__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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रुड़की शहर के बीचों-बीच से होकर इस नगर की शोभा को बढ़ाती हुई गंग नहर बहती है।

रुड़की में ही रुड़की से हरिद्वार जाने वाले पुराने मार्ग पर नहर के दोनों किनारों पर सजग प्रहरी की तरह चार शेर बने हुए हैं।

गंग नहर के किनारे सोनाली पुल के लगभग एक एक-एक कि.मी. दूर मेहवड और रुड़की में नहर के दोनों ओर‌ एक-एक कुल चार सिंह मूर्तियां बनी हुई हैं।

स्थापत्य के अद्भुत उदाहरण इन शेरों का सावधान की मुद्रा में उठा हुआ सिर और गौरव पूर्ण विशाल आकार इन्हें देखने वाले हर किसी व्यक्ति को प्रभावित करता है।

पंजे सामने की ओर फैलाए सतर्क राजसी मुद्रा में बैठे शेर खूंखार नहीं लगते। भय और क्रूरता से मुक्त इनकी विश्वासपूर्ण आंखें इन्हें देखने वालों का मन मोह लेती हैं।

उक्त सिंह मूर्तियों का निर्माण सन 1850 के आसपास हुआ था। इन्हें सोनाली जलमार्ग के रक्षा प्रतीक के रूप में बनवाया गया था।

सोनाली जलमार्ग गंग नहर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगनहर को सोनाली नदी के ऊपर से ले जाया गया है।

175 फुट चौड़े नाद (ट्राफ) वाले इस अक्वाडेक्ट को 50-50 फुट वाली 15 मेहराबों के ऊपर टिकाया गया है। यहां सोनाली नदी नीचे अपने स्वभाविक मार्ग पर बह रही है और उसके ऊपर से इस अक्वाडेक्ट (जलमार्ग) के द्वारा विशाल गंगनहर को गुजारा गया है। सोनाली अक्वाडेक्ट उस समय की अभियांत्रिकी का अद्भुत उदाहरण है।

मेहवड़ में दोनों सिंह मूर्तियों को गंगनहर के प्रवाह के विपरीत दिशा में मुंह करके बनाया गया है तो रुड़की में बनी हुई दोनों सिंह मूर्तियां अपना मुंह गंगनहर के प्रवाह की ओर किए हुए हैं।

सिंह मूर्तियों की बैठकी को छूती हुई गंग नहर बहती है तीनों और पक्का फर्श और नहर में उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं।

गंगनहर की परिकल्पना करने और इसको बनाने वाले इंजीनियर कॉटले रुड़की शहर से बहुत प्रेम करते थे। इस स्थान पर उन्होंने गंगनहर के निर्माण में अपनी पूरी सौंदर्य अभिरुचि का और प्रदर्शन कर दिया है।

कॉटले ने मेहवड़ से लेकर रुड़की तक के लगभग 5 कि.मी. के मार्ग में नहर के मार्ग में दोनों और ऊंचे तटबंध बनवाए और नहर में नीचे उतरने के लिए इसके दोनों और सीढ़ियां बनवाई यह सीढ़ियां सोनाली अक्वाडेक्ट के पास इस नहर की तलहटी तक बनवाई गई है।

रुड़की शहर के पुराने बाजार के गंगनहर के पुल के पास से मेहवड़ तक गंगनहर शीशे की चादर सी बिछी हुई धीमी मंथर गति से बहती है।

यह शेर देखने में इतने आकर्षक और जीवंत लगते हैं कि इन शेरों से मुग्ध होकर सन 1867 में लंदन के ट्राफल्गर स्क्वायर स्थित नेलसन मेमोरियल कॉलम में भी ऐसे ही चार शेर अंग्रेजों ने बनवाए थे।

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