यमुना के पश्चिमी तट का विस्तृत भू क्षेत्र अत्यंत पावन भूमि है। इस पावन भूमि पर पुण्य सलिला सरस्वती की प्रचुर जल से संपन्न महा धारा बहती थी। सरस्वती एक नदी नहीं एक बहती हुई संस्कृति थी। इसी से ऋषि यों ने इसे नदी नहीं नदी तमा का नाम दिया।

ब्रह्मा जी ने यहां यज्ञ किया। अन्यान्य देवताओं ने , ऋषि यों ने यहां अनेकानेक यज्ञ किए, तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिए तथा

उनके कहने पर यहां पर आज भी वास कर रहे

सरस्वती नदीहैं

  1. पुराणों के अनुसार यह सारा क्षेत्र तपोभूमि है

सरस्वती के तटों पर ऋषि गण अपने आश्रमों में सहस्र ओं शिष्यों के साथ रहते थे। जहां वे तब करते थे और विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। ऋषि आश्रम ही धर्म और संस्कृति की शिक्षा के सर्वोत्तम केंद्र थे

सरस्वती नदी के तटों पर बैठकर ऋषि यों ने वेदों की

ऋचाओं की रचना की।

इसके तटों पर ही सर्वप्रथम वेद की ऋचाओ का गान किया।

ऋग्वेद का पहला हिस्सा इसके किनारे बैठकर ही लिखा गया।

सरस्वती नदी के किनारे ही उच्च कोटि के सूक्त लिखे गए।

इससे सरस्वती को विद्या की देवी ही मान लिया गया

ऋग्वेद में भारत की प्रमुख नदियों के बारे में बताते हुए सबसे अधिक मंत्रों से सरस्वती की वंदना की गई है। इसकी महिमा गाई है।

यही महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि विश्वामित्र के आश्रम थे। यही महर्षि वशिष्ठ तथा महर्षि विश्वामित्र ने ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त किया।

महर्षि विश्वामित्र को यही ब्राह्मण त्व प्राप्त हुआ।

महाराजा कुरु ने यही पावन सरस्वती नदी के तट पर सबसे पहले हल चला कर खेती करना शुरू किया था।

पुराणों के वर्णन के अनुसार इसी सरस्वती नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था।

पुराणों में उल्लेख आता है कि इस भूमि मैं किया हुआ कोई भी शुभ कार्य कई गुनी वृद्धि को प्राप्त होता है।

सरस्वती के तट से ही कुरुक्षेत्र को भारतीय जनमानस में इतना बढ़ा तीर्थ माना गया है।

महाभारत युद्ध के समय सरस्वती नदी लुप्त होने लगी थी। बाद में यह पूरी तरह लुप्त हो गई

लुप्त होने के इतने बड़े कालखंड के बाद भी यह सनातन संस्कृति की स्मृति से लुप्त नहीं हुई।

आज भी जनमानस के मन में इसके प्रति आस्था और विश्वास है।

सरस्वती चाहे विलुप्त हो गई हो। उसके कारण चाहे जो रहे हो, लेकिन वह हमारी स्मृति में आज भी है।

धर्म वान व्यक्ति प्रतिदिन इस पावन स्त्रोत्र

गंगे च यमुने चैव गोदावरी च सरस्वती।

नर्मदा सिंधु कावेरी जले स्मिंन सान्निधिम कुरू।।

के द्वारा श्रद्धा से स्मरण करते हैं।

सरस्वती नदी हरियाणा के आदि बद्री स्थान पर शिवालिक की पहाड़ियों से एक जलधारा के रूप में प्रकट होती थी।

आदि बद्री सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है। इस स्थान को नासा व इसरो संगठनों ने भी प्रमाणित किया है।

सरस्वती नदी के किनारे पर महाभारत से लेकर हड़प्पा जैसी संस्कृतियों का विकास हुआ था।

सरस्वती नदी के प्रवाह के प्राचीन मार्ग के तटो के स्थानों पर पुरातत्व खुदाई में प्राचीन सभ्यता होने के अवशेष मिले हैं।

प्राचीन सरस्वती नदी के लुप्त मार्ग को तलाशने का कार्य कई वर्षों से हो रहा है। सैटेलाइट उपग्रहों द्वारा मिले चित्रों की सहायता से वैज्ञानिक इसके मार्ग की पहचान कर उन स्थानों पर खुदाई करके इसके मार्ग को तलाश रहे हैं

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