने तारदीबेग खाकसार को इनाम में दे दिया था। अकबर के दरबारी अबुल फजल की लिखीत ‘आईने अकबरी’ में सरसावा का विस्तार से वर्णन है।अबुल फजल ने इसमें सरसावा में एक विशाल ईटों का टीला होने के बारे में लिखा है। आज भी वह टीला सरसावा के दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित है। पुरातत्व की दृष्टि से यह टीला बहुत महत्वपूर्ण है। इस स्थान केअलावा नकुड़ व चिकलाना सहित सरसावा के आस-पास के एक बहुत बडे क्षेत्र में दुर्लभ पुरातत्व संपदा विद्यमान है।

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दरगाह जमालिया, मखदुम साहब की दरगाह

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गुग्गा पीर जाहरवीर की मां बाच्छल रानी सरसावा में जन्मी थी। नेविल गजेटियर में इसका उल्लेख किया गया है।
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भित्तिचित्रों से युक्त भव्य जैन मंदिर
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बनखंडी महादेव मंदिर –

महाभारत कालीन सिद्धिपीठ वनखंडी महादेव मंदिर के स्वयंभू शिवलिंग

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स्वराज्य मंदिर –

स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को अक्षुण्य बनाए रखने के उद्देश्य से स्वराज्य मंदिर संस्थान की स्थापना की गई है इस स्वराज्य संस्थान के अंतर्गत एक भव्य स्वराज्य मंदिर की स्थापना जिसमें सहारनपुर के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास संगमरमर पर लिखकर सुरक्षित रखा जाएगा।

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ऐविएशन रिसर्च सेंटर वायु सेवा स्टेशन

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