_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत)के १०० कि.मी. के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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ऊंचे पहाड़ों, विशाल घाटियों तथा जंगलों में बसा है देहरादून जनपद का जौनसार बावर का जनजातीय क्षेत्र। प्रकृति ने मुक्तहस्त से यहां पग-पग पर अपनी सुंदरता का खजाना बिखेरा है।देहरादून जिले का अधिकांश हिस्सा यूं तो मैदानी है , पर इसकी एक तहसील चकराता का यह सारा इलाका पहाड़ी है। पर्वतों के शिखर दून के निकट दो हजार फुट से लेकर इस इलाके के ऊपरी हिस्से में पंद्रह हजार फुट तक ऊंचे होते हुए हिमालय में जा मिले हैं। यहां के प्राकृतिक दृश्य बड़े ही विलक्षण हैं। जौनसार बावर इलाके में पहाड़ बहुत ही ढलवां हैं। इन्हें चारों ओर देखने से मन में भयमिश्रित आनंद की अनुभूति होती है। यहां पग पग पर प्रकृति के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं।

यहां के वन अनेकानेक बहुमूल्य वृक्षों से भरे हुए हैं। देवदार के वृक्ष प्रचुरता से मिलने के कारण यहां के एक पर्वतीय भाग का नाम देववन हो गया है। चीड़ और देवदार के वृक्षों से भरे जंगलों के कारण सर्दियों में यहां खूब हिमपात होता है।

इस जनजातीयक्षेत्र का महाभारत काल से भी गहरा संबंध है। महाभारत काल में भी यह जनजातिय क्षेत्र ही था। पांडवकालीन संस्कृति यहां के समाज में आज भी रची बसी हुई है। आज भी यहां के हर गांव में पांडवों की चौरीं मिल जाएगी, जहां पांडवों के प्रतीक के रूप में उनके अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं। पांडवों के इन अस्त्रों की प्रत्येक माह की संक्रांति के दिन पूजा की जाती है।

दुर्योधन ने कुंती सहित सभी पांडवों को जलाकर मारने का षड्यंत्र रचा था। इस क्षेत्र में स्थित आज के लाखामंडल के बारे में कहा जाता है कि दुर्योधन ने यहां लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। जिसमें उसने पांडवों को जलाकर मार देने की योजना बनाई थी। किंतु पांडव विदुर जी के संकेतों के आधार पर सुरक्षित बच कर निकल गए थे। इसके बाद पांडव इस क्षेत्र में भटकते रहे। महाभारत ग्रंथ के अनुसार लाक्षागृह से बचकर निकलने के बाद पांडव ‘एकचक्रा’ नगरी में गए थे। यहीं भीम ने बकासुर नामक राक्षस को मारा था। उस समय की ‘एकचक्रा’ नगरी ही आज के समय में ‘चकराता’ नाम से जानी जाती है। इस क्षेत्र के कई अन्य स्थान एवं गांवों के नाम महाभारतकालीन है।

यमुना नदी अपने उद्गम स्थल से पहाड़ों के बीच से होती हुई इस क्षेत्र में ‘कालसी’ पहुंचती है, जो देहरादून जिले का एक पुरातन स्थल है। यहां कालसी में यमुना नदी का संगम टौंस नदी से होता है।

यह क्षेत्र मुख्यतः जौनसार और बावर नामक दो भागों में बंटा है। चकराता से आगे का इलाका ‘जौनसार बावर’ कहलाता है और यह क्षेत्र देहरादून जिले के पर्वतीय स्थल चकराता के आसपास तथा दूरस्थ क्षेत्रों में फैला हुआ है। सामान्यतः यह क्षेत्र यमुना और टौंस नदियों के मध्यम में स्थित है। पूर्वी दिशा में यहां यमुना नदी बहती है और पश्चिमी दिशा में टौंस नदी बहती है।

जौनसार का अर्थ है जमुना के आर, अर्थात यमुना के इस पार का इलाका। इसी की तर्ज पर यमुना नदी के उस पार का क्षेत्र जौनपार(जमुना से पार) हुआ। यह भूभाग टिहरी जिले का एक विकासखंड है, जो अब जौनपुर कहलाता है। यहां का दूसरा क्षेत्र बावर कहलाता है। इसे यह बावर नाम यहां की एक प्रमुख नदी ‘पावर’ के कारण मिला है। जानकारी के अभाव में लोग इसे बावर बोल देते हैं। कालसी, चकराता व त्यूणी तहसीलें इसी क्षेत्र के अंतर्गत हैं। कालसी, लाखामंडल, बैराटगढ़ और हनोल आदि इस क्षेत्र के प्रमुख स्थल हैं।

यह इलाका सामाजिक दृष्टि से दो प्रमुख क्षेत्रों में बंटा हुआ है। क्षेत्र का नीचे का आधा हिस्सा जहां जौनसार क्षेत्र के नाम से जाना जाता है तो ऊपरी हिमाच्छादित इलाका बावर के नाम से जाना जाता है। इन दोनों क्षेत्रों में दो प्रमुख समुदाय निवास करते हैं।

देखा जाए तो यह दोनों क्षेत्र आपस में सटे हुए हैं किंतु इन क्षेत्रों के मूल निवासी अपनी उत्पत्ति बिल्कुल अलग-अलग मानते हैं। जौनसार जनजाति क्षेत्र के निवासी जिन्हें पासी कहा जाता है। जहां यह अपने आप को पांडवों का वंशज मानते हैं वहीं बावर क्षेत्र के लोग जिन्हें षाठी कहा जाता है अपने आप को दुर्योधन का वंशज कहते हैं। इन दोनों समुदायों के बीच आपस में विवाह संबंध भी यदा-कदा ही होते हैं। मैदानी इलाके के इतने नजदीक होते हुए भी शताब्दियों से यह दोनों समुदाय विश्व समुदाय से कटे हुए रहे, जिससे इनकी विशिष्ट संस्कृति और परंपराएं बची हुई हैं।

जौनसार बावर क्षेत्र अपने आप में ऐतिहासिक, पुरातात्विक, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से विशिष्ट वैभव समेटे हुए है।

जौनसार बावर क्षेत्र का प्राकृतिक सौंदर्य जितना आकर्षक है उतने ही आकर्षक हैं यहां के निवासी और उनके रीति- रिवाज।जौनसार की नारियां बहुत परिश्रमी होती है। वे स्वस्थ और सुंदर तो होती ही है, नृत्य और गीतों में भी उनकी गहरी रुचि होती है। यहां की स्त्रियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनती हैं और ढेर सारे रुपहले गहनों से लदी रहती हैं।

यहां के जौनसार बावर क्षेत्र की संस्कृति अन्य पर्वतीय इलाकों गढ़वाल, कुमाऊं और हिमाचल प्रदेश की संस्कृति से बिल्कुल अलग है। इस इलाके की कई चौंकाने वाली प्रथाएं जो भारत के अन्य क्षेत्रों के लोगों के लिए आश्चर्य एवं उत्सुकता का विषय हैं।

इस बृहत भूभाग को महासू सभ्यता का भूभाग भी कहा जाता है। इस इलाके के मेले-ठेले हों या बार-त्योहार, खुशी- गमी हो या दुख-दर्द सब जगह महासू देवता और उनके नायकों को शामिल पाएंगे। इस क्षेत्र के कृषकों और पशुपालकों का श्रमजीवी समाज आज भी अपनी समस्याओं के निवारण हेतु महासू देवताऔर उनके नायबों के अदृश्य प्रशासन पर ही भरोसा करता है।यह स्थानीय देवता यहां के समाज और संस्कृति में बहुत गहरे समाए हुए हैं। यहां के आराध्य महासू देवताओं और उनके नायबों के मंदिर इस इलाके के हर गांव में मौजूद हैं लेकिन महासू देवता का मूल एवं प्रमुख देवालय यमुना नदी की सहायक टौंस नदी के तट पर हनोल नामक स्थान पर स्थित है।

जौनसार बावर क्षेत्र में वचन न तोड़ने की प्रथा है, दिया हुआ वचन पूरा न करना यहां घोर सामाजिक अपराध है।

‘लोटा नमक’ नामक इस प्रथा में व्यक्ति के द्वारा बड़े से बड़ा संकल्प सिर्फ जुबानी ले लिया जाता है, जिसकी अहमियत किसी रजिस्टर्ड एग्रीमेंट से भी अधिक होती है। जो व्यक्ति एक बार संकल्प ले लेता है उसकी रक्षा के लिए जान की बाजी लगाने से भी नहीं चूकता। जौनसार बाबर इलाके के ‘जुबानी संकल्प’ यानी की ‘वचन में वजन’ प्रथा का इतना प्रभाव है कि संकल्प लेने में किसी कागज कलम आदि की आवश्यकता नहीं बल्कि लोटा-नमक की आवश्यकता होती है।

यह संकल्प लेने के लिए गांव के मुखिया जिसे यहां स्याणा कहा जाता है के घर पर एक पंचायत बुलाई जाती है। जिसमें गांव के हर परिवार से कम से कम एक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य रूप से होती है। भरी पंचायत में गांव का स्याणा पानी से भरा एक लोटा रख देता है और संकल्प लेने वाला व्यक्ति पानी से भरे लोटे में नमक की डली डालकर अपने किए हुए वायदे पर अटल रहने का वचन देता है।

यह संकल्प एक प्रतिज्ञा की तरह है जिसमें वह व्यक्ति कहता है कि मैं जो संकल्प लूंगा या वचन दूंगा उस पर हमेशा हर परिस्थिति में अटल रहूंगा। यदि मैं ऐसा न कर सका तो मेरा और मेरे परिवार का अस्तित्व ठीक उसी तरह से समाप्त हो जाएगा जिस तरह से पानी से भरे लोटे में नमक का हो जाता है।

इस क्षेत्र में यह लोक मान्यता है कि ‘लोटा-नमक’ का संकल्प करने के बाद यदि वह व्यक्ति अपने के वायदे से मुकरता है तो इस क्षेत्र के आराध्य देव ‘महासू देवता’ कुपित हो जाते हैं और उस व्यक्ति का परिवार सात पीढ़ियों तक विपत्तियां झेलते हुए नष्ट हो जाता है। इस क्षेत्र एक बड़े इलाके में इस परंपरा का सम्मान हमेशा से होता रहा है।

जौनसार बावर क्षेत्र की बहुपति प्रथा तो सभी को चौंकाती है, इसी का एक रिवाज बहुविवाह प्रथा है जो यहां देखी जाती हैं। यहां के अमीर जनजातीय लोग कई पत्नियां रखते हैं जबकि इसी समाज के गरीब लोग अपनी पत्नी को अपने भाइयों के साथ साझा करते हैं। इस इलाके की इसी प्रथा को बहुपति प्रथा कहा जाता है और यह प्रथा यहां बहुत पहले से चली आ रही है।

यहां कई भाइयों के बीच एक ही स्त्री रहती है। सबका उसी के साथ विवाह होता है। इसका कारण यह लोग पांडवों का अनुकरण बतलाते हैं। वनवास के समय में पांडव यही रहे थे।

विवाह को यहां ‘जोजोड़ा’कहते हैं। लड़के का पिता कन्या के पिता को रुपया देता है और कन्या का पिता एक दावत करता है, यही सगाई कहलाई जाती है। इसके बाद कन्या पक्ष वाले लड़की को वस्त्र आभूषण से अलंकृत कर और अपने सामर्थ्य के अनुसार बर्तन दहेज इत्यादि लेकर लड़के के घर जाते हैं। वहां उनका मदिरा और पारंपरिक व्यंजनों से सत्कार किया जाता है। बस यही विवाह है, यहां शास्त्रों के अनुसार कोई रीति रिवाज नहीं निभाए जाते। लेकिन आज के समय में यह कुरीति अब इस क्षेत्र में समाप्त प्राय: है।

इस क्षेत्र में अविवाहित (ध्यान्टुड़ियों) बालाओं को पूरी स्वतंत्रता है। जब तक वे अपने पिता के घर रहती हूं उन्हें पूरी स्वतंत्रता रहती है। वे कहीं आएं या कहीं जाएं कोई बंदिश या टोका-टाकी नहीं की जाती। किंतु जब जौनसार की अविवाहित बाला (ध्यान्टी) का विवाह हो जाता है यानी वह रयान्टी(विवाहिता) हो जाती है तो उसके जीवन में अनेक बंदिशें लगा दी जाती है यानी उससे हर तरह की आजादी छीन ली जाती है।

आभूषण यहां स्त्री-पुरुष दोनों धारण करते हैं इनका शौक इनको वृद्धावस्था तक बना रहता है। यहां की स्त्रियां मायके में होने पर अपने सिर पर एक कपड़ा बांधे रहती हैं। यह कपड़ा ढांटू कहलाता है। जब वह ससुराल में होती हैं तब एक बड़ी पगड़ी के सदृश्य टोपी पहनती हैं, इसे चौंरी या सागी कहते हैं।

जौनसार बावर क्षेत्र में पारंपरिक रूप से निचले इलाके के क्षेत्र में पत्थर और लकड़ी के मकान होते हैं परंतु ऊपरी इलाके के क्षेत्र में केवल लकड़ी के मकान होते हैं इसका कारण है उस इलाके में लकड़ी अधिकता से मिलती है। यहां के मकान तीन मंजिल वाले मकान होते हैं। यहां के लोग अपने मकानों में सबसे नीचे की मंजिल में अनाज रखते हैं, उससे ऊपर वाले हिस्से में जानवर और सबसे ऊपर वाले हिस्से यानी तीसरी मंजिल पर वे स्वयं रहते हैं।

यहां के लोग तंबाकू और मदिरा के बहुत शौकीन होते हैं। इनकी मदिरा का नाम राभड़ा है जिसे ये बरसात में एक पेड़ की छाल में कुछ अनाज मिलाकर उसकी रोटी सी बना लेते हैं फिर इसी को पानी में घोलकर कुछ दिन सड़ाते हैं, फिर उसी को पीते हैं।

जौनसार बावर का श्रमजीवी समाज रोजगार के लिए परंपरागत रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़ा हुआ है।इस क्षेत्र में पहाड़ बहुत ढालू होने के कारण खेतों की चौड़ाई बहुत अधिक नहीं होती। पहाड़ों को काटकर 10 फुट ऊंची छोटी छोटी दीवारें खड़ी करके सीढ़ियों जैसे खेत बनाए जाते हैं। नदी किनारे पर जो खेत होते हैं उनमें सिंचाई करने के लिए ‌ पानी की नालियां पहाड़ काटकर छोड़ी जाती हैं। जब बहुत तेज वर्षा होती है उस समय खड़े ढाल वाले पहाड़ होने के कारण इन खेतों को बहुत नुकसान पहुंचता है। क्षेत्र के किसान अदरक, हल्दी, मिर्च, आलू, अरबी, उड़द, राजमा आदि की खेती करते हैं। बेमौसमी जैविक सब्जियों, फलों और पशु उत्पादों के लिए यह क्षेत्र प्रसिद्ध है। ऊन भी यहां खूब होती है।

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