__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के लगभग १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सफीदों की महिमा का वर्णन महाभारत व पुराणों में वर्णित है। प्राचीन काल में यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ था।

48 कोस के एक विशाल भूक्षेत्र को कुरुक्षेत्र माना गया है। इसी कुरुक्षेत्र की भूमि में पड़ने वाले सफीदों तीर्थ के विषय में महाभारत एवं पुराणों में वर्णन है कि अर्जुन के पुत्र एवं अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित की मृत्यु होने पर उनके पुत्र महाराज जनमेजय ने सर्पों का नाश करने हेतु यहां एक विशाल यज्ञ करवाया था।

भागवत पुराण एवं अन्य पुराणों के अनुसार महाराज परीक्षित वन में आखेट करते हुए प्यास लगने पर महर्षि शमीक के आश्रम में आए। उस समय महर्षि शमीक ध्यानस्थ बैठे हुए थे, उन्हें महाराजा परीक्षित के आने का पता नहीं चला। महाराजा परीक्षित ने इससे अपने आप को अपमानित समझा और क्रोध में पास में ही पड़ा हुआ एक मरा हुआ सर्प महर्षि शमीक के गले में डालकर अपने महल में लौट आए।

महर्षि शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को जब अपने पिता के प्रति राजा के इस व्यवहार का पता चला तो उन्होंने महाराजा परीक्षित को श्राप दे दिया कि 1 सप्ताह के बाद तुम्हें तक्षक नाग डस लेगा। महर्षि शमिक को जब अपने पुत्र के द्वारा राजा परीक्षित को दिए हुए श्राप का पता चला तब वे बहुत व्यथित हुए और उन्होंने अपने शिष्यों को श्राप की सूचना देने के लिए राजा परीक्षित के पास भेजा।
महाराजा परीक्षित भी जब हस्तिनापुर अपने महल में पहुंचे वहां उन्होंने ज्यों ही अपना मुकुट उतारा तो उन्हें अपनी भूल का ज्ञान हुआ। महाराजा परीक्षित ने स्वर्ण का बना मुकुट धारण कर रखा था और उस समय कलयुग का आगमन पृथ्वी पर हो चुका था। तब तक महाराजा परीक्षित के द्वारा ही बताए गए स्थानों पर ही कलियुग का निवास था और उनमें एक स्थान स्वर्ण भी था। स्वर्ण के बने मुकुट में कली का निवास होने के कारण ही महाराजा के द्वारा ऐसा कृत्य हो गया था। इसलिए कली के निवास वाला स्वर्ण मुकुट उतारते ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। तभी महर्षि शमीक का संदेश उनके शिष्यों ने महाराजा परीक्षित को सुनाया। महर्षि शमीक के संदेश से राजा बहुत प्रसन्न हुए कि अहंकार का यही परिणाम होता है। एक सप्ताह के पश्चात महाराजा परीक्षित की तक्षक नाग के डसने से मृत्यु हो गई।

सफीदों एवं उसके आसपास के स्थानों पर कई महत्वपूर्ण तीर्थ हैं जिनकी महिमा का वर्णन पुराणों में किया गया है। इन तीर्थों की महिमा से प्रभावित होकर बहुत से श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए आते हैं।

* नागतीर्थ –

महाराजा परीक्षित की मृत्यु का तक्षक नाग से बदला लेने के लिए महाराजा जनमेजय ने पूरी नाग जाति को समाप्त करने के लिए एक यज्ञ किया था। जिस स्थान पर महाराजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय के द्वारा सर्पों का नाश करने के लिए यज्ञकुंड का निर्माण किया गया था, उसी स्थान पर आज नागतीर्थ क्षेत्र बना हुआ है।

सर्पों का दमन सर्पवती व सपीदम का अपभ्रंश है आज के समय में सफीदों कहा जाता है। इसी सफीदों की प्रशंसा में शास्त्रों में कहा गया है कि संसार में भारतवर्ष रमणीय है भारतवर्ष में भी हरिवर्ष (हरियाणा) उत्तम है। हरिवर्ष में ही पवित्र पुण्य भूमि कुरुक्षेत्र है तथा कुरुक्षेत्र में सर्पवती(सफीदों) सर्वोत्तम है।
सफीदों की इस भूमि को शास्त्रों में विमुक्त भूमि भी कहा गया है।

प्राचीन स्थान होने के कारण समय-समय पर इस क्षेत्र का अनेकों बार जीर्णोद्धार कराया गया है। पुराने समय में जींद रियासत के राजाओं ने इस तीर्थ का अनेक बार जीर्णोद्धार करवाया था। यह स्थान हरियाणा प्रांत के जिंद क्षेत्र में आता है। सफीदों के आसपास कई महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान हैं।

* सींख –

इस स्थान को तिरखु तीर्थ भी कहा जाता है। इसी स्थान पर महर्षि शमीक का आश्रम था। शमीक का अपभ्रंश ही सींख है।

* सिंघाना –

यह महर्षि श्रृंगी का स्थान है। यह तीर्थ स्थल सफीदों से 5 कि.मी. दूर है। त्रेता युग में अयोध्या के महाराजा दशरथ ने अपने गुरु वशिष्ठ के कहने पर इन्हीं श्रृंगी ऋषि से

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