________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में व उसके निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद से ही लगा हुआ है रवाईं जौनपुर क्षेत्र। इस इलाके के ५०-६० गांवों के इष्ट देवता दुर्योधन हैं। यह दुर्योधन देवता का इलाका है। इन्हीं को यहां के लोग अपना सबसे बड़ा देवता मानते हैं।

इस रवाईं इलाके में विशाल हिमालय पर्वत के सामने के घने जंगलों के बीच बसा है जखोल गांव। यहीं जखोल गांव में कौरव राज दुर्योधन का भव्य मंदिर है। जखोल गांव में हर साल समोस का मेला लगता है। स्थानीय बोली में यहां दुर्योधन को समोस कहा जाता है।

जखोल गांव जाने के लिए देहरादून से विकासनगर होते हुए यमुना नदी के किनारे-किनारे होकर नौगांव नामक स्थान आता है। यहां से पुरोला जाने वाली सड़क पर मोरी, नैटवाड होते हुए सांकरी नामक स्थान पर पहुंचना पड़ता है। इससे आगे पैदल चलकर जखोल गांव पहुंचा जा सकता है।

देहरादून से ही जखोल गांव जाने के लिए दूसरा रास्ता है, देहरादून से विकासनगर, चकराता होते हुए टोंस नदी के किनारे-किनारे होते हुए सांकरी पहुंचते हैं।

सांकरी से पैदल तालुका होते हुए जखोल गांव का बेहद खड़ी चढ़ाई का रास्ता है। यह रास्ता बांज, मोरु, बुरांस आदि के सदाबहार वनो के बीच से होकर गुजरता है। रास्ते के चारों ओर लहलहा रहे केदारपाती के पौधों से आती सुगंध से सारा वातावरण महक रहा होता है। कहते हैं कि कस्तूरी मृग का मुख्य भोजन यह केदारपाती का पौधा ही होता है, इस पौधे के खाने से ही कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी का संचय होता है। ऐसे खूबसूरत रास्ते से होकर जखोल गांव पहुंचा जाता है।

जखोल गांव में समोस के वार्षिक मेले के दिन दुर्योधन के भव्य मंदिर के प्रांगण में सारे जखोल गांव के निवासी रंग-बिरंगे कपड़े पहने एकत्रित होते हैं। आस-पास के गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में इस मेले में आते हैं। इस मेले में शामिल होने के लिए गांव का हर परिवार खासतौर से कपड़े बनवाता है।

मेले के दिन मंदिर के प्रांगण में कहीं युवक और युवतियां एक लय ताल के साथ गीत गा रहे होते हैं तो कहीं एक ओर महिलाएं आपस में बातचीत करने में मशगूल होती हैं।

ऐसे ही हर्षोल्लास के वातावरण में ढोल-दमाऊ और रंणसिंघे जोर-जोर से बजाये जाने लगते हैं। मंदिर के अंदर से दुर्योधन की पालकी बाहर निकाल कर लाई जाती है। लाल चादर से सजी पालकी के बीच में दुर्योधन की अष्ट धातु की मूर्ति रखी हुई होती है। कहते हैं कि यह मूर्ति स्वर्गारोहिणी की तलहटी में स्थित सरोवर से प्रकट हुई थी।

यही समय होता है जब दुर्योधन देवता मंदिर के पुजारी जिन्हें यहां पासुवा कहा जाता है पर प्रकट होते हैं। जब दुर्योधन प्रकट होने को होते हैं तो उस समय पासुवा कांपने लगते हैं और जोर-जोर से चिखते हैं। इसका अर्थ होता है कि अब दुर्योधन पासुवा पर प्रकट होने वाले हैं। वहां उपस्थित लोग हाथ जोड़कर उसके सामने चारों ओर घेरा बनाकर बैठ जाते हैं। पासुवा उस समय दुर्योधन का रूप होते हैं। वह पास में ही रखी चावलों से भरी थाली में से चावलों को उठा कर वहां बैठे लोगों पर फेंकने लगते हैं और उनके सामने बैठे लोग उन चावलों के दानों को लपकने के लिए उमड़ पड़ते हैं। यह चावल दुर्योधन के प्रसाद के रूप में माने जाते हैं।इस समय ही पासुवा कहते हैं कि ‘सबकी कुशलता मेरी जिम्मेदारी’और चारों ओर से सब समोसु देवता की जय-जयकार करते हैं और फिर सब शांत हो जाते हैं।

इसके बाद समय होता है दुर्योधन की अदालत शुरू होने का। एक-एक करके मामले दुर्योधन की अदालत में आते हैं।

किसी ने अन्य व्यक्ति की जमीन कब्जा रखी हो और कई -कई साल कचहरी में मुकदमा चलते हुए हो गए हो तब ऐसा मामला दुर्योधन की अदालत में आता है। दुर्योधन चावल के दाने फेंक कर तुरंत उसका समाधान कर फैसला सुना देते हैं।

किसी भेड़पालक की भेड़ें कहीं जंगल में भटक गई हों तब भेड़पालक के पूछने पर दुर्योधन चावल के दाने उछाल कर बता देते हैं कि उसके पशु किस दिशा में सुरक्षित मिल जाएंगे।

किसी गंभीर बीमारी से जकड़े हुए व्यक्ति को लाए जाने पर दुर्योधन उस पर चावल फेंक कर बता देते हैं कि वह व्यक्ति किस तरह का उपाय करने पर ठीक हो जाएगा।

इस प्रकार से ही हर गांव में लगने वाले मेले के दौरान दुर्योधन की अदालत चलती है।

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