___________________________________________________जानिए – – –

मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के बारे में – – –

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देहरादून का संतला देवी मंदिर यहां का एक बहुत ही प्रसिद्ध धार्मिक स्लथ है। इस मंदिर को शांतला देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। संतला देवी मंदिर, देवी संतला एवं उनके भाई संतूर को समर्पित है। इस धार्मिक स्थल के प्रति श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के विश्वास का प्रतीक इस स्थान का बहुत धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है।

देहरादून का यह प्राचीन एवं लोकप्रिय धार्मिक स्थल देहरादून से 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। दून घाटी के घने जंगलों के बीच से होते हुए सन्तोर नामक गढ़ की एक ऊंची पहाड़ी पर नूर नदी के ठीक ऊपर संतला देवी विराजित हैं।

संतला देवी मंदिर दर्शन करने जाने के लिए देहरादून से जैतूनवाला तक किसी हल्के वाहन बाइक, गाड़ी आदि के द्वारा पंजाबीवाला नामक स्थान तक पहुंचा जा सकता है। पंजाबीवाला से श्रद्धालु लगभग 2 कि.मी. की पैदल चढ़ाई चढ़कर संतला देवी मंदिर पहुंचते हैं।

संतला माता के मंदिर में हर शनिवार के दिन एक चमत्कार होता है। इस दिन देहरादून जनपद में स्थित इस मंदिर में आस्था का मेला लग जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। मान्यता है कि माता के मंदिर में शनिवार के दिन चमत्कार होता है। कहा जाता है कि शनिवार को मां की मूर्ति पत्थर में बदल जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां आकर यदि कोई श्रद्धालु भक्त सच्चे मन से मनोकामना करता है तो उसकी मनोकामना देवी संतला अवश्य पूरी करती हैं।

प्राचीन कथा के अनुसार नेपाल के राजा को पता चला कि उनकी पुत्री संतला देवी से मुगल बादशाह शादी करना चाहता है। तब संतला देवी नेपाल से पर्वतों के रास्ते से होकर दून घाटी के इस स्थान पर पहुंची और एक पर्वत पर किला बना कर निवास करने लगी।

संतला देवी के इस स्थान पर निवास करने का पता चलने के बाद मुगलों ने किले पर हमला कर दिया। मुगलों के आक्रमण करने के बाद जब लड़ते-लड़ते संतला देवी और उनके भाई को एहसास हुआ कि वह मुगलों से लड़ने में सक्षम नहीं हैं तो संतला देवी और उनके भाई ने इसी स्थान पर अपने हथियार फेंक दिए और ईश्वर की प्रार्थना करनी शुरू कर दी। लोगों का विश्वास है कि उसी समय अचानक चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैल गया और वह दोनों पत्थर की मूर्ति में बदल गए। साथ ही किले पर जो मुगल सैनिक आक्रमण करने के लिए आए थे, वह सभी मुगल सैनिक भी उस दिव्य प्रकाश की चमक से अंधे हो गए। इसके बाद सन्तोर गढ़ में किले के स्थान पर स्वयं चमत्कारिक रूप से एक मंदिर बन गया।

जिस दिन संतला देवी और उनके भाई के पत्थर की मूर्ति में बदलने की घटना हुई थी, वह शनिवार का दिन था। इसलिए इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां संतला देवी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

संतला देवी के दर्शन करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं में बड़ी संख्या में संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले श्रद्धालु भी होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों के शासन के समय यहां सैनिक पूजा करने के लिए आते थे। अंग्रेजों की सेना के एक अफसर को अपने सैनिकों से इस मंदिर के महत्व के बारे में पता चला। उस अंग्रेज अफसर के कोई संतान नहीं थी। उसने विधि विधान से संतला देवी के मंदिर में पूजा की। पूजा करने 1 वर्ष के भीतर वह अफसर एक संतान का पिता बना। इसके बाद से मान्यता है कि यहां संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले श्रद्धालु पूजा करने के लिए आने लगे।

संतला देवी का मंदिर देहरादून का बहुत ही लोकप्रिय धार्मिक स्थल है बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

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