______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी. के दायरे में व उसके निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के जौनसार बावर क्षेत्र से ही लगा हुआ इलाका है रवाईं जौनपुर क्षेत्र का। इस रवाईं क्षेत्र के विकास खंडों पुरोला, मोरी और नौगांव के पट्टी कमल, सिरांई, रामा सिराई,पंचगाई, सिंगतूर, बडासू, आराकोट,फतहपर्वत, अडोर,ठकराल,मुगरसंती, बनाल,बडकोट तथा जौनपुर की दो पट्टियों अलगाव व सिलवाड सहित जौनसार बावर क्षेत्र के कुछ‌ इलाकों में रहने वाले निवासी यहां की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार गांव में किसी की मृत्यु होने पर रोने-धोने के बजाय, उसे शानदार अंतिम विदाई देने की तैयारी करते हैं।

मानव जीवन में बच्चे के जन्म के बाद से ही उसके जीवन में क‌ई ऐसे अवसर आते हैं, जब‌ उत्सव और आनंद का वातावरण बनता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो वह अपने पीछे दुःख और शोक मनाते सगे-संबंधियों और मित्रों को छोड़ जाता है। सामान्यत: दुनियाभर में मनुष्य जीवन के इस अंतिम सत्य को दुःखदायी माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड के इस अंचल में बसे निवासियों के लिए मृत्यु केवल शोक मनाने मनाने का कारण नहीं होती, बल्की यहां के लोग मृत्यु को मनुष्य जीवन के संकटों से पीछा छूट जाने का जरिया मारते हैं।

रवाईं जौनपुर क्षेत्र के तथा जौनसार बावर क्षेत्र के कुछ हिस्सों में गांव में किसी की मृत्यु होने पर परिजन रोने-धोने के स्थान पर मृतक की शानदार अंतिम यात्रा निकालते हैं। विदाई देने के लिए शवयात्रा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। शव के लिए देवदार की लकड़ी से खास डोली। तैयार करके उसे रंग-बिरंगी फूल मालाओं से सजाया जाता है। मृतक के सगे-संबंधी शव के लिए कफ़न, धूपबत्ती आदि सामग्री लाते हैं। इसके बाद शव को डोली में रखा जाता है। इस दौरान ही क्षेत्र के क‌ई गांवों से दर्जनों की संख्या में बाजगी या जुमरिया ढोल, दमाऊ व रणसिंघा जैसे वाद्ययंत्रों को लेकर मृतक के गांव के बाहर एक तय स्थान पर इकट्ठा हो जाते हैं। गांव से शवयात्रा जब इस स्थान पर पहुंचती है, तो परिजन डोली के ऊपर रुपए उछालते हैं। जैसे ही मुख्य बागची उन रुपयों को उठाता है, सभी ढोल-नगाड़े,दमाऊ और रणसिंघे एक साथ बजाये जाने लगते हैं। इसके बाद शवयात्रा शुरू होती है। शवयात्रा के दौरान परिजन रास्ते में मृतक के हिस्से की खाद्य सामग्री जैसे अनाज,दालें,अखरोट, मसाले,फल आदि रास्ते में बिखेरते चलते हैं। ऐसा करने के पिछे यह मान्यता है कि यह सब सामग्री पशु-पक्षियों के द्वारा खाने से मृतक का पुनर्जन्म होने तक उसे भोजन मिलता रहेगा।

शवयात्रा के दौरान एक पूर्वनिर्धारित स्थान पर यात्रा को रोका जाता है। यहां डोली को जमीन पर रख दिया जाता है और मुख्य बागची डोली के सामने एक खास कपड़े को बिछा देता है। इसके बाद आए हुए सभी बागची जोड़ियों में एक-एक करके अपने वाद्ययंत्रों ढोल,दमाऊ, रंणसिंघे आदि को बजाने के कौशल का प्रदर्शन करते हैं। मृतक के परिजन व शवयात्रा में आए हुए अन्य लोग उस खास कपड़े पर इनाम के रुप में रुपए रखते जाते हैं। बाद में जो भी बागची जीतता है,उसे यह राशि मिलती है। इस परंपरा को पैंसारे के नाम से जाना जाता है।

मृतक के अंतिम संस्कार का तरीका भी बेहद खास है। डोली को श्मशान घाट लाने के बाद शव को मुखाग्नि दी जाती है। यह रस्म निभाने वाला व्यक्ति सामान्यतः मृतक का पुत्र होता है। उसे सबसे अलग एक खास स्थान पर बैठाकर शवयात्रा में शामिल लोग एक-एक करके उसकी गोद में रुपए डालते हैं। इस रस्म को मुंह दिखाई कहा जाता है।

इस दौरान गांव में घर पर मौजूद महिलाएं गौमूत्र से घर की सफाई करती हैं।शव का अंतिम संस्कार करके वापस लौटकर आने वाले सभी लोगों पर गौमुत्र और गंगाजल छिड़का जाता है।

रवाईं क्षेत्र के बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि परंपरा के अनुसार उस दिन बिरादरी के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता है,बल्कि सभी घरों से थोड़ा-थोड़ा आटा, दाल-चावल मृतक के घर पहुंचाया जाता है। इलाके के लोगों का कहना है कि मृत्यु जीवन का अभिन्न अंग है। जिस प्रकार बच्चे के जन्म के समय खुशियां मनाई जाती हैं, उसी तरह मृत्यु के समय उसे खुशी-खुशी विदा करना चाहिए। मुंह दिखाई रस्म के बारे में भी यहां के लोगों का कहना है कि परिवार के मुखिया की अकस्मात मृत्यु हो जाने पर उसके परिजनों के लिए धन की व्यवस्था करने में परेशानी हो सकती है। इसलिए सभी के सहयोग से थोड़ी-थोड़ी धनराशि देकर मृतक के परिजनों की मदद की जाती है।

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