_____________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के १०० कि. मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सर्दियों में बड़ी संख्या में तरह तरह के प्रवासी पक्षी डेरा डाल देते है जहाँ-

सर्दी का मौसम बस शुरू ही होने वाला होता है। दीपावली पर्व के आसपास नवंबर महीने की शुरुआत से रूस के साइबेरिया, मध्य एशिया, हिमालय के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों से जहां सर्दियों में कड़ी ठंड पड़ती । वहां चारों ओर बर्फ की मोटी चादर फैल जाती है। नदी तालाब भी बर्फ के रूप में जम जाते हैं।

इन स्थानों पर रहने वाले पक्षियों को भोजन मिलना भी बंद हो जाता है। उस समय यह पक्षी कई हजार किमी की दुर्गम यात्रा तय करके हमारे देश भारत में आते हैं।

दीपावली से लेकर होली के आसपास तक यह प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम में हमारे देश भारत में रहते हैं। यह प्रवासी पक्षी सारे भारत में जहां-जहां इन्हें रहने के लिए अनुकूल माहौल और पर्याप्त भोजन मिलता है आकर रहते हैं।

जाड़ा शुरू होते ही कई देशों से इन प्रवासी पक्षियों का यहां गंगा-यमुना के मैदानों में भी आना शुरू हो जाता है।

यह तरह-तरह के सुंदर प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में गंगा के तटवर्ती इलाकों में हरिद्वार से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, जेपी नगर जनपदों में गंगा के तटों पर हर साल सर्दी के मौसम में आते हैं।

गंगा के किनारे और गंगा के खादर वाले इलाके में इन हजारों लाखों पक्षियों को यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जलीय वनस्पतियां और दर्जनों प्रजातियों की छोटी-छोटी मछलियां और कवच धारी जीव इन प्रवासी पक्षियों को यहां रहने को लालायित करते हैं।

गंगा ऐसा क्षेत्र है, जलीय जीव ही नहीं, पक्षी भी खूब दिखाई पढ़ते हैं। गंगा का तराई क्षेत्र प्रवासी पक्षियों एवं स्थानीय पक्षियों की पसंदीदा जगह है।

इन दिनों गंगा में उभरे हुए रेतीले टीले और टापुओं, झीलों, और दलदल युक्त इलाकों में इन प्रवासी पक्षियों को स्थानीय जातियों के जल पक्षियों के साथ विचरण करते हुए देखा जा सकता है।

दुर्लभ हो चुके पक्षी भी गंगा के में दिखाई दे जाते हैं।

*** हरिद्वार प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। हरिद्वार अब देश-विदेश से आने वाले सुंदर पक्षियों के शीतकालीन प्रवास स्थल के रूप में भी अपनी पहचान बना चुका है।

हरिद्वार जनपद में अनेक ऐसे जलीय स्थान है जहां प्रवासी पक्षी साइबेरिया, रूस, चीन, पोलैंड, उज़्बेकिस्तान, तिब्बत आदि स्थानों से शीतकाल में निवास करने आते हैं।

जाड़े के दिनों में गंगा में पानी का प्रवाह कम हो जाने से गंगा की धारा के बीच में बने टापू इनका निवास स्थान बनते हैं।

* नील धारा से लेकर देवप्रयाग तक गंगा के किनारे यह पक्षी उन्मुक्त विचरण करते मिल जाते हैं।

* हरिद्वार के राजाजी नेशनल पार्क के मध्य से होकर बहने वाली गंगा के छिछले जल क्षेत्र, लाल जी वाला, भीमगोडा बैराज के किनारे चीला से नीलधारा तक प्रतिवर्ष इन प्रवासी पक्षियों का मेला लगा रहता है। गंगा के तट इन पक्षियों के कलरव से गूंज उठते हैं।

* यह प्रवासी पक्षी हरिद्वार में गंगा की नीलधारा के द्वीप, चंडी द्वीप, बैरागी द्वीप, भीमगोडा से लेकर सप्त सरोवर तक, गऊघाट से लेकर डाम कोठी के बीच के क्षेत्र में समय-समय पर गंगा में बने टापूओं पर इन पक्षियों के अनुकूल व इनके पसंदीदा स्थानों पर देखा जा सकता है।

* नील पर्वत की तलहटी में स्थित इस पक्षी विहार को हरिद्वार के पक्षीविद पूरनलाल शर्मा ने सन 1990-91
में खोज निकाला था।

इससे पहले यहां पर इन प्रवासी पक्षियों को लोगों ने देखा तो था लेकिन वह इनके बारे में जानते नहीं थे। इसके बाद से प्रतिवर्ष अनेकों पक्षी प्रेमी तथा बर्ड वाचर्स यहां आने लगे।

ज्योलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के दल ने भी यहां आकर अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां इन प्रवासी पक्षियों के बारे में एकत्रित की है।

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यह प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में गंगा के किनारे पर ही नहीं इस क्षेत्र के यमुना नदी व अन्य नदियों के तटों पर भी पहुंचते हैं।

*** इस क्षेत्र में झीलों, पोखरों के अलावा सहारनपुर में बादशाही बाग तथा हिमाचल-उत्तराखंड और सहारनपुर की सीमा पर स्थित आसन बैराज पर भी प्रवासी पक्षी बहुत बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

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*** बिजनौर में कालागढ़ बांध, हरवेली बांध, पीली बांध और राम गंगा के तटों पर भी यह प्रवासी पक्षी यहां सर्दी के मौसम में प्रवास करते हैं।

*** इसी क्षेत्र में दिल्ली नोएडा के पास ओखला इलाके में भी प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं।

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*** इन दिनों भारी संख्या में पक्षी यहां उन सर्द इलाकों की ओर निकल पड़ते हैं जहां अब सर्दियां शुरू होने वाली होती हैं। यह पक्षी गंगा के रास्ते होते हुए पश्चिम में गंगा बेल्ट तक पहुंचते हैं।

*** इस क्षेत्र को एशियन फ्लाई वे कहा जाता है। यह एशियन फ्लाई वे दो हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। विदेशी प्रवासी पक्षियों के जमघट के कारण गंगा किनारे को एशियन फ्लाई वे कहा जाता है।

** गंगा का तराई क्षेत्र पक्षियों की पसंदीदा जगह है।नवंबर का आधा माह बीतते प्रवासी पक्षियों से गंगा के किनारे मनमोहक होने लगते हैं।

*** मुजफ्फरनगर व बिजनौर की सीमा पर स्थित गंगा बैराज से लेकर उससे आगे ज्योतिबाफुले नगर में स्थित खादर क्षेत्र के सुजमना गांव व उससे आगे बुलंदशहर के गंगा क्षेत्रों तक तथा बैराज क्षेत्र से लेकर गंगा के ऊपर की तरफ हरिद्वार के खादर क्षेत्र तथा हरिद्वार से ऊपर ऋषिकेश तक के इलाके में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं।

*** हस्तिनापुर वन्य जीव अभयारण्य के क्षेत्र में मानसून के दौरान गंगा में बाढ़ के उपरांत बनी गंगा की धाराओं के कटान से अनेकानेक कृत्रिम टापू बन जाते हैं। इसीसे इस दौरान गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में कृत्रिम छोटी-छोटी अनेकों झीलें बन जाती है। इन्हीं टापूओं, झीलों और गंगा के तटवर्ती दलदली इलाकों में ये प्रवासी पक्षी अक्सर अठखेलियां करते नजर आ जाते हैं।

जल क्रीड़ा में मग्न, एक साथ पानी पर तैरते और पानी पर दौड़ लगाते निहायत ही खूबसूरत देसी-विदेशी पक्षी। देखने में नजारा ऐसा लगता है जैसे पानी पर इन पक्षियों की लहर सी आ गई हो।

*** शुकतीर्थ (शुकताल) इस से कुछ किलोमीटर आगे ही वह स्थान है जहां गंगा और सोनाली नदी का संगम होता है। यह स्थान हस्तिनापुर सेंचुरी के इलाके में आता है। पौराणिक तीर्थ और प्राकृतिक सौंदर्य का भी मिलन है यह तीर्थस्थल। इस स्थान पर अनूठा सौंदर्य विद्यमान है। गंगा व सोनाली नदी के संगम पर दूर तक फैली जल राशि में जब जल की कमी होती है तब गंगा में अनेक टापू उभर आते हैं। इन टापूओ पर दूर देश से आए प्रवासी पक्षी अपना डेरा जमा लेते हैं।

इस क्षेत्र में भरक (शंकु पंककीर) पक्षी सबसे पहले आता है और शायद सबसे बाद में यहां से जाता है। रंग रूप से देखा जाए तो नर व मादा भरक में भेद करना असम्भव है लेकित मादा कद मे नर से कुछ बड़ी होती है।

इन्हीं टापूओ में किसी टापू पर तिब्बत से आए बहिसंग डक पानी में अठखेलियां करती नजर आ जाती हैं तो किसी टापू पर मध्य एशिया की डकटेल पोर्चाई और लविंग टील देखी जा सकती हैं। कहीं किसी टापू पर चकवा और चकोर दिखाई दे जाएंगे तो कहीं सफेद और काले रंग की आईबिस और बगुलों की आकर्षक स्टार्ट पेंटिंड की गूंज सुनाई देगी। तो किसी स्थान पर उत्तरी एशिया व यूरोप से आए पिनटेल का कलरव सुनाई देगा तो कहीं ब्राह्मी डक और सोलबर्स नजर आ जाएंगी। इन सब को देखना सबको ही बहुत अच्छा लगता है।

सुबह के समय दूर तक फैली रेत पर क्षितिज से लालिमा के बीच सूर्य देव निकलते हैं तो यह प्रवासी परिंदे अपने अपने ठिकानों से निकल कर अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में लग जाते हैं। यहां के सन्नाटे को तोड़कर उनका कलरव को सुनने के साथ साथ उनकी तरह तरह की दिनचर्या की निहारा जा सकता है। शाम को दूर क्षितिज पर सूरज के छिपते ही ये पक्षी अपने अपने रहने के ठिकानो पर लौटने लगते है।

शुक तीर्थ से लेकर गंगा बैराज तक गंगा के बीच उभरे हुए इन रेत के टापूओं पर इन पक्षियों का जीवन किसी परीकथा सा फैला हुआ दिखाई देगा।

*** गंगा बैराज व हैदरपुर झील

मुजफ्फरनगर -बिजनौर जनपदों के बीच में स्थित
गंगा बैराज क्षेत्र इन प्रवासी पक्षियों के कलरव से गुंजायमान होता है। गंगा बैराज का क्षेत्र इन जलीय देसी विदेशी पक्षियों के लिए अनुकूल और और बहुत हद तक सुरक्षित इलाका है। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में तिब्बत, साइबेरिया, मंगोलिया आदि कई देशों से व अपने देश के भी ऊंचे पर्वतीय इलाकों तथा लद्दाख आदि क्षेत्र से देसी विदेशी जल पक्षी यहां आते हैं।

गंगा पर बैराज बनने से बैराज के दोनों ओर बड़ी झील बन गई है। इसी स्थान पर मुजफ्फरनगर साइड की झील 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है।

रामराज बैराज पुल स्थित इस हैदरपुर झील में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की अनेकों प्रजातियां पाई जाती हैं।

वन विभाग द्वारा विकसित की गई हैदरपुर झील देखने में सुंदर व भव्य लगती है। इस झील की खासियत यह है कि यहां सभी पक्षी मिल जुल कर रहते हैं। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के पक्षी साथ साथ रहते हैं। पानी, हरी घास और दो दर्जन से अधिक तालाबों के स्रोत, हरा भरा वातावरण इस हैदरपुर झील को मनमोहक बना देते हैं।

पुल से जाने वाले रास्ते पर सिंचाई विभाग ने वन साइड पक्कीकरण का कार्य कराया है। इसके साथ ही हैदरपुर झील की दीवार को पत्थरों और सीमेंट से जोड़ा जाएगा। इससे हैदरपुर झील के सौंदर्य में चार चांद लग गए हैं। बैराज स्थित गंगा के बीच में बने टापूओं पर पक्षियों की चहचहाहट यहां पर आने वाले प्रकृति प्रेमियों को सुकून प्रदान करती है।

सिंचाई विभाग द्वारा इस झील के बंधे पर चार छोटे प्लेटफॉर्म बनाकर उन पर झोपड़ी डाली जाएगी। जहां से दर्शक इन शेड में खड़े होकर पक्षियों को देख सकेंगे

इस बंधे से मुजफ्फरनगर जाने वाले रास्ते पर भी इसी तरह के चार हट प्लेटफार्म बनाए जा रहे हैं। झील की साइड के बंधे के आखरी छोर पर भी एक 24 फीट ऊंचा एक वॉच टावर बनाया जा रहा है। इस टावर के ऊपर से भी पक्षी प्रेमी दूरबीन के द्वारा पक्षियों को देख सकेंगे। इस बंधे पर दर्शक पैदल ही जा सकेंगे। उनके वाहनों के बंधे पर जाने की पाबंदी होगी।

इस समय मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण के द्वारा झील क्षेत्र का विकास कराया जा रहा है। झील के किनारे बंधे पर और सड़क के किनारे पर भी पौधों का रोपण कराया जा रहा है, झील के किनारे भी पेड़ लगाए जाएंगे।

** समाना झील – रामराज –

रामराज के हस्तिनापुर वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में झीलों की भरमार है। गंगा का किनारा होने से इस क्षेत्र में ठंडक अधिक होने के कारण यहां विदेशों से हिमालय की चोटी छू कर कई हजार किलोमीटर की लंबी दुर्गम यात्रा करके विदेशों से हजारों प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं।

कई बार इस क्षेत्र में नई नई प्रजाति के प्रवासी पक्षी भी देखे जा सकते हैं। बार हैडेड ग्रीज, ग्रेलेगीज आदि पक्षी चीन व रूस आदि देशों में पाए जाते हैं। परंतु वहां अत्यधिक ठंड पड़ने के कारण यह पक्षी भारत आते हैं।

रामराज की झीलों के किनारे किंगफिशर, स्टार्क, बत्तख, जल मुर्गी, जल कौवा, हिमालयन स्पैरो, सैंड पाइपर, फाख्ता, फ्लॉर्कन, नीलकंठ, पिजन, स्पूनबिल, सारस क्रेन, बादामी बगुला, अंजन, डूबी डूबी, टिटहरी, हेरान , एशियन ओपन बिल, इंडियन स्कीमर, सुर्खाब, हैरॉन, पिजन आदि सहित पाईड एवोसेट, कॉटन टिल, गेड वेल, मलार्ड, नार्दन पिटेल, गागेनी, टफ्टेड पॉचार्ड, ब्लैक नेक्ड स्ट्रोक, यूरेशिन करलिव, नार्दन स्लॉवर आदि प्रवासी पक्षी यहां आते हैं।

हस्तिनापुर अभयारण्य में रामराज क्षेत्र की मध्य गंगा नहर के किनारे स्थित समाना झील देश की एक बड़ी झील है। प्रवासी पक्षियों को यहां की आबोहवा बहुत भाती है।

यह झील रामराज से लेकर किला परीक्षित गढ़ तक लगभग 25 किलोमीटर तक के क्षेत्र में फैली है। इस झील में कछुओं, मेंढको के साथ मछलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां भी पाई जाती हैं। यह समाना झील कई कारणों से अब सिमट कर इसका दायरा कम हो रहा है।

हस्तिनापुर अभयारण्य के क्षेत्र में दलदल व ठहरे हुए उथले
पानी वाले क्षेत्रों में सफेद घटिका वाले सारस भी प्रवास करते हैं। यह सारस अत्यंत दुर्लभ है और हमारे यहां रूस चीन जापान आदि देशों से यहां आते हैं। ये सारस विश्व की दुर्लभ प्रजाति के रूप में प्रथम श्रेणी के जीवो की सूची में संरक्षित हैं। विश्व भर में संरक्षित प्राणी होने के नाते इन्हें बचाने की कोशिशें लगातार जारी है। ये सारस यहां कभी कभी ही दिखाई देते हैं।

हस्तिनापुर अभयारण्य क्षेत्र में दलदल युक्त भूमि बड़ी मात्रा में है और इस भूमि को खेती योग्य भूमि में बड़ी मात्रा में बदल दिया गया है, इसके बाद भी यहां अभी भी काफी बड़े क्षेत्र में दलदली भूमि नम और घास युक्त है।

गंगा के किनारे अभी भी बहुत जगह दूरस्थ इलाकों में है जहां आम आदमी का पहुंचना बहुत मुश्किल है। यह स्थान पहुंच मार्गों से दूर है।

इन स्थानों पर प्रचुर मात्रा में विभिन्न प्रकार की मछलियों की बहुतायत है। इन स्थानों पर जल भी कम गहरा होता है। इसलिए जल पक्षियों को इन जगहों पर भोजन आसानी से और लंबे समय तक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता रहता है। इस कारण जलीय पक्षियों को ऐसे स्थान पसंद आते हैं। अनेकों प्रकार के सारस और तरह-तरह के जल पक्षी इन क्षेत्रों में निवास करते हैं।

हालांकि ये जल पक्षी भोजन के लिए अपना स्थान थोड़े थोड़े समय के अंतराल पर बदलते रहते हैं। लेकिन फिर भी इनमें से अनेक पक्षी आसपास आबादी का इलाका न होने के कारण पानी के किनारे विचरण करते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं।

यहां के जब यह इलाके इन प्रवासी पक्षियों के कलरव और चहचहाहट से गूंजने लगते हैं। इनका खाना ढूंढना, इनकी उड़ान और अठखेलियां स्थानीय नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती है।

इन इलाकों में पक्षी प्रेमियों , पर्यावरणविद और प्रकृति प्रेमियों का जमघट यहां लगना शुरू हो जाता है। इनकी हरकतों को अपने कैमरे में कैद करने के लिए पर्यटकों का जमघट यहां लगता है।

यहां इन प्रवासी पक्षियों को देखना एक सुखद अनुभव होता है। इन प्रवासी पक्षियों का संसार बहुत विशाल और अनोखा होने के साथ-साथ तरह-तरह की रोचकताओं से भरपूर होता है।

इन स्थानों से होकर हजारों लोग दिन प्रतिदिन गुजरते हैं और जब वह इन खूबसूरत प्रवासी पक्षियों को यहां
जल क्रीड़ा करते हुए देखते हैं। उनके कलरव को सुनते हैं। तब उनके मन में इनके बारे में जानने की उत्कंठा पैदा होती है।

*** गंगा के पूर्वी किनारे की ओर के धनोरा मंडी के पास सुजमना गांव में गंगा से बनी विस्तृत झील में भी प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं।

** हमारे देश में पक्षियों की लगभग १३०० से अधिक प्रजातियां है, जबकि उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या ५६० के लगभग है। इनमें से लगभग ३५० प्रजातियां मेरठ व सहारनपुर मंडल में निवास करती हैं।

** गंगा के तटों पर स्थित खादर क्षेत्रों के अलावा ये प्रवासी पक्षी बिजनौर में रामगंगा बांध, सैंडिल बांध व खो बैराज क्षेत्र में भी सर्दी के समय समूह में यहां आकर डेरा डालते हैं। इन क्षेत्रों में भी अनेकों प्रकार की रंग बिरंगी बत्तखो के साथ साथ विभिन्न प्रकार के सारस, मुगाबी, कूट विजन, सफेद आंख वाला कोचार्ड, किंगफिशर, विजन कोमनटील, कलगी वाला कोचार्ड, सफेद मुनिया, स्वैलाज इग्रेट, स्पाट विल्स, सिंगपुर, अबाबील, मलार्ड शावलर आदि पक्षी देखे जा सकते हैं।

इस क्षेत्र के अनेकों स्थानों पर प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जलीय घास, कई प्रकार की छोटी मछलियां, कई प्रकार की उथले पानी में उगने वाली वनस्पतियां और दलदल में उगने वाली घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है।

इन तरह-तरह के सुंदर पक्षियों में बैटिड हैडिड(कादंब हंस, सवन), ब्रह्मनी डक (चकवा, चकोर, सुर्खाब), सोवलर (तिदारी), पिनटेल स्नाईप,( भरक), इंडियन डार्ट(बानवर),आदि कई दर्जन प्रजाति के देसी विदेशी जल पक्षी यहां डेरा डालते हैं। इन में से कुछ प्रजाति के पक्षी झुंडों में रहना पसंद करते हैं तो कुछ प्रजाति के पक्षी जोड़े में रहना पसंद करते हैं।

पक्षियों की अनेकों प्रजातियां हैं जो झाड़ों में ठंडे प्रदेशों से आकर यहां विचरण करते हैं तथा सहवास के उपरांत गर्मी शुरू होते ही वापस लौट जाते हैं।

इन सुंदर पक्षियों के बीच कुछ पक्षी अपने रूप-रंग और आबादी के निकट भी रहने के कारण साहित्य में अमर हो गए चकवा, चकोर पक्षी आकर्षण का केंद्र होते हैं।

काली चोंच, गहरी भूरी आंख, काली या गहरी उन्नाबी टांगों वाला यह पक्षी गोल समूह बांधकर आता है। गहरे एवं अथाह पानी को पसंद करने वाला यह पक्षी नदी के किनारे पर जोड़े में तैरता देखा जा सकता है। चकोर पक्षी किसी के निकट आने पर अपना सिर उठाकर कर्कश आवाज में एक दूसरे को आगाह करने लगते हैं और फिर तेजी से उड़ जाते हैं। इनकी कर्कश आवाज ही इनकी पहचान है।

पक्षियों के कलरव के संगीत के बीच सितार की भूमिका निभाती भरक पक्षी की तिडिक – तिडिक की आवाज मन मोह लेती है।

इन पक्षियों में भारत के सबसे सुंदर पक्षियों में एक भूरी आंखों वाले ओहारी की चहलकदमी व चहचहाना भी यहां आए पक्षी प्रेमियों एवं आगंतुकों को आकर्षित करता है। करीब 10 इंच लंबाई का यह पक्षी अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

एक और पक्षी जो भारत में सबन और काज नाम से प्रसिद्ध सनाबत सबसे अधिक संख्या में यहां आते हैं।
सबन भूरी आंखों व नारंगी पीली चोंच वाला यह पक्षी भी मौसमी पक्षी है। जो यहां अक्टूबर में पहुंचता है तथा अप्रैल माह के मध्य तक जब यहां फसल कट रही होती है फिर उत्तर दिशा की ओर लौट जाता है।

इन्हीं पक्षियों में एक पक्षी भूरी आंख एवं नारंगी पीली चोंच वाले कादम्ब हंस को किनारे पर या रेत में दिन भर धूप में बैठना पसंद है। सुबह के समय यही पक्षी पानी में जाते समय काफी नीचे होकर उड़ते हैं, जिससे एक विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है। इसी पक्षी को हमारे देश के कुछ हिस्सों में कलहंस या हंसराज के नाम से भी जाना जाता है।

** गंगा के इस एशियन फ्लाई वे क्षेत्र में जहां गंगा के किनारे प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। इस क्षेत्र में गंगा पर कई बैराज मौजूद है। बैराज क्षेत्र में प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श परिस्थितियां मौजूद है। प्रतिवर्ष इस इलाके में यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ रही है।

इन बैराज क्षेत्रों में पक्षियों की जल क्रीडाओ को देखने व इनके कलरव को सुनने बड़ी संख्या में पक्षी प्रेमी यहां पहुंचते हैं। इन जलीय प्रवासी पक्षियों देखने व उनकी उपस्थिति का आनंद यहां आने वाले पक्षी प्रेमी और पर्यटक दूर से ही उठा पाते हैं। क्योंकि उनके पास इन जल पक्षियों को निकट से देखने के साधन जैसे कि मोटर बोट, नाव व दूरबीन आदि यहां उपलब्ध नहीं होती है। जनसामान्य पर्यटकों को इन पक्षियों के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं होती है। आम पर्यटक इन पक्षियों के नाम आदि नाम आदि भी नहीं जानते। वे यह भी नहीं जानते सुंदर पक्षी किन मुश्किलों को सहकर और कितने हजार किलोमीटर के सफर को तय करके यहां तक पहुंचते हैं। यहां शीतकाल के प्रवास को पूरा करके जब यहां गर्मियां शुरू होंगी तो फिर वही थे दूसरे देश पहुंच जाएंगे।

*** ब्रजघाट -(गढ़मुक्तेश्वर)

यहां आए तीर्थ यात्रियों का गंगा जी में तैरते सुंदर पक्षी मन मोह लेते हैं। हर वर्ष कड़ाके की ठंड के मौसम में ये रंग बिरंगे रंग बिरंगे सुंदर प्रवासी पक्षी दूर देशों से आकर यहां डेरा डालते हैं।

इनका इस इलाके में जाड़े का मौसम शुरू होते ही यहां गंगा के तटीय क्षेत्रों में आना आरंभ हो जाता है और जनवरी-फरवरी तक इन पक्षियों का यहां भारी जमावड़ा लगा रहता है।

सुर्खाब, मुर्गाबी, सारस, डक, बगुला आदि पक्षी हजारों की संख्या में दूर देशों से यहां आते हैं।ये सुंदर पक्षी गंगा जी सहित गढ़मुक्तेश्वर और गजरौला के तराई वाले क्षेत्रों में अपना बसेरा बनाते हैं।

ये सुंदर मनमोहक साइबेरियन पक्षी स्थानीय लोगों का ही नहीं वरन बृजघाट पर गंगा जी में स्नान करने आने वाले तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बन जाते हैं। तीर्थयात्री, श्रद्धालु गंगा स्नान व अपने धार्मिक क्रियाकलापों के समय इन पक्षियों को मुरमुरे आदि खिलाकर अपने को धन्य मानते हैं।

बृजघाट पर गंगा जी के अपेक्षाकृत साफ पानी में भोजन ढूंढते इन कई-कई सौ प्रवासी पक्षियों के कई झुंड यहां देखें जा सकते हैं। इन रंग बिरंगे सुंदर प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए दूरदराज से पक्षी प्रेमी भी अच्छी खासी संख्या में यहां आते हैं।

बृजघाट पर गंगा जी में नौकायन करते समय तीर्थयात्री, पर्यटक और पक्षी प्रेमी इन पक्षियों को खील मुरमुरे आदि खिलाकर आनंद लेते हैं।

बृजघाट -यहां के अति व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से गुजरने वाले यात्री व बच्चे तथा महिलाए भी यहां गंगा पर बने पुल से गुजरते समय गंगा में अठखेलियां करते इन रंग बिरंगे अद्भुत पक्षियों की एक झलक पाने के लिए अपने वाहनों को गंगा पुल पर ही रोकने को विवश हो जाते हैं और कुछ देर यहां रुक कर इन पक्षियों की जल क्रीड़ाओं को देख कर असीम आनंद का अनुभव करते हैं।

*** अनूपशहर क्षेत्र में गंगा तट पर भी प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। छोटीकाशी के नाम से वर्णित तीर्थ नगरी का गंगा तक सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों से गुलजार हो जाता है।

क्षेत्र में विशाल चारागाह के रूप में रुके हुए पानी में बड़ी संख्या में मछलियां, केंचुए, झींगे, कीड़े मकोड़े आदि व जलीय वनस्पति के रूप में पर्याप्त भोजन उपलब्ध होने के कारण मेहमान प्रवासी पक्षियों के विचरण का केंद्र बन जाता है। यहां भी नाना प्रकार के जलीय प्रवासी पक्षी देखे जा सकते हैं।

यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र बनता है स्थानीय भाषा में बोला जाने वाला चकवा-चकवी के नाम से पुकारा जाने वाला पक्षी। चकवा-चकवी का नाम ब्रह्मनी डक है। इसके अलावा यंहा साइबेरियन सारस, कूट ग्रेलग ग्रीज , सुर्खाब, मिंटेल , स्पूनविल, कामन पोचार्ड, अनेक प्रजातियों के बगुले आदि तरह-तरह के पक्षी यहां भी बसेरा बनाते हैं।

ये प्रवासी पक्षी न जाने कबसे पीढ़ी दर पीढ़ी कई देशों
से सर्दी के मौसम में, जब उन देशों में कड़ी ठंड पड़ती है। इन पक्षियों के लिए वहां रहने की स्थिति प्रतिकूल हो जाती है। उस समय यह बेजुबान परिंदे हजारों किलोमीटर की कठिन यात्रा तय करके यहां तक पहुंचते हैं। इस बीच यह परिंदे कई देशों के ऊपर आसमान से होकर तथा ऊंचे ऊंचे बर्फीले पर्वतों को पार करके यहां तक आते हैं। यह कठिन सफर ये परिंदे कैसे पूरा करते हैं, जीव विज्ञानियों के लिए भी यह एक पहेली बना हुआ है।

इन परिंदों के पास न कोई रडार होता है, न कोई नक्शा होता है और न हीं इनके पास कोई पुरानी निशानी होती है। इनमें से बहुत से पक्षी तो अपने जन्म के बाद पहली बार प्रवास के लिए यहां आ रहे होते हैं। फिर भी यह सब पक्षी पीढ़ी दर पीढ़ी उसी स्थान पर आते हैं जहां पर इससे पहले उनके पूर्वज भी आते थे। प्रवासी पक्षी झुंड में यात्रा करते हैं। इन पक्षियों की स्मरण शक्ति तथा याददाश्त ऐसी होती है कि कहीं कोई गलती की गुंजाइश ही नहीं।

*** इस क्षेत्र में पर्यटन की असीम संभावनाए मौजूद है। इस क्षेत्र में ऐसे कई स्थान है जहां पर्यटक आसानी से पहुंच सकते हैं। उन स्थानों को यदि बर्ड वाचिंग केंद्र के रूप में विकसित किया जाए तो प्रकृति के इस रहस्य रूप में रुचि रखने वाले लोगों के लिए गंगा के किनारे प्रकृति के कई अजूबों से पर्दा उठाने वाले साबित हो सकते हैं। आवश्यक है कि इस क्षेत्र में प्रकृति के अनुकूल ऐसे निर्माण कराए जाएं जहां पर्यटक बिना किसी आहट के बैठकर पक्षियों के इन कौतूहल, क्रियाकलापों और कलरव को निकटता से देख सकें।

यदि क्षेत्र में सरकार पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों की सुविधा के लिए नदी के बीच में कृत्रिम टापू, वॉच टावर्स का निर्माण, दूर से ही पक्षियों को देखने के लिए टेलिस्कोप की व्यवस्था आदि की व्यवस्था कर दे तो बैराज से हस्तिनापुर तक का पूरा क्षेत्र अन्य बड़े पक्षी विहारो जैसा प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल बन सकता है।

*** इन प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इन सुंदर पक्षियों के सहवास में कोई खलल ना पड़े और इनका शिकार न हो, इसके मद्देनजर वन विभाग इन क्षेत्रों में वन कर्मियों को तैनात करता है।

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गाजियाबाद जनपद –

* दादरी वेटलैंड  –  पक्षी विहार

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