__________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सनातन धर्म में संभल के तीर्थ स्थलों का बहुत महत्व है। पुराणों  शास्त्रो में संभल के तीर्थों और कूपों की परिक्रमा देने का वर्णन है।

संभल में ६८ तीर्थ और १९ कूप हैं। प्रतिवर्ष कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष चतुर्थी और पंचमी तिथि को इन तीर्थों और कूपों की परिक्रमा दी जाती है यह परिक्रमा २४कोस (७२ कि मी ) लंबी होती है। दूर-दूर से श्रद्धालु तीर्थयात्री इस तीर्थ यात्रा को देने यहां आते हैं। स्थानीय निवासी इस परिक्रमा को फेरी देना कहते हैं।

संभल के तीर्थ और कूप –

१ – सूर्य कुंड

इस कुंड का नाम अर्क कुंड भी है। इसके बीच में एक बहुत बड़ा कुआं है यहां एक शिव मंदिर है, जिसमें श्री कृणेश्वर का नाम का शिवलिंग है। प्रत्येक रविवार को यहां स्नान का महत्व है। कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की षष्टि तिथि को यहां मेला लगता है।

२ – हंस तीर्थ

सूर्य कुंड के निकट यह एक तालाब है। चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यहां की यात्रा होती है।

३ – कृष्ण तीर्थ

यह तीर्थ भी सूर्य कुंड के निकट ही एक तालाब है। श्रद्धालुओं का विश्वास है इसमें स्नान करने से चेचक रोग नहीं होता। आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को यहां की यात्रा होती है।

४ – कुरुक्षेत्र

संभल से चंदौसी जाने वाले मार्ग पर यहां से कुछ ही दूर यह तीर्थ है। इसके किनारे शिव मंदिर है। मंगलवार के दिन यहां स्नान का महत्व है। प्रतिवर्ष कन्या की संक्रांति के अवसर पर तथा सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहां श्रद्धालु विशेष रुप से  स्नान करने आते हैं।

५ – दशाश्वमेध

यहां के कुरुक्षेत्र तीर्थ के दक्षिण में यह तीर्थ है।

इस तीर्थ स्थान पर राजा ययाति ने १० अश्वमेघ यज्ञ किए थे।

जेष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी तिथि तक यहां स्नान का महत्व है।

६ – विष्णुपादोदक

यहां के दशाश्वमेध तीर्थ के समीप ही उत्तर दिशा में नूरियोंसराय के समीप यह तीर्थ है। प्रतिवर्ष कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को यहां की यात्रा और स्नान होताा है।

७ – विजय तीर्थ

नूरियोंसराय के दक्षिण दिशा में यह तीर्थ है। अश्विन शुक्ल दशमी विजयादशमी के दिन यहां मुख्य स्नान और यात्रा का महत्व है।

८ – श्वेतदीप

सैफखांसराय नामक स्थान पर यह तीर्थ है। प्रतिवर्ष वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यहां की यात्रा होती है।

९ – ज्ञानकेशव

श्वेतदीप तीर्थ के पास ही यह तीर्थ है। पहले इस तीर्थ का नाम कृष्णकेशव था।

गरुड़ जी ने यहां इस तीर्थ पर निवास किया था।

गणेश चतुर्थी को यहां स्नान का महत्व बताया गया है।

१० – पिशाचमोचन

ज्ञानकेशव तीर्थ के उत्तर में ही यह स्थान है। पहले इस तीर्थ का नाम विमलोदक था।

श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को यहां स्नान होता है।

११ – चतुर्मुख कूप

पिशाच मोचन तीर्थ के पास ही यह एक बहुत बड़े आकार का कुआं है।

यहां ब्रह्मा जी ने निवास किया था।

प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को यहां स्नान होता है।

१२ – नैमिषारण्य

संभल के ही ज्ञान केशव तीर्थ के पास यह एक कुआं है।

पुराणों के अनुसार इस कुएं को भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से खोदा था।

इस तीर्थ पर प्रत्येक बृहस्पतिवार और त्रयोदशी के दिन स्नान होता है। बृहस्पतिवार के दिन तो दूर-दूर से श्रद्धालु यहां स्नान करने आते हैं।

इस तीर्थ के किनारे ही स्थित बाबा क्षेमनाथ साधु की समाधि पर श्रद्धालु चने की दाल और चने के लड्डू चढ़ाते हैं।

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को यहां मेला लगता है।

१३ – धर्मनिधि

नैमिषारण्य तीर्थ के दक्षिण में यह स्थान है। यहां मंगलवार और चतुर्थी के दिन स्नान होता है।

१४ – चतुस्ससागर

संभल के ही विजय तीर्थ के दक्षिण में मदार का टीला के पास यह स्थान है।

१५ – एकान्ती

वहीं पास में ही यह स्थान है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की तृतीय को यहां मेला होता है।

१६ – उर्ध्वेरेता

एकान्ती तीर्थ के निकट कृष्णदास सराय की बस्ती के पास यह स्थान है। अष्टमी तिथि को यहां स्नान का महत्व है।

१७ – अवन्तीश्वर

ऊर्ध्वेरेता के ही पास यह स्थान है।

१८ – लोलार्क

इस स्थान को लहोकर भी कहा जाता है। हल्लू सराय के पास यह स्थान है माघ माह की सप्तमी को यहां स्नान करके श्रद्धालु सूर्योपासना करते हैं।

१९ – चंद्रतीर्थ

लोलार्क तीर्थ के पास ही यह स्थान है। यहां चंद्रग्रहण के समय स्नान होता है।

२० – शंखमाधव

हल्लूसराय से पूर्व में यह स्थान है। अश्विन शुक्ल सप्तमी के दिन यहां स्नान होता है।

२१ – यमघंट

हल्लूसराय के समीप ही यह स्थान है। यम द्वितीया के दिन तथा जेष्ठ माह के शनिवार के दिन यहां स्नान का महत्व है।

२२ – अशोक कूप

यमघंट के समीप ही यह स्थान है। अशोक अष्टमी के दिन इस स्थान की यात्रा की जाती है।

२३ – पंचाग्नि कूप

अशोक कूप के निकट ही यह स्थान है। वैशाख माह के प्रतिदिन इस तीर्थ में स्नान का महत्व है।

२४ – पापमोचन तीर्थ

चौधरीसराय के पास यह स्थान है। अश्विन माह की शुक्ल पक्ष अष्टमी को यहां की यात्रा और स्नान का महत्व है।

२५ – कालोदक

चौधरीसराय में यह स्थान है दीपावली के दिन इस तीर्थ की यात्रा होती है।

२६ – सोमतीर्थ

चौधरीसराय में यह स्थान है सोमवती अमावस्या के अवसर पर यहां स्नान होता है।

२७ – चक्र सुदर्शन

सोम तीर्थ के पास ही यह स्थान है

भगवान ने चक्र सुदर्शन से इसे खोदा था।

२८ – गोकुल बनारसी

सोम तीर्थ के  पास ही  यह स्थान है ।इस तीर्थ का नाम गोतीर्थ भी है।

कामधेनु ने यहां निवास किया था।

२९ – अंगारक

हयातनगर के पास यह स्थान है।

मंगलदेव का यहां निवास हुआ था।

प्रत्येक मंगलवार के दिन यहां स्नान होता है।

३० – रत्नप्रयाग

अंगारक तीर्थ के पास ही यह स्थान है।

यह ५ तीर्थ है जो पंच प्रयाग के नाम से पुकारे जाते हैं इन तीर्थों की यात्रा प्रत्येक माह की सप्तमी को होती है यह पंच प्रयाग निम्न है  —

३१ – वासुकी प्रयाग

नाग पंचमी के दिन यहां स्नान होता है।

३२ – क्षेमक प्रयाग

जन्माष्टमी के दिन यहां मेला लगता है।

३३ – तारक प्रयाग

३४ – गंधर्व प्रयाग

३५ – मृत्युंजय

हयातनगर के पास यह तीर्थ है।

मंगलवारी छठ  तथा जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा के दिन यहां स्नान का महापर्व होता है।

३६ – ज्येष्ठपुष्कर

हयातनगर में नीलकंठ वाले बाग में यह स्थान है।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यहां की यात्रा होती है।

३७ – मध्यपुष्कर

जयेष्ठपुष्कर के निकट ही यह भी तीर्थ है।

परिक्रमा वाले दिन यंहा स्नान होता है।

३८ – कनिष्ठपुष्कर

मध्यपुष्कर के पास ही यह तीर्थ है।

प्रत्येक अष्टमी तिथि तथा कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष कीअष्टमी को यहां स्नान होता है।

३९ – धर्मकूप

हयातनगर से थोड़ी ही दूरी पर संभल से बहजोई जाने वाले मार्ग पर यह स्थान है।

* पञ्चगोवर्धन

४० – नन्दा

४१ – सुनन्दा

४२ – सुमना

४३ – सुशीला

४४ – सुरभी

यह पांच तीर्थ पञ्चगोवर्धन के नाम से प्रसिद्ध है। हयातनगर से दक्षिण-पूर्व कुछ दूरी पर यह स्थान हैं।

प्रत्येक अमावस्या और दीपावली के दिन इनमें स्नान होता है।

४५ – ब्रह्मावर्त

सराय तरीन से दक्षिण-पूर्व में यह स्थान है।

४६ – नर्मदा

ब्रह्मावर्त तीर्थ से थोड़ी दूर की यह स्थान है।

सिंह की सक्रांति के दिन यहां स्नान का पर्व होता है।

४७ – वाग्भारती

सरायतरीन से पश्चिम में यह स्थान है।

ऋषि पंचमी तिथि और त्रयोदशी के दिन यहां स्नान होता है।

४८ – वंशगोपाल

संभल से लगभग २ किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में यह तीर्थ स्थल है। किनारे पर वटवृक्ष और शिव मंदिर स्थित है।

कार्तिक शुक्ल  चतुर्थी को  संभल के तीर्थों की २४ कोस की परिक्रमा यहां से आरंभ होती है और इसी स्थान पर कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन समाप्त होती है।

४९ – रेवाकुण्ड

वंशगोपाल तीर्थ से उत्तर दिशा में कुछ ही दूरी पर यह स्थान है।

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को यहां की यात्रा होती है।

५० – सिंहगोदावरी

वंशगोपाल से उत्तर में यह स्थान है। सिंह की संक्रांति के दिन यहां यात्रा होती है।

५१ – रसोदक कूप

यह कूप संभल से भविष्यगंगा का जाने वाले मार्ग पर वाग्भारती से कुछ ही दूरी के अंतर पर स्थित है।

यहां देवी का स्थान है और संभलेश्वर महादेव का मंदिर है।

५२ – गोमती

यह तीर्थ भविष्यगंगा के निकट स्थित है और उसका ही एक अंग है।

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष द्वादशी के दिन यहां स्नान होता है।

५३ – भविष्यगंगा

यह स्थान कबीर की सराय के पास स्थित है

इस तीर्थ में स्नान का फल गंगा जी के स्नान के समान है।

शास्त्रों के अनुसार जब सूर्य – चंद्र और बृहस्पति तीनों एक साथ पुष्य नक्षत्र पर आ जाएंगे, तब यह गंगा हो जाएगी। उसी काल में यहां संभल में कल्कि भगवान का अवतार होगा।

यहां पर कार्तिक माह की पूर्णिमा और चंद्र ग्रहण पर स्नान होता है। संक्रांति और अष्टमी को यहां की यात्रा होती है।

५४ – ऋणमोचन

यह तीर्थ मनोकामना तीर्थ के निकट ही स्थित है।

अमावस्या के दिन यहां स्नान होता है।

५५ – मनोकामना

यह तीर्थ मोहल्ला कोट के निकट स्थित है। इस तीर्थ के चारों ओर धर्मशाला आदि बनी हुई हैं। जिनमें साधु- महात्मा और यात्री ठहरते हैं।

प्राचीन समय में इस तीर्थ का नाम महोदकी था।

इस तीर्थ पर एकादशी, कार्तिक पूर्णिमा,   सोमवती अमावस्या और चंद्र ग्रहण पर स्नान का महत्व है।

५६ – माहिष्मती

मनोकामना तीर्थ के पास ही यह तीर्थ है I

मेवासुर राक्षस को देवी जी ने मारा, उससे ही यह नदी उत्पन्न हुईI

५७ – पुष्पन्त

यह तीर्थ रत्नजग के पास स्थित है।

पुष्यनक्षत्र में यहां की यात्रा होती है।

५८ – अकर्ममोचन

यह स्थान पुष्पदंत तीर्थ के पास स्थित है।

चैत्र माह की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को इसकी यात्रा होती है।

५९ – आदिगया

यह तीर्थ मोहल्ला रुकनुद्दीनसराय के पास स्थित है।

गयाजी जाने वाले श्रद्धालु पहले यहीं पितृ श्राद्ध करते हैं। शास्त्रों में इस तीर्थ को आदिगया कहा गया है।

पितृपक्ष में इस तीर्थ की यात्रा होती है।

आश्विन माह की अमावस्या को श्रद्धालु यहां स्नान, पितृ- तर्पण आदि करते हैं।

६० – गुप्तार्क

अकर्ममोचन तीर्थ के पास यह स्थान है।

द्वादशी तिथि को यहां की यात्रा होती है।

६१ – रत्नजग

मोहल्ला दीपासराय के निकट यह तीर्थ स्थित है।

६२ – चक्रपाणि

रत्नजग के पास ही यह तीर्थ स्थित है।

इस तीर्थ को भगवान विष्णु के चक्र से खुदा हुआ बताया जाता है।

वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन इसकी यात्रा होती है।

६३ – स्वर्गद्वीप

यह तीर्थ चक्रपाणि तीर्थ के पास है।

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में यहां की यात्रा होती है।

६४ – मोक्ष तीर्थ

संभल से पश्चिम दिशा की ओर लगभग ६ किलोमीटर की दूरी पर महमूदपुर और पुरके मध्य यह तीर्थ स्थित है।

६५ – मलहानिक

संभल के उत्तर दिशा में भागीरथी तीर्थ के निकट यह स्थान हैं।

बताया जाता है कि यहां स्नान करने से, भुवनेश्वर महादेव के तथा मालखजनी देवी के पूजन से चार युगों के पाप छूट जाते हैं।

दुर्गाष्टमी तथा मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को यहां की यात्रा होती है।

६६ – त्रिसंध्या

भागीरथी- तीर्थ के उत्तर दिशा में सती स्थान के निकट यह तीर्थ है।

यहां मेष की संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।

६७ – भागीरथी

तिमरदाससराय के निकट यह तीर्थ स्थित है।

जिस समय महाराजा भागीरथ जी श्री गंगाजी को लाए थे, उस समय वे इसी स्थान पर ठहरे थे।

प्रत्येक अष्टमी को यहां की यात्रा होती है I

यहां स्नान करने के बाद श्री भुवनेश्वर महादेव का पूजन श्रद्धालु करते हैं।

६८ – मत्स्योदरी

यह तीर्थ मियांसराय के निकट स्थित है।

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष नवमी को यहां की यात्रा होती है।

६९ – भद्रकाश्रम

ठेर मोहल्ले के पास यह तीर्थ भदेसरे के नाम से प्रसिद्ध है।

भाद्रपद मास में बुद्धाष्टमी के दिन इसकी यात्रा होती है।

७० – अनन्तेश्वर

भद्रकाश्रम तीर्थ के पास ही यह स्थान स्थित है।

७१ – अत्रिकाश्रम

चिमनसराय के निकट यह स्थान स्थित है।

अत्रि ऋषि ने इस स्थान पर तप किया था।

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष पंचमी को यहां की यात्रा होती है।

७२ – देवखात

मियांसराय में यह तीर्थ स्थित है।

इसको देवताओं ने खोदा था।

पूर्णिमा के दिन इस स्थान की यात्रा होती है।

७३ – विष्णुखात

देवखात के पूर्व दिशा में यह स्थान स्थित है।

भगवान ने इस स्थान पर विश्राम किया था।

७४ – यज्ञकूप

यह कूप हरि मंदिर के अंदर स्थित है।

७५ – धरणी – बाराहकूप

यह हरिमंदिर के पश्चिम में स्थित है।

इस स्थान पर वाराह अवतार की पूजा होती है।

७६ – हृषीकेशकूप

हरि मंदिर से पूर्व दिशा में मोहल्ला पूर्वीकोट में खागियों के घरों के निकट यह कूप स्थित है।

७७ – पराशरकूप

पूर्वीकोट मोहल्ले में यह कूप स्थित है।

७८ – विमलकूप

पूर्वीकोट मोहल्ले में ही यह कूप भी स्थित है।

पूरे कार्तिक माह यहां प्रातः कालीन स्नान होता है।

७९ – कृष्णकूप

कल्कि विष्णु भगवान मंदिर के बाहर यह कूप स्थित है।

८० – विष्णु कूप

यह कूप मोहल्ला सानीवाल में स्थित है।

प्रत्येक द्वादशी तिथि को यहां की यात्रा होती है।

८१ – शौनककूप

मनोकामना तीर्थ के पास सड़क के किनारे यह कूप स्थित है।

शौनक ऋषि ने इस स्थान पर तप किया था।

८२ – वायुकूप

यह कूप मोहल्ला पश्चिमीकोट में दिल्लीद्वार के पास स्थित है।

८३ – जमदग्निकूप

वायु कूप से कुछ ही दूर उत्तर दिशा में यह कूप स्थित है।

ऋषि जमदग्नि ने इस स्थान पर आराधना की है।

८४ – अकर्ममोचन कूप

यह कूप भी जमदग्नि कूप के पास ही स्थित है।

८५ – मृत्युंजयकूप

जमदग्निकूप के ही निकट थोड़ी दूरी पर उत्तर दिशा में यह कूप भी स्थित है।

८६ – बलिकूप

तहसील की इमारत के पास ही यह कूप स्थित है।

८७ – सप्तसागर कूप

यह कूप सरथल दरवाजे के निकट स्थित है।

इस कूप के निकट सरथलेश्वर महादेव का मंदिर है। सात समुद्रों का जल लाकर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

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स्थानीय निवासियों की अपने ही पौराणिक तीर्थों और प्राचीन धरोहरों को सहेजने के प्रति उदासीनता और प्रशासन की ऐसे  पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों को महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में नहीं बदलने की लापरवाही से संभल के बहुत से तीर्थों और कूपों की स्थिति ठीक नहीं है।

यदि प्रदेश सरकार का पर्यटन विभाग इन स्थानों की सुध ले और कोई ऐसा प्रशासक जो इस पौराणिक स्थान के महत्व को समझे यहां आए, तो यह स्थान एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है।

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