_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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राजवंश समाज के प्रवर्तक राजा रतनचंद

राजवंशियों में प्रतापी वीर पुरुष राजा रतनचंद राजवंश समाज के प्रवर्तक हैं। इन्होंने मुगल दरबार में उच्च पद प्राप्त किया और उस काल में अत्यंत प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कट्टरपंथी एवं रूढ़ीवादी लोगों के विरुद्ध आवाज उठाई। उनके साथ परिवारों और व्यक्तियों के समूह जुड़ते चले गए।

राजवंश जाति का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। राजवंश अग्रवालों का संबंध वैश्य अग्रवाल जाति से है। अग्रवाल वैश्यों में से ही एक और शाखा फूट निकली थी। इस शाखा के फूटने की कहानी बहुत रोमांचक है।

गंगा तट के पास मुजफ्फरनगर जनपद में है मीरापुर कस्बा। इसी मीरापुर क्षेत्र के गांव मुकल्लमपुरा में सुप्रसिद्ध अग्रवाल जाति में सन 1665 को बसंत पंचमी के दिन लाल रतन चंद का जन्म हुआ था। इनके पिता जयलाल सिंह गोयल मीरापुर में आढ़त के बड़े व्यापारी थे।

रतन चंद बाल्यकाल से ही कुशाग्र बुद्धि और हिसाब- किताब में माहिर थे। रतन चंद पिता के साथ काम करते थे। इनके परिश्रम से इनके व्यापार में दिन-रात उन्नति होने लगी। वह लेखा कार्यों में अपने क्षेत्र के एकमात्र प्रसिद्ध व्यक्ति बन गए थे।

यह 18वीं सदी के आरंभ अर्थात सन 1707 के आस-पास की बातें है। लाला रतनचंद की ख्याति सुनकर सैय्यद बंधुओं ने उन्हें अपना खजांची नियुक्त कर लिया।

इतिहास में सैय्यद बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध इन सैय्यदों का परिवार कई शताब्दियों पहले से यहां गंगा-यमुना के दोआब में बसा हुआ था। मुजफ्फरनगर जनपद में बारह गांव इनके थे। इसलिए इन्हें ‘बरहा के सैय्यद’कहा जाता था। यही के सैय्यद अब्दुल्लाह खां (जो औरंगजेब के शासनकाल में बीजापुर के सूबेदार थे) ने युद्ध मे प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसलिए उनके दोनों पुत्रों को हसन अली और हुसैन अली की उपाधि प्रदान की गई थी। आगे चलकर यह दोनों भाई ‘सैय्यद बंधु’ के नाम से इतिहास में विख्यात हुए।

सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल खानदान की शक्ति निरंतर क्षीण हो रही थी। औरंगजेब के बाद उसके बेटे बहादुर शाह का शासनकाल मार्च 1712 तक ही चल पाया। दिल्ली के लाल किले का राजदरबार और शाही हरम षडयंत्रों के अड्डे बन गए। बहादुर शाह के चार बेटे थे। अपने तीन भाइयों का कत्ल करके जहांदार शाह लालकिले के तख्त पर बैठ मुगल बादशाह बनने मेरे सफल हुआ लेकिन वह 11 महीने ही राज्य कर सका। उसके बड़े भाई के बेटे फर्रूखसियर ने विद्रोह कर दिया और अंत में उसने जहांदार शाह को मारकर लालकिले का तख्त हथिया लिया।

फर्रूखसियर सैय्यद बंधुओं के प्रबल समर्थन और भरोसे से ही दिल्ली के लालकिले के तख्त पर बैठकर मुगल बादशाह बन पाया था। इसलिए यह स्वाभाविक था कि दिल्ली के लाल किले के दरबार में उनका दबदबा बढ़ गया।

एक समय तो ऐसा भी आया था कि सैय्यद बंधु जिसे चाहते उसे दिल्ली के लालकिले के तख्त पर बैठा देते और जिसे चाहते उसे तख्त से उतार देते थे। इसलिए वे इतिहास में ‘किंगमेकर’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।

बड़े सैय्यद अब्दुल्लाह खान और छोटे हुसैन अली खान मीरापुर कस्बे से कुछ कि.मी. दूर ही जानसठ तहसील के रहने वाले थे। इस दौरान उनके अत्यंत विश्वसनीय साथी थे मीरापुर के लाला रतनचंद। धीरे-धीरे वह उनसे बहुत घुल-मिल गए कि अग्रवाल जाति के प्रमुख लोग उन्हें शक की निगाह से देखने लगे।

उस जमाने में अग्रवाल जाति के लोग खानपान के मामले में बड़े कट्टर थे। पूरी तरह शाकाहारी होने के कारण मुसलमान के हाथ का छुआ भी वह नहीं खाते थे। सैय्यद बंधुओं से घनी निकटता के कारण लाला रतनचंद खानपान के संबंध में उतने कट्टर नहीं रह गए थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें एक दिन अग्रवाल समाज की मूल शाखा से अलग होना पड़ा।

इस संबंध में कोई सर्वसम्मत एकराय नहीं है। कई और बातें भी इस संबंध में बताई जाती हैं –

* इस संबंध में एक बात यह बताई जाती है कि राजा रतन चंद ने सैय्यद बंधुओं के साथ एक ही दस्तरखान पर बैठकर खाना खा लिया था। इसके बाद उन्हें दंड के रूप में अग्रवाल जाति के प्रमुख व्यक्तियों ने उन्हें जाति से बाहर कर दिया। उस समय जिन भी लोगों ने जाति से बहिष्कृत होने का खतरा उठाकर भी उनका साथ दिया वही लोग पहले ‘राजा की बिरादरी’ और फिर ‘राजाशाही’और बाद में ‘राजवंशी’ के रूप में जाने गए।

इस संबंध में एक और कथा भी प्रचलित है कहते हैं उसी अवधि में राजा रतनचंद बड़े बेटे का विवाह निश्चित हुआ और जैसा कि ऐसे अवसरों पर उस समय की परंपरा थी उसके अनुसार राजा रतनचंद ने भी अपने बेटे के विवाह के निमंत्रण पत्र के रूप में गिंदौड़े (गुड़ या खांड के बने लड्डू) बंटवाए और यह घोषणा की कि जो व्यक्ति इन लड्डुओं को स्वीकार करेंगे वह मेरे अनुयाई और समर्थक माने जाएंगे। अधिकांश अग्रवालों ने इन लड्डुओं को स्वीकार नहीं किया। जिन्होंने स्वीकार किया था। वे ‘राजा की बिरादरी’ या ‘राजशाही’ कहलाने लगे बाद में उन्हीं लोगों ने अपने को राजवंशी अग्रवाल कहना शुरू कर दिया और आज के समय तक इसी नाम से जाने जाते हैं।

राजवंश अग्रवाल समाज के लोग बहुत पहले केवल मुजफ्फरनगर जनपद या इससे निकट के मेरठ, बिजनौर तक ही सीमित थे लेकिन बाद में आसपास के और जिलों तथा राजस्थान में भी फैल गए।

मुगल इतिहास के अंतिम बादशाहों के दौर में सैयद बंधुओं और राजा रतन चंद का बहुत प्रभावशाली रोल था। मुगल बादशाह फर्रूखसियर के दरबार में सैय्यद बंधुओं का बड़ा महत्व था। राजा रतनचंद शासन प्रणाली में भी बहुत कुशल थे उनकी सलाह से दरबार का कार्य 1712-1720 तक चलता रहा

इस दौर में किंगमेकर बने सैयद बंधुओं की सफलता के पीछे राजा रतन चंद का ही दिमाग था जिसमें उन्होंने राजनीति की कैसी-कैसी विलक्षण चालें चली। इससे राजा रतन चंद की योग्यता और शक्ति का परिचय होता है। वह नहीं होते तो सैयद बंधु भी आपस में ही लड़ कर मर जाते। दोनों भाइयों के बीच बिगड़ते संबंधों को उन्होंने समय-समय पर सुधारा। जजिया कर को हटवाने और राजपूतों के प्रति समझौते की नीति अपनाने के लिए राजा रतन चंद ही उत्तरदायी थे। उनकी उदार नीति के कारण राजपूत एवं अन्य हिंदू इनके समर्थक थे।

लेकिन सैयद बंधुओं का जो स्वप्न था वह पूरा नहीं हुआ और षड्यंत्र करने वाले खुद ही राज दरबार के षडयंत्रों में उलझ गए।

फर्रूखसियर की हत्या कर दी गई।17 अक्टूबर 1720 को सैय्यद बंधु हुसैन अली की कट्टरपंथी मुगलों ने धोखे से छुरा घोंप कर हत्या कर दी। अंत में मोहम्मद शाह ने दिल्ली के तख्त पर कब्जा कर लिया।

अंतिम युद्ध में सैय्यद अब्दुल्ला और रतनचंद की फौजें भी हार गई और उनके साथी सब गिरफ्तार कर लिए गए। राजा रतन चंद को गिरफ्तार करने के बाद अमानुषिक व्यवहार किया गया। अत्याचार यों ने उनसे सैय्यद बंधुओं के खजाने और संपत्ति को बस लाने के बारे में जोर दिया।

13 नवंबर 1720 को मुगल बादशाह ने राजा रतन चंद का सिर काट देने का आदेश दिया। राजा रतनचंद का सिर काट कर बादशाह के हाथी के सामने फेंक दिया गया और हाथी के पैर के नीचे कुचल दिया गया। इस प्रकार एक महान प्रशासक का अंत हुआ था।

महाराजा अग्रसेन के वंशज और राजवंश समाज के गौरव मुगलकाल के कुशल राजनीतिज्ञ राजा रतनचंद की जन्मभूमि मीरापुर में पूरे देश का राजवंश समाज इकट्ठा होकर उनका जन्म दिवस बड़ी धूमधाम से मनाता है। राजा रतनचंद के कारण मीरापुर का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

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