________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र. भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** मेरठ में ससुराल-बिसरख में ननिहाल-

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से रामायण के खलनायक और महाज्ञानी शक्तिशाली रावण से गहरा नाता है। रावण का जन्म स्थान नोएडा ( गौतम बुद्ध नगर) के बिसरख को माना जाता है तो मेरठ रावण की ससुराल मानी जाती है।

*** मेरठ शहर –

रावण की पत्नी मंदोदरी मेरठ से थी। मेरठ शहर को रावण की ससुराल के रूप में भी जाना जाता है।

प्राचीन काल में मय दानव द्वारा बसाई गई इस नगरी को मयराष्ट्र के नाम से जाना जाता था। मयराष्ट्र से अपभ्रंश होकर मेरठ नाम हुआ। रावण की पत्नी मंदोदरी मय दानव की पुत्री थी। मंदोदरी से संबंधित कई स्थान मेरठ नगर में हैं।

— बिल्लेश्वर नाथ महादेव मंदिर –

इस मंदिर में मंदोदरी पूजा करने के लिए आती थी। माना जाता है उसकी भक्ति से खुश होकर महादेव शिव ने उसे दर्शन देकर वरदान मांगने के लिए कहा। उसका विवाह ब्राह्मणों में सबसे विद्वान और शक्तिशाली पुरुष के साथ हो ऐसा वरदान मंदोदरी ने भगवान शंकर से मांगा। जिसके बाद मंदोदरी का विवाह लंका के राजा रावण के साथ हुआ था। मंदोदरी का विवाह रावण के साथ होने से ही मेरठ रावण का ससुराल कहलाया जाता है।

— सती सरोवर (भैंसाली मैदान) –

मेरठ में जहां आजकल भैंसाली मैदान है वहां मय दानव के समय में सती सरोवर था। इस सरोवर में स्नान करने के बाद ही मंदोदरी सरोवर के पश्चिमी तट पर स्थित बिल्लेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए जाति थी।

*** बड़ागांव रावण (बागपत) –

बागपत जनपद की खेकड़ा तहसील के बड़ागांव के लोग श्री राम के साथ साथ रावण में भी गहरी आस्था रखते हैं।

बड़ा गांव के रहने वालों की रावण में भी गहरी हैं। इस गांव का नाम लंका के राजा रावण से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हिमालय पर तपस्या करके रावण ने माता मंशा देवी से लंका में विराजमान होने का आशीर्वाद मांगा था। मनसा देवी लंका जाना नहीं चाहती थी। इसलिए उन्होंने रावण से एक शर्त रखी कि मैं मूर्ति के रूप में तुम्हारे कंधे पर बैठकर लंका चलूंगी। अगर रास्ते में मूर्ति का जरा सा भी स्पर्श धरती से हो गया तो मैं वहीं विराजमान हो जाऊंगी।

रावण देवी को हिमालय पर्वत से अपने कंधे पर बैठा कर लंका ले जा रहा था तो यहां बड़गांव के पास रावण को लघुशंका की इच्छा हुई। तब उसने वह देवी प्रतिमा एक ग्वाले को दे दी। ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु आए थे। उन्होंने तुरंत प्रतिमा को धरती पर रख दिया।

महाशक्तिशाली रावण ने बहुतेरे प्रयास किए लेकिन देवी की प्रतिमा को टस से मस नहीं कर सका। बाद में हताश-निराश रावण देवी को वहीं प्रणाम करके लंका चला गया।

बताया जाता है कि उसी समय से मंशा देवी बड़गांव के इस मंदिर में विराजमान है। इसी मंशा देवी मंदिर में भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा भी विराजमान है।

इतिहासकार इस प्रतिमा को आठवीं शताब्दी की बताते हैं। देवी की प्रतिमा इसी स्थान पर स्थापित हो जाने के बाद
रावण ने यहां एक कुंड भी खोदा था और उसमें स्नान करके तप किया था। उस कुंड का नाम रावण कुंड है।

रावण से इसी संबंध के कारण इस गांव को पुराने जमाने से ‘रावण’ भी कहा जाता है। सरकारी अभिलेखों में भी इस गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव दर्ज है। इस गांव के ग्रामीणों की भगवान श्री राम में गहरी आस्था है। लेकिन यहां के ग्रामीण लंकापति रावण के प्रति भी गहरी श्रद्धा रखते हैं।

सदियों से इस गांव में रावण की पूजा की जाती रही है।यहां के निवासी कहते हैं कि रावण यहां आए तो गांव में मंसा देवी भी आई और यहां उनका मंदिर बन गया।

इस गांव में रामलीला भी नहीं होती और दशहरे के अवसर पर रावण का पुतला भी नहीं फूंका जाता है। इस गांव के निवासी रावण को गांव का संस्थापक मानकर उसकी पूजा करते हैं।

बागपत जनपद में बड़ागांव दिल्ली यमुनोत्री हाईवे पर पाठशाला चौराहे से 11 किलोमीटर दूर है।

यह गांव धार्मिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है यहां का मंदिर और सैकड़ों साल प्राचीन मूर्तियां इस गांव को चर्चा में बनाए रखते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार रावण के हिमालय से लंका जाने के रावण के मार्ग की खोज के लिए ‘प्रोजेक्ट रावण’ पर इतिहासकार कार्य कर रहे हैं।

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*** ग्रेटर नोएडा  –  (जनपद-गौतमबुद्धनगर)

 

*** बिसरख गांव (ग्रेटर नोएडा) –

ऐसी मान्यता है कि इस गांव में रावण के पिता विश्रवा मुनि का आश्रम था। विश्रवा मुनी भगवान शंकर के भक्त थे। उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। यह गांव विश्रवा मुनी की कर्म स्थली रहा है। मान्यता है कि यहीं पर रावण, कुंभकरण और कुबेर का जन्म हुआ था। रावण ने यहां के पौराणिक प्राचीन शिव मंदिर में पूजा अर्चना की थी

बिसरख गांव के लोग रावण को अपने गांव का बेटा मानते हैं। इसलिए जहां सत्य पर असत्य की विजय का पर्व दशहरा देशभर में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उस दिन इस गांव में दशहरा पर्व का कोई माहौल नहीं होता। इस गांव के लोग न ही रामलीला का मंचन करते हैं और न ही इस गांव में रावण के पुतले का दहन किया जाता है।

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*** मारीपत – रेलवे स्टेशन (ग्रेटर नोएडा) –

बिसरख गांव के पास ही मारीपत नामक स्थान का नाम रावण के मामा मारीच के नाम पर पड़ा है। मारीपत को भी ऐतिहासिक दर्जा दिया गया है। यहां के रेलवे स्टेशन का नाम भी मारीपत है।

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*** गाजियाबाद जनपद  –

*** दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर –

गाजियाबाद का प्रसिद्ध दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना रावण ने की थी। लंका का राजा बनने से पहले रावण यहां शिव की पूजा किया करता था।

 

 

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