________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी. के दायरे व उसके निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद से ही लगा हुआ रवाईं जौनपुर क्षेत्र है। इस इलाके में गंगा घाटी, यमुना घाटी और टोंस (तमसा ) नदी घाटी इन तीनों नदी घाटियों की सभ्यता और संस्कृतिक परंपराओं की त्रिवेणी है। यहां की अलग-अलग घाटियों के देवी-देवता भी अलग-अलग हैं और उनके लगने वाले मेले यहां की अपूर्व सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत हैं। यहां दुर्योधन, कर्ण और शल्य भी आराध्य देवता हैं। घर-घर में यहां नाग और देवी की पूजा की जाती है। केदार, नरसिंह, भैरव आदि असंख्य देवता भी यहां पूजे जाते हैं।

इस क्षेत्र के देवी-देवताओं और मंदिरों के अलावा हिमालय पर्वत के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन पुराणों में मिलता है। इस क्षेत्र में और भी बहुत से ऐसे मंदिर हैं जिनके बारे में बहुत सेलोग नहीं जानते। पुरातत्व प्रेमियों के लिए इस क्षेत्र के कईमंदिरों तथा उनकी मूर्तियों और उनमें बने चित्र पुरातत्व खोजकी विषय वस्तु है। यहां पर प्रकृति की अनमोल विरासत सुंदरबुग्याल हैं। पहाड़ी ढलानों पर मुलायम मखमली घास के मैदान होते हैं यह बुग्याल। हिममंडित हिमालय पर्वत की चोटियों और सघन वनों के बीच बुग्याल क्षेत्र आता है। देश- विदेश के पर्यटक यहां आते हैं और इन्हें देख करआनंदित होते हैं।

*** महासू देवता :-

रवाईं घाटी क्षेत्र में महासू देवता सर्वाधिक प्रचलित एवं पूज्य देवता हैं। महासू भगवान शिव के ही रुप हैं। महाशिव का ही अपभ्रंश महासू है। इस क्षेत्र की टौंस नदी घाटी और यमुना नदी घाटी में इनके हर कहीं मंदिर विद्यमान हैं। अनोल, देहरादून, देववन का पबासु,दोणी का महासू इनके भाई माने जाते हैं। इस क्षेत्र में इनके जागर के मेले लगते हैं। दोणी में महासू का जागर का मेला प्रसिद्ध है। यहां एक आदमी में देवता की शक्ति अद्भुत तरीके से उतरती है। इस क्षेत्र के ही बनाल में ड़ोखरी तथा ठकराल के मणापा में भी महासू आराध्य देवता हैं। यहां जब एक धुन गाई जाती है तब देवता की शक्ति किसी व्यक्ति में उतर कर नाचती है।डोखरी के मंदिर के विषय में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कुमेरू मसेटा ने कराया था।

*** समोसू देवता :-

रवाईं इलाके की स्थानीय बोली में दुर्योधन को समोसू कहा जाता है। इस इलाके के ५० – ६० गांवों के इष्ट देवता दुर्योधन हैं। जखोल गांव में दुर्योधन का बहुत बड़ा और भव्य मंदिर है। साल भर में तीन-चार बार दुर्योधन देवता का मेला लगता है। इस इलाके के लिवाड़ी, फेताड़ी, रिकचा, गंगाड़, ढाटमीर, ओसला, सांकरी कोटगांव, सौड़, सिधरी,पंवाणी गांवों तक इनकी सीमाएं हैं। इन देवता को यहां शणेश्वर , सोमेश्वर तथा समेश्वर आदि नामों से भी जाना जाता है।

*** कर्ण व शल्य का मंदिर :-

रवाईं क्षेत्र के सबसे अधिक पूज्य देवता दुर्योधन हैं। दुर्योधन के अभिन्न मित्र कर्ण का भी भव्य मंदिर देवरा सिंगतूर में है।महाभारत के युद्ध में कर्ण के रथ के सारथी शल्य बने थे, कर्ण के साथ शल्य भी यहां आराध्य देवताओं में हैं।

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