_______________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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खड़ी बोली  के  संत कवि  गंगा दास जी –

हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के प्रथम कवि संत गंगा दास जी ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।

 

इस क्षेत्र  के हिंदी भाषा की खड़ी बोली के माध्यम से काव्य पदों की रचनाकर गांव-गांव में घूमकर साहित्य साधना और प्रभु भक्ति करने वाले भावुक भक्त संत कवि गंगा दास जी कबीर दास जी की तरह फक्कड़ और क्रांतिकारी संत थे। उन्होंने हिंदी की  खड़ी बोली में काव्य पदों की  रचना करके भगवान की भक्ति के लिए प्रेरित किया वहीं   समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास को दूर करने के लिए वे  गांव-गांव में घूमकर समाज को जागरूक करते थे।

संत गंगा दास जी का जन्म गढ़मुक्तेश्वर तीर्थ क्षेत्र के गांव रसूलपुर में बसंत पंचमी के दिन 1823 में हुआ था बचपन में इनका नाम गंगा दास था। बचपन से ही इनके अंतरमन में  धार्मिक संस्कार थे। जब यह छोटे बालक ही थे उस समय भगवान के ध्यान में आंख बंद कर नाम संकीर्तन करते तो परिवारीजन जी भाव विभोर हो उठते थे।

बचपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया  उस समय उनकी आयु 10 वर्ष थी। इसके बाद तो बालक गंगा दास का सारा समय संतों के सत्संग और भगवान की भक्ति में बीतने लगा। 11 वर्ष की आयु में इन्होंने घर बार छोड़ दिया।

उदासीन संप्रदाय के संत विष्णु दास जी के संपर्क में आकर  इन्होंने अपना सारा जीवन काव्य साधना और गीता के प्रचार प्रसार में लगाने का संकल्प ले लिया। संत विष्णु दास जी ने इस किशोर की प्रतिभा और निश्चल भक्ति को परख  इन्हें दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया और  गंगा दास नाम दिया।

संत गंगा दास जी ने शास्त्रों की शिक्षा संत विष्णुदास जी से प्राप्त की। बाद में संत विष्णुदास जी ने उन्हें संस्कृत के धर्म ग्रंथों के गूढ़ अध्ययन के लिए काशी भेज दिया । वहां उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक रहकर धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया और साधना की । काशी से संत गंगा दास जी ग्वालियर गए और वहां एक कुटिया बनाकर रहने लगे। इनकी कुटिया में उस समय के अनेक राष्ट्रभक्त  क्रांतिकारी मिलने आते थे। रानी लक्ष्मीबाई भी अपनी अंतरंग सखी मुंदर के साथ गुप्त रूप से कुटिया में इनका दर्शन करने के लिए गई थी। संत  गंगा दास जी ने  रानी लक्ष्मी बाई को  स्वाधीनता के लिए हमेशा तत्पर रहने की  प्रेरणा दी ।इस बारे में प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटकों के लेखक वृंदावन लाल वर्मा ने अपनी ‘झांसी की रानी’ पुस्तक में लिखा है।  रानी लक्ष्मी बाई के वीरगति पाने के बाद उनका दाह संस्कार 18 जून1858 को ग्वालियर में संत गंगादास के हाथों से किया गया था।

संत गंगा दास जी लगभग 20 वर्षों तक गढ़मुक्तेश्वर के प्राचीन पौराणिक स्थान नक्का कुआं के पास कुटिया बनाकर रहे। यहां के गंगा खादर क्षेत्र के खानपुर, रसूलपुर आदि गांवों में रहते हुए भगवान की भक्ति व साहित्य साधना के साथ साथ कुरीतियों के प्रति समाज को भी जागरूक करते रहे।

संत गंगा दास जी ने सन 1913 में पावन श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में गढ़मुक्तेश्वर के गंगा तट पर निर्वाण प्राप्त किया।

संत गंगा दास जी का लिखा अधिकतर साहित्य प्रकाशित नहीं हुआ है और ग्रामीण अंचल में पीढ़ी दर पीढ़ी इनकी रचनाएं लोगों को मुंहजबानी याद रहती थी। इसलिए ही डॉ रामकुमार वर्मा द्वारा लिखे गए हिंदी साहित्य के इतिहास में उसे नहीं रखा जा सका है। संत गंगा दास जी हिंदी खड़ी बोली के प्रथम कवि हैं। इनका साहित्य प्रकाशित नहीं होने के कारण संत गंगा दास जी की हिंदी भाषा के इतिहास लेखन में उपेक्षा की गई है। आज उनका बहुत साहित्य उपलब्ध है और उनके लिखें अन्य साहित्य की खोज भी जारी है। संत गंगा दास जी भक्ति साहित्य की रचना करने में सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र से भी पहले उन्होंने अपनी आध्यात्मिक भावनाओं को खड़ी भाषा में कह कर प्रस्तुत किया था। शोध के द्वारा उनके लिखे साहित्य में इस क्षेत्र के ग्रामीण जीवन के सांस्कृतिक वैभव की सुंदर छवि को जाना जा सकेगा।

 

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भोपाल सिंह पौलस्त्य   ‘महात्मा रावण’

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सिद्ध बाबा के नाम से जाने जाने वाले साहित्यकार भोपाल सिंह पौलस्त्य का जन्म मुजफ्फरनगर जनपद के गांव भोपा में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा कैराना में हुई और बाद की शिक्षा इन्होंने शामली और मेरठ में प्राप्त की परन्तु इनकी कर्मभूमि थानाभवन रही। थाना भवन के लाला लाजपत राय इंटर कालेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी पौलस्त्य साहित्य के सृजन में लगे रहे। पौलस्त्य भले ही साहित्य के उस ऊंचे मंच तक नहीं पहुंच सके जहां से उन्हें पूरा देश देख कर उनके साहित्य को सराह पाता। लेकिन उनकी रचनाओं को जिस किसी ने भी पढ़ा उसने उनकी प्रशंसा की और उनका मुरीद हो गया। पौलस्त्य के जीवन में भी ऐसे कई अवसर आए जो उन्हें आगे की पंक्ति के साहित्यकारों के साथ खड़ा कर सकते थे। लेकिन अपने  स्वाभिमान से  समझौता करके  उन्होंने किसी की चाटुकारिता के द्वारा ऊंचा स्थान प्राप्त करने की कोशिश नहीं की। बताते हैं कि पौलस्त्य को शिक्षा और लेखन का इतना जुनून था कि किसी समय कोई विषय उनके मस्तिष्क में आता तो वे लगातार उस विषय पर लिखने में कई कई घंटे बिता देते थे।

पौलस्त्य की प्रसिद्ध रचना ‘महात्मा रावण’ को पढ़कर तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी उनको दिल्ली बुलाकर पीठ थपथपाई थी और कहा था कि महात्मा रावण के बारे में तो दक्षिण के लोग भी इतना नहीं जानते होंगे, जितना पौलस्त्य ने लिखा है।

साहित्यकार भोपाल सिंह पौलस्त्य की अमर रचनाएं

बाबा ने 3 दर्जन से अधिक रचनाएं लिखी लेकिन इनमें जययात्रा, भूल का शूल, देवयानी, अमर विधा, रामात्मा, कृष्णद्वीप, पृथ्वीपुत्र, ऋषभ नंदन, भावना आदि रचनाएं बहुत प्रसिद्ध है।

 

 

 

 

 

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