___________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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शास्त्रीय संगीत का प्रसिद्ध ‘किराना घराना’ जिसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खा ने शुरू किया

संगीत में अलग अलग गुरु परंपराएं रही हैं। शास्त्रीय संगीत में बड़े-बड़े गुरुओं और उस्तादों की संगीत में अलग अलग कल्पनाओं से ही घरानों का जन्म हुआ। संगीत में प्रमुख सुर- ताल में कोमल और तीव्र को मिलाकर कुल बारह स्वरों में से ही अनेकानेक रागों का निर्माण हुआ। संगीत के रागों को प्रस्तुत करने का ढंग, उनको गाने की विशिष्ट अनुशासन की परंपरा शिष्यों में आगे बढ़ती रही। इसी से घरानों का जन्म हुआ।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रमुख घराना है ‘किराना घराना’ । किराना घराना शास्त्रीय संगीत का सबसे लोकप्रिय ।संगीत घराना है। इस शास्त्रीय संगीत घराने का सबसे अधिक प्रचार हुआ। आज जो किराना घराना है, उसका मूल स्रोत उस्ताद अब्दुल वहीद खां और उस्ताद अब्दुल करीम खां की गायकी में मिलता है। यह भी मान्यता है कि उस्ताद अब्दुल करीम खां ही असली मायने में किराना घराने के संस्थापक हैं।

किराना घराना के संगीतकारों का प्रकृति से अटूट रिश्ता बना रहा है इस घराने के मूल पुरुष अमीर खुसरो के समकालीन गोपाल नायक को माना जाता है। गोपाल नायक के समय के बारे में इतिहासकारों में भिन्न- भिन्न मान्यताएं है। बैजू बावरा ने अपनी ध्रुपदों में गोपाल नायक का वर्णन किया है। गोपाल नायक उच्च कोटि के ध्रुपद गायक थे। उन्होंने कई रागों का सृजन भी किया था। गोपाल नायक यमुना नदी के किनारे मेरठ के पास ‘दुलाई’ नामक गांव में रहते थे। यह गांव यमुना नदी के किनारे बसा था। बताया जाता है कि बरसात के दिनों में एक बार यमुना नदी में बहुत तेज बाढ़ आई और दुहाई नामक गांव उस बाढ़ में पूरी तरह से बहकर उजड़ गया। तब गोपाल नायक किराना नामक गांव में आकर बस गए।

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किराना शामली जनपद की एक तहसील है। किराना कस्बे से 8 किलोमीटर दूर हरियाणा की सीमा लगती है और इसके पास से ही यमुना नदी बहती है।
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संगीत की साधना के लिए उस समय किराना एक आदर्श स्थान था इसके चारों ओर आम के बाग थे वसंत के मौसम में आम के पेड़ों पर बौर आते ही चारों दिशाएं महक उठती थी और कोयल मधुर स्वर में कूहकूहाने लगती थी।

किराना से कुछ ही दूरी पर एक झील थी जहां हिरणों के झुंड झील का पानी पीने आते थे। यह झील तो अभी भी मौजूद है। लेकिन समय ने इस झील के चारों ओर फैली हरियाली कम कर दी और हिरणों के झुंड तो गायब ही हो गए हैं। ऐसा स्थान संगीत साधना के लिए आदर्श होता है। ऐसे ही वातावरण में संगीत की यह शैली पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।

बाद में गंगा-यमुना के दोआब के छोटे से कस्बे की वह गायकी ही पूरे भारत में छा गई। किराना कस्बे में ही सन 1872 में उस्ताद अब्दुल करीम खान का जन्म हुआ था।

पंडित गोपाल भट्ट की आगे की पीढ़ी में पंडित भैरव प्रसाद ने इस्लाम को कबूल कर लिया और उनका नाम कुतुब अली खां हो गया। कुतुब अली खां एक बीनकार थे। इनकी ही आगे की पीढ़ी में उस्ताद बंदे अली खां भारत के सुप्रसिद्ध वीणा वादक हुए। बंदे अली खान की बहन जोहरा बंदी अम्बेहटा के पुत्र उस्ताद बहराम खां प्रसिद्ध ध्रुपद गायक थे। इसी प्रकार इस संगीत घराने की संताने और उनके शागिर्द पीढ़ी दर पीढ़ी उच्च कोटि के संगीत साधक होते रहे।

आगे चलकर इस संगीत घराने में उस्ताद अब्दुल वहीद खां ने किराना गायकी को उसका प्रतिनिधि स्वरूप दिया। वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पहले गायक से जिन्होंने राग को नया रूप दिया। इनके अनेकों शार्गिदों में बड़े-बड़े संगीतकार थे।

इसी घराने में एक सारंगी बाज थे काले खां। उस्ताद अब्दुल करीम खां इन्हीं के सुपुत्र थे। अब्दुल करीम खां को अपने पिता काले खां, अपने चाचा अब्दुल्ला खां और ध्रुपद गायक नन्हे खां से गायन की तालीम मिली। इसके अलावा एनके चचेरे चाचा हैदर बख्श एक नामी सारंगी वादक थे। जिन्होंने उस समय के बड़े-बड़े प्रसिद्ध गायकों के साथ संगत करके खूब इनाम प्राप्त किए थे। उनके जरिए अब्दुल करीम खान को बचपन से ही संगीत के अच्छे संस्कार मिले थे। बाद में अब्दुल रहमान खां उनके गुरु बन गए। उस्ताद अब्दुल करीम खां से ही किराना घराने की गायकी का गौरव बढ़ा और शास्त्रीय संगीत के किराना घराने का चारों और नाम हुआ।

दस साल की उम्र से ही अब्दुल करीम खां ने महफिल में गाकर उस समय के अच्छे-अच्छे अच्छे गायकों को हैरान कर दिया था। जैसा की उस समय के रिवाज के अनुसार पंद्रह वर्ष की उम्र में ही वह देश भ्रमण के लिए घर से निकल गए थे। देश में नगर – नगर जलसे करते हुए वह गुजरात की बड़ौदा रियासत में आ पहुंचे। उनका मर्म भेदी गायन सुनकर बड़ौदा के राजा इतने मोहित हुए कि उन्होंने उस्ताद अब्दुल करीम खां को अपने दरबार में गायक नियुक्त कर लिया। बड़ौदा दरबार में वह तीन वर्ष रहे। बड़ौदा में रहना उनके गायन और व्यक्तिगत जीवन में परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ यहां उनके गायन में कहीं परिवर्तन आए और यही ताराबाई से उनका विवाह हुआ।

शुरू मैं तो उस्ताद अब्दुल करीम खां दरबारी मान-सम्मान पर बेहद खुश होते थे। लेकिन फिर उन्हें लगा कि वह अपनी कला को केवल एक महाराजा तक ही सीमित क्यों रखें। इसलिए 1902 में उन्होंने बड़ौदा दरबार की नौकरी छोड़ दी और मुंबई आ गए। उस्ताद अब्दुल करीम खां ने अपनी सुरीली, मधुर व मनमोहक आवाज के जादू से हजारों लोगों को अपने गायन का कायल कर लिया।

हां साहब अपनी फकीर तबीयत और स्वभाव के कारण धार्मिक संगीत की तरफ भी पूरा ध्यान देते थे। मराठी भाषा में भजन गायन में भी उनका विशेष योगदान है। उनकी एक ठुमरी ‘प्रिया बिना नहीं आवत चैन’ अत्यंत ही प्रसिद्ध है।

उस्ताद अब्दुल करीम खां जिस भी संगीत सम्मेलन अथवा महफिल में गायन सुनाते थे तो उनके प्रशंसक उनसे ठुमरी अवश्य सुनते थे। ठुमरी गायन को लोकप्रिय बनाने में इनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

सुनने वाले को बेचैन करने वाला सच्चा सुरीला स्वर उस्ताद अब्दुल करीम खां का था। उनकी गायन शैली से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एक नए युग का आरंभ हुआ था। अपने गायन के विभिन्न स्वरों से वे श्रोताओं को सम्मोहित कर देते थे । गायन करते समय स्वरों की खोज करते करते उनके विशाल भावपूर्ण नेत्र अर्थोंन्मीलित हो जाया करते थे।

बड़ौदा छोड़ने के बाद उस्ताद अब्दुल करीम खान महाराष्ट्र के मिरज में बस गए थे। खां साहब के दो बेटे कृष्णा राव व सुरेश बाबू माने जो गायन में निपुण व प्रसिद्ध हुए और तीन बेटियां हीराबाई बडोदेकर, सरस्वती राणे और कमलाबाई बडोदेकर थी। सभी को गायन में बहुत ही प्रसिद्धि मिली।
हालांकि खान साहब ने स्वयं अपनी बेटियों को गायन की तालीम नहीं दी क्योंकि कौन है लड़कियों का गाना बजाना पसंद नहीं था।

उस्ताद अब्दुल करीम खां अपनी पत्नी सहित महाराष्ट्र में रहे। खां साहब की मिठास से ओतप्रोत और कलेजे को छू लेने वाली मर्म भेदी गायकी से समूचा महाराष्ट्र मगन हो गया और बहुत कम समय में ही उसने इस कलाकार को अपने हृदय में समा लिया।

एक बार वे मिरज शहर में पीर ख्वाजा शमना मिरा की दरगाह के दर्शन करने के लिए गए और उन्हें वहां प्लेग हो गया। इनके मर्ज को बढ़ता हुआ देख कर सब लोग बहुत चिंतित हो गए इतने में ही एक फकीर ने ललकारा और कहा ‘ख्वाजा शमना मिरा की दरगाह में हाजरी दो अच्छे हो जाओगे’ उसी अवस्था में खां साहब दरगाह पहुंच गए और गाने लगे कुछ समय के बाद ही उन्हें आराम मिलने लगा और एक-दो दिन में वे पूरी तरह से स्वस्थ हो गए। उसके बाद से वह हर साल मिरज में ख्वाजा के उर्स में जाते थे और वहां सैकड़ों गरीबों को दान करते थे।

उनकी गायकी इतनी लोकप्रिय हो गई थी कि दूर-दूर से लोग उनके पास मिरज में गायन सीखने आते थे। उनका आर्शीवाद और तालीम जिन लोगों को मिली उनमें से बहुत से शार्गिदों ने किराना घराने का नाम रोशन किया।

उस्ताद अब्दुल करीम खां के बारे में कहा जाता है कि वह बिल्कुल मस्त मौला तबीयत के इंसान थे। वह केवल मानवता के ही आशिक नहीं थे बल्कि उनका पशु- पक्षियों से भी निकट का संपर्क था। उनका मानना था कि इन पशु- पक्षियों में भी संगीत के प्रति गहरा लगाव है बशर्ते कि हम इन जानवरों को भी प्यार दें । उन्होंने एक कुत्ता पाल रखा था जिसका नाम ‘उमंग’ था। उन्होंने अपनी तरह इस कुत्ते को भी संगीत के मोह जाल में पूरी तरह से मस्त कर रखा था। उन्होंने इस कुत्ते को आवाज देने के लिए एक विचित्र संगीतमय आवाज बना रखी थी जिसका जवाब उनका कुत्ता उमंग भी उसी तरह संगीतमय आवाज में दिया करता था। सन 1918 में मुंबई के अमरोली हाउस के एक संगीत सम्मेलन में अब्दुल करीम खां के साथ इस कुत्ते ने भी स्वर दिया था। यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि इसमें पूरी सत्यता है। ग्रामोफोन के रेकॉर्ड बनाने वाली H M V कंपनी के लोगो –
‘ग्रोमोफोन सुनता हुआ कुत्ता’ खां साहब के इसी कुत्ते के ऊपर बनाया गया था।

एक कलाकार की लोकप्रियता और सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उसके नाम पर हजारों लोग एकत्रित हो जाएं उस्ताद अब्दुल करीम खान को यह सौभाग्य प्राप्त था।

उन्होंने गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए अनेकों कार्यक्रमों को किया। एक परोपकारी जीवन जीते हुए सन 1937 में उनका निधन हो गया।

भारत में किराना घराने की गायन शैली का कोई सानी नहीं है। कई विख्यात नाम इस विराट वंश वृक्ष में हमें मिलते हैं। संगीत के किराना घराने की रोशनी में अनगिनत नाम चमके उनमें अब्दुल करीम खां के शिष्य पंडित सवाई गंधर्व, पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल जैसे नामों की एक लंबी श्रंखला है।
किराना घराना के गायक पंडित भीमसेन जोशी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया है।

किराना कस्बे के संगीत गायन के इन महान गुनी कलाकारों ने दुनिया को अपने संगीत के द्वारा आनंद के सागर में गोते लगवाएं लेकिन स्वयं किराना के निवासी इस आनंद से महरूम रहे। उन्होंने न तो कभी वहां के लोगों को संगीत के महत्व को समझाया और न यहां के लोगों ने स्वयं कुछ समझने की कोशिश की। इसकी कुछ वजह यह भी थी कि घराने वाले अधिकतर समय किराना से बाहर ही रहते थे। साल में कभी एक दो बार यहां अपने बीवी बच्चों से मिलने के लिए घर आते थे।

यह विडंबना ही है की संगीत की समझ न होने के कारण कैराना के लोग उनके व्यक्तित्व से परिचित ही नही हो सके और हमेशा उन्हें मिरासी कहकर ही पुकारते रहे।

एक बार उस्ताद अब्दुल करीम खां बंबई (अब- मुम्बई) से अपने परिवार वालों से मिलने के लिए अपने गांव कैराना आए। तांगे से जैसे ही वे अड्डे पर उतरे वहां मौजूद लोगों में से एक व्यक्ति दूसरे से कहने लगा – मिरासी अब्दुल करीम आया है। महान गायक उस्ताद अब्दुल करीम खान को यह सुनकर मर्मान्तक पीड़ा पहुंची। खान साहब बिना अपने घर गए अड्डे से ही उसी समय उसी तांगे से वापस बंबई लौट गए और फिर कभी भूल कर भी किराना का रुख नहीं किया।

किराना घराने के फनकारों की दास्तान संगीत प्रेमियों के दिलों में हमेशा अमिट बनी रहेगी।

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