__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सन्निहित सरोवर – कुरुक्षेत्र

यह सरोवर कुरुक्षेत्र का सर्वाधिक प्राचीन तीर्थ है। सृष्टि की उत्पत्ति से संबंधित होने के कारण भी इसे सन्निहित नाम से जाना जाता है। यह सतयुगी तीर्थ है और इस सरोवर का कुरुक्षेत्र के तीर्थों में प्रमुख स्थान है।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्मा की उत्पत्ति इसी सरोवर से हुई –
यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्यण्डं तस्मिन् सन्निहितं सरः।
अण्डमध्ये ब्रह्मा लोक पितामहः।।
(वामन सरो. २२/३४/३५)

प्राचीन काल में यह सरोवर बहुत विशाल था। वामन पुराण में चारों ओर से इसका विस्तार आधा योजन बताया गया है –
सरः सन्निहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम्।
(वामन सरो. १/९)

वामन पुराण के अनुसार सन्निहित सरोवर की सीमा विश्वेश्वर से हस्तीपुर तक तथा वृद्ध कन्या जरदगवी से औधवती नदी तक है। –

विश्वेश्वरादस्तिपुरम् तथा कन्या जरद्गवी।
यावदोघवती प्रोक्ता तावत् सन्निहितं सरः।
(वामन पुराण २२/५३, १/७)

महाभारत एवं अन्य पुराणों में इस सरोवर का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। सूर्यग्रहण के अवसर पर इस तीर्थ का स्पर्श मात्र कर लेने से शत अश्वमेघ यज्ञों के फल की प्राप्ति होती है। –

सन्निहित्यामुपस्पृशय राहुग्रस्ते
अश्वमेध शतं तेन‌ इष्टं भवति शाश्वतम्।
(महाभारत वनपर्व ८१/१६७)

सन्निहित सरोवर का महत्व इसलिए भी है कि पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ नदी तथा तड़ाग आदि हैं वे सभी प्रत्येक मास निसंदेह सन्निहित सरोवर में आते हैं।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि अंतरिक्ष चराणि च।
मासि मासि समायान्ति सन्निहित्यां न संशयः।।
(महा. वनपर्व ८/८/८६,१९६)

सन्निहित तीर्थ का सूर्य ग्रहण से अटूट संबंध है। सूर्य ग्रहण स्नान के लिए यही स्थान विश्व भर में प्रसिद्ध है। विश्वास किया जाता है कि सूर्य ग्रहण के समय सब देवी देवता और तीर्थ यहां उपस्थित रहते हैं। इस विश्वास के लिए शास्त्रों में अनेक व्याख्यान प्राप्त होती हैं। तीर्थ पुरोहित यात्रियों से श्राद्ध तर्पण इसी स्थान पर करवाते हैं।

महाभारत के वन पर्व में सन्निहित सरोवर की प्रशंसा में वर्णित है कि इस तीर्थ में स्नान करने के पश्चात किसी अन्य तीर्थ में स्नान करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी तीर्थों सहित सभी नदी और तड़ागों का प्रत्येक मास यहां आगमन होता है। यहां स्नान कर लेने मात्र से सभी स्त्री और पुरुषों के पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं तथा वह व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

वामन पुराण में बताया गया है कि सृष्टि तथा ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का स्थान होने का गौरव भी इसी स्थान को प्राप्त है।

दधीचि ऋषि ने देवताओं की विजय के लिए देवराज इंद्र को अपनी अस्थियों का दान यहीं सन्निहित सरोवर के तट पर ही किया था। सन्निहित सरोवर के तट पर स्थित दुखभंजनेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करने के लिए नित्य प्रति प्रातः काल के समय दधीचि ऋषि आया करते थे। देवताओं की विजय के लिए वज्र अस्त्र बनाने के लिए एक दिन ब्राह्मण के वेश में देवराज इंद्र ने दधीचि ऋषि से उनकी अस्थियों को दान में मांगा था। दधीचि ऋषि के यह कहने पर कि सभी तीर्थों में स्नान करके ही वे अस्थि- दान करेंगे। तब देवराज इंद्र ने कहा था कि सन्निहित सरोवर में वह जिस जिस देवी देवता एवं तीर्थ का स्मरण करेंगे वह यहां प्रकट हो जाएंगे। अपनी मनोकामना पूरी हो जाने पर दधीचि ऋषि ने अपनी अस्थियों का दान देवराज इंद्र को कर दिया। इसके साथ ही यह वरदान भी दिया कि सन्निहित सरोवर में हर मास की अमावस्या के दिन सभी देवी देवताओं और तीर्थों का समावेश होगा।

सन्निहित सरोवर तीर्थ के तटों पर अनेक मंदिर एवं पूजा स्थल हैं। सूर्यनारायण मंदिर, सींख वाला लक्ष्मी नारायण मंदिर, दुखभंजनेश्वर शिव मंदिर, सिंहवाहिनी अष्टभुजा दुर्गा देवी, चतुर्भुज नारायण, ध्रुव नारायण के मंदिर में दुर्गा एवं हनुमान जी की प्रतिमाएं संतोषी माता का मंदिर आदि धर्म स्थानों पर श्रद्धालु भक्त सरोवर में स्नान करने के पश्चात पूजा अर्चना करते हैं। इन धर्म स्थलों के साथ ही यहां कई धर्मशालाएं भी स्थित हैं।

सन्निहित सरोवर पर बावन द्वादशी पर मेला लगता है।

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