___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

रुड़की – (हरिद्वार जनपद)

यह इस क्षेत्र की बहुत ही रोचक जानकारी है कि अब से लगभग पौने दो सौ वर्ष पूर्व इसी क्षेत्र में भारत में सबसे पहले रुड़की से कलियर तक रेल लाइन बिछाई गई थी। यह रेल लाइन यहां यात्रियों के लिए नहीं बल्कि मिट्टी की ढुलाई के लिए बिछवाई गई थी।

बात दरअसल यह है कि उस समय इस रेल लाइन को बिछाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि हरिद्वार से कानपुर के बीच पांच सौ कि.मी.लंबी एक नहर उस समय की अंग्रेज सरकार के द्वारा बनावाई जा रही थी।

अंग्रेज सरकार को यह नहर बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी थी कि 1837-38 में इस इलाके में जबरदस्त सूखा पड़ा था, उससे इस इलाके में भयंकर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। तब उस समय की ईस्ट इंडिया कंपनी की अंग्रेज सरकार को यहां राहत कार्यों पर एक बहुत बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी थी। आगे ऐसा न हो, ऐसे में तत्कालीन सरकार ने यहां गंगा से एक नहर निकालने का निर्णय लिया और इसकी जिम्मेदारी कर्नल कॉटले को सौंपी गई।

कर्नल कॉटले जब रुड़की के पास नहर की खुदाई करवा रहे थे तो यहां बहने वाली सोनाली नदी एक चुनौती बन कर सामने आई। चुनौती यह थी कि नहर को नदी के बीच से कैसे आगे ले जाया जाए। उस समय के इंजीनियरों ने इस समस्या का एक नायाब हल तलाशा। उन्होंने तय किया कि सोनाली नदी के ऊपर एक्वाडक्ट पुल बनाकर यानी नदी के ऊपर जलसेतु बना कर नहर को गुजारा जाए।

सोनाली नदी के ऊपर जलसेतु बनाने के लिए नदी में खंभे बनाए जाने के लिए खुदाई की जानी थी और इसमें बड़ी मात्रा में निकलने वाले मिट्टी-मलबे को कलियर के पास डालवाया जाना था। लेकिन घोड़े-खच्चरों के द्वारा इस कार्य को करवाने पर भारी लागत आ रही थी और समय भी अधिक लगता।

काट लेने इस काम को करवाने के लिए रेल ट्रैक बनवाने का निर्णय लिया और उन्होंने रुड़की में ही लंदन से उपकरण और वहीं के विशेषज्ञों बुलवा कर इंजन और चार वैगन तैयार करवाए।

मिट्टी-मलबे की ढुलाई की आवश्यकता पूर्ति के लिए भारत में पहली बार रुड़की से पिरान कलियर होकर धनौरी तक रेल लाइन का निर्माण किया गया।

भारत में सबसे पहले 22 दिसंबर 1851 को रुड़की में भाप से चलने वाला इंजन दो वैगनों में मिट्टी की ढुलाई करने के लिए रेल की पटरी पर 6.4 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से रुड़की से कलियर तक के 5 कि.मी. लंबे रास्ते के बीच दौड़ा था।

उस समय उस भाप के इंजन का नाम यहां के उत्तर पश्चिमी प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जेम्स थॉमसन के नाम पर रखा गया था लेकिन बाद में इस को बदल कर इस इंजन का नाम स्वीडन की प्रसिद्ध गायिका जेनी लैंड के नाम पर रख दिया गया। यह इंजन दिसंबर 1952 तक यानी पूरे एक साल तक यहां पटरियों पर दौड़ता रहा।

इन सब बातों का वर्णन गंग नहर को बनाने वाले तत्कालीन इंजीनियर कर्नल कॉटले ने गंग नहर पर लिखी अपनी एक रिपोर्ट’रिपोर्ट ऑन द गंग नहर कैनाल वर्क्स’ में किया है। इस रिपोर्ट को आज भी रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की सेंट्रल लाइब्रेरी में देखा जा सकता है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *