_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभ की कल्पना का आधार सागर मंथन है। देवताओं और दैत्यों के द्वारा सागर का मंथन किया गया जिसके फलस्वरूप अमृत कुंभ निकला। कुंभ महापर्व के साथ अमृत गहरे से जुड़ा हुआ है।

महाकुंभ पर्व को पुराणों में वर्णित समुद्र मंथन की कथा से जोड़कर देखा जाता है। पौराणिक ग्रंथ अमृत कुंभ के वर्णनों तथा इसके महत्व और अन्य आख्यानों से भरे पड़े हैं। शास्त्रों के अनुसार कुंभ के आयोजन के संदर्भ में धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ी एक कथा है जिसके अनुसार एक बार देवताओं और दैत्यों के बीच संघर्ष हुआ। दैत्यों और दानवों ने बड़ी भारी सेना लेकर देवताओं पर चढ़ाई की। उस युद्ध में दैत्यों से देवता परास्त हो गए। दैत्यों ने देवताओं के स्वर्गलोक पर कब्जा कर लिया, तब इंद्र आदि संपूर्ण देवता ब्रह्मा जी की शरण में गए। वहां उन्होंने अपना सारा हाल ब्रह्मा जी को सुनाया। ब्रह्मा जी ने देवताओं की बातों को सुनकर कहा ‌ – ‘तुम लोग मेरे साथ भगवान की शरण में चलो।’ यह कहकर ब्रह्मा जी संपूर्ण देवताओं को अपने साथ लेकर क्षीरसागर के उत्तर तट पर गए और भगवान विष्णु को संबोधित करके बोले – ‘विष्णों! शीघ्र उठिए और इन देवताओं का कल्याण कीजिए। देवताओं को आपकी सहायता नहीं मिलने से दैत्य इनको बार-बार परास्त करते हैं। ब्रह्मा जी के ऐसा कहने पर अंतर्यामी भगवान विष्णु ने कहा – ‘ देवगन – मैं तुम्हारी सहायता करूंगा और तुम्हारे तेज की वृद्धि करूंगा। मैं जो उपाय तुम्हें बतलाता हूं , उसे तुम लोग वैसा करो। नीति मार्ग का सहारा लेकर बलवान शत्रु दैत्यों को समुंद्र मंथन के लिए सहमत कर लो। समुद्र का मंथन करते हुए उससे अमृत निकालो। इस कार्य में मैं तुम्हारी सहायता करूंगा। समुद्र का मंथन करने पर जो अमृत निकलेगा, उसको पीने से तुम सब बलवान और अमर हो जाओगे।

भगवान विष्णु की आज्ञा को शिरोधार्य करके देवताओं ने समुद्र मंथन से प्राप्त होने वाले अनेकों दिव्य औषधियों ,रत्न एवं अमृत की प्राप्ति की बात बता कर दैत्यों को समुंद्र मंथन के लिए सहमत कर लिया।

स्कंद पुराण में वर्णित कथा प्रसंग साक्षी है कि इस अमृत कलश प्राप्ति के उद्देश्य से देवताओं व दैत्यों ने समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया तथा उस पर रस्सी के बतौर वासुकी नाग को लपेटा गया। रस्सी बने वासुकी नाग के मुंह की तरफ दैत्य और पूंछ की तरफ देवतागण अपार उत्साह के साथ समुद्र मंथन के लिए जुटे। ‌ यह मंथन इतना विराट था कि स्वयं भगवान विष्णु को कच्छप बनकर समुद्र की तलहटी में मथनी के नीचे रहना पड़ा था। तभी जाकर मंदराचल पर्वत जैसी विशाल मथनी चल पाई थी।

देवताओं व दैत्यों के समुद्र मंथन के तदनन्तर सागर से लक्ष्मी, कौस्तुभ, पारिजात, सुरा, धनवंतरी, चंद्रमा, गरल, पुष्पक, एरावत, पाञ्चजन्य शंख, रंभा, कामधेनु, उच्चै:श्रवा तेरह रत्न निकले। इन सब रत्नों का वितरण तो देवता और दैत्य अपने बीच में हुए समझौते के अनुसार बारी- बारी से उपयोगिता के आधार पर देवता और दैत्य आपस में बांटते रहे। चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने माथे पर धारण कर लिया और हलाहल गरल को सृष्टि के कल्याण हेतु अपने गले में धारण कर लिया। लक्ष्मी को भगवान विष्णु ने ले लिया आदि।

चौदहवें रत्न के रूप में समुद्र मंथन से निकला अमृत कलश। यही था अमृत कुंभ। अमृत प्राप्ति से चारों और प्रसन्नता का वातावरण छा गया। स्वयं धनवंतरी अर्थात चिकित्सा के देवता अमृत से परिपूर्ण कलश को अपने दोनों हाथों की हथेली पर लेकर समुद्र से बाहर निकले। इसी अमृत कुंभ की प्राप्ति की सबको प्रतीक्षा थी। देवताओं और दैत्यों का श्रम सफल हो जाने पर वे अपनी थकान भूल गए। अमृत कुंभ को प्राप्त करने की देवताओं व दैत्यों में होड़ लग गई। दोनों ही दल अमृत कलश को हड़पने की कूट चालें सोचने लगे।

इस आशंका के दृष्टिगत की अगर दैत्यों ने अमृतपान कर लिया तो वे अमर हो जाएंगे और सारी सृष्टि को नरक बना देंगे। इस विनाश से बचाने के लिए देव गुरु बृहस्पति के संकेत पर इंद्र का पुत्र जयंत उस अमृत कलश (कुंभ) को ले उड़ा। अन्य देवतागण भी अमृत कलश की रक्षा के लिए शीघ्र ही तैयार हो गए। जयंत को अमृत कलश लेकर भागता देख दैत्यों को देवताओं की चाल समझते देर नहीं लगी। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और बीच रास्ते में ही उन्होंने जयंत को पकड़ लिया। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देवताओं और दैत्यों में भयंकर संग्राम छिड़ गया। देवताओं और दैत्यों के बीच बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। परस्पर इस बार काट के समय जयंत बारह दिन अर्थात मनुष्यों के बारह वर्षों तक अमृत कुंभ को लिए भागते रहे। इस अवधि में उन्होंने बारह स्थानों पर वह अमृत कुंभ रखा। इनमें से आठ स्थान देव लोक में है और चार स्थान भूलोक में भारतवर्ष में ही है।

अमृत कलश की छीनाझपटी की आशंका को देखते हुए देवताओं ने सूर्य को अमृत कलश को फूटने से बचाने का दायित्व सौंप रखा था, शनि देव को यह देखना था कि कोई देवता अकेला ही सारे अमृत को न पी जाए। बृहस्पति का काम था दैत्यों से अमृत की रक्षा और चंद्रमा की अमृत को कलश से बाहर बहने या छलकने से बचाने की जिम्मेदारी थी। लेकिन चंद्रमा अपने दायित्व को सही तरह से नहीं निभा पाए।

देवताओं और दैत्यों की कलह शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया तथा यथाधिकार सबको अमृत बांटकर पिला दिया। इस प्रकार देवताओं और दैत्यों के युद्ध का अंत किया गया।

अमृत को प्राप्त करने के लिए देवताओं और दैत्यों के बीच बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्षों के समान होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। इन बारह कुंभ में चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और अन्य आठ कुंभ देवलोक में होते हैं जिन्हें देवतागन ही प्राप्त कर सकते हैं मनुष्यों की पहुंच वहां तक नहीं है।

जिस समय में चंद्रादिकों ने अमृत कलश की रक्षा की थी, उस समय जिस राशि पर सूर्य चंद्र आदि ग्रह थे वर्तमान में उन राशियों पर जब अमृत कलश की रक्षा करने वाले चंद्र सूर्यदिक ग्रह आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है उसी वर्ष, उसी राशि के योग में जहां-जहां अमृत कलश से छलक कर अमृत बिंदु गिरी थीं, वहां-वहां कुंभ महापर्व होता है।

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