___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के लगभग १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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पुराणों में प्रसिद्ध इस प्राचीन स्थान को पौराणिक काल में महाराज वेन के पुत्र महाराज पृथु ने बसाया था। पृथूदक में की महाराजा पृथु ने घोर तपस्या की और ब्रह्मलीन हुए। यह तीर्थ स्थान उन्हीं के नाम पर पृथुदक के नाम से विख्यात हुआ।

राजा वेन धर्म से विमुख हो गए थे जिस कारण ऋषियों ने उन्हें श्राप देकर मार दिया था। राजा वेन के शरीर का मंथन किया गया, जिससे भगवान विष्णु के नौवें अंश पृथु का जन्म हुआ। महाराज पृथु ने जिस स्थान पर अपने पितरों को ‌‌उदक यानि जल दिया,वही स्थान (पृथु+उदक) पृथूदक के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पृथुदक का अर्थ है पृथु का सरोवर।कालांतर में पृथुदक से ही इसे पेहोवा कहा जाने लगा।

पिहोवा तीर्थ की पवित्रता महानता व महत्व का गुणगान सनातन हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों जैसे महाभारत, गरुड़ पुराण वायु पुराण, वामन पुराण आदि में किया गया है।

कुरुक्षेत्र को सनातन हिंदू धर्म में बहुत पवित्र स्थान माना गया है कुरुक्षेत्र में भी सबसे पवित्र स्थान सरस्वती नदी के तट पर स्थित पृथुदक को माना जाता है।

पुण्यमाहू:कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वती।
सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम्।
पृथूदकात् पुण्यतमं नान्यत् तीर्थ नरोत्तम।।

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा।
यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना।।

तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत।
अश्वमेधफलं चांपि रहते स्वर्गमेव च।।

(महा.वन. तीर्थयात्रापर्व,पद्म पुराण स्वर्ग.)

अर्थात कुरुक्षेत्र को बडा पुण्यमय कहा गया है, किंतु कुरुक्षेत्र से भी अधिक पुण्यमयी सरस्वती नदी है। सरस्वती नदी से भी उसके तटवर्ती तीर्थ पवित्र हैं और उन तटवर्ती तीर्थों से भी अधिक पृथुदक पुण्यमय है। नरोत्तम! पृथुदक से बढ़कर और कोई पवित्र तीर्थ नहीं है। यहां स्नान करने मात्र से ही नर-नारियों द्वारा किए गए सभी पाप, चाहे वे अनजाने में किए गए हों या जानकर किए गए हों सब नष्ट हो जाते हैं। उसे अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है तथा उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

वामन पुराण में पृथूदक तीर्थ के बारे में कहा गया है-

पुण्यमाहु कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वती।
सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्चपृथदकम्।।

कुरुक्षेत्र को पवित्र माना जाता है और कुरुक्षेत्र से भी पवित्र सरस्वती नदी है। सरस्वती नदी के तट पर भी अनेक तीर्थ हैं, इन सब में पृथूदक तीर्थ सर्वश्रेष्ठ है।

गंगा, यमुना, नर्मदा और सिंधु इन चारों पवित्र नदियों में स्नान का फल अकेले पृथूदक तीर्थ में ही प्राप्त हो जाता है।
वामन पुराण में ही कहा गया है कि जो मनुष्य सरस्वती नदी के तट पर पृथूदक तीर्थ में जप करता हुआ अपना शरीर छोड़ता है, निसंदेह उस मनुष्य को अमृत्व की प्राप्ति होती है।

प्राचीन काल में पवित्र सरस्वती नदी कुरुक्षेत्र से होती हुई पृथूदक में बहती थी। सरस्वती नदी के किनारे वेद मंत्रों की रचना हुई थी। सरस्वती नदी के तटों पर अनेक ऋषि-मुनियों ने तपस्या की।

रुषंग ऋषि मोक्ष प्राप्ति के लिए हरिद्वार के गंगा तट को छोड़कर अपने पुत्रों के साथ यहीं पृथूदक में आए थे।रुषंग ऋषि ने अपने पुत्रों को सरस्वती नदी के तट पर स्थित पृथूदक तीर्थ के महत्व के बारे में बताते हुए कहा है,’हे पुत्रों जो मनुष्य सरस्वती नदी के तट पर स्थित पृथूदक तीर्थ में जब करते हुए अपना शरीर छोड़ता है वह मनुष्य जन्म मरण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।’

पृथूदक का महत्व इसी से स्पष्ट है कि यहां ब्राह्मण श्रेष्ठ आषि्र्टषेण मुनि को यही मनवांछित सिद्धि प्राप्त हुई थी। बदकालभ्य ऋषि और ब्रह्मा जी के पुत्र वशिष्ठ को भी यहीं सिद्धि मिली थी। यहां गाधिराजा के पुत्र विश्वामित्र क्षत्रियत्व से ब्राह्मणत्व की कोटि में आए। यह वह तीर्थ है जहां राजा ययाति ने ९९ यज्ञ किए।

पृथुदक तीर्थ में ही भगवान शंकर ने चैत्र मास की चतुर्दशी के दिन भूत-प्रेत और पिशाचों को दिव्य लोक प्रदान किया था इसी कारण यह चतुर्दशी पिशाचमोचनी चतुर्दशी के नाम से जानी जाती है।
इस पौराणिक तीर्थ का महत्व इस कारण भी है कि प्रजापति ब्रह्मा जी ने इसकी रचना पृथ्वी, जल, वायु और आकाश समेत सृष्टि के आदि में की थी। जिसका प्रमाण इस तीर्थ में ब्रह्मयोनि स्थान के रूप में मिलता है। इंद्र ने भी अपने पितरों का पिंडदान इसी स्थान पर किया था। उस समय इस स्थान का महत्व गंगा द्वार हरिद्वार से भी अधिक था।

वामन पुराण में पृथूदक को सरस्वती नदी के तट पर स्थित अत्यंत श्रेष्ठ तीर्थ माना गया है। महाभारत ग्रंथ में कहा गया है कि सरस्वती नदी के जल को पीने से मोक्ष मिलता है। मनुष्यों का तो कहना ही क्या स्वयं भगवान शंकर ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌पृथूदक में स्नान कर पाप मुक्त हुए थे। यहां पृथूदकेश्वर का वास है।

पृथूदक तीर्थ के बारे में मान्यता है कि इस क्षेत्र में किया जाने वाला कोई भी पाप-पुण्य तेरह दिन तक तेरह गुना फलीभूत होता है। यही नहीं पृथूदक तीर्थ के महत्व के बारे में कहा गया है कि गंगाजल में मरने से और अस्थि प्रवाह से मनुष्य की मुक्ति होती है, काशी के जल व स्थल में देह का त्याग होने पर मुक्ति मिलती है किंतु पृथूदक तीर्थ में तो जल, स्थल व अंतरिक्ष आदि में भी मृत्यु होने पर मोक्ष मिलता है।

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पिशाचमोचनी चौदस के नाम से जानी जाती है। इस दिन जो भी प्राणी पेहोवा तीर्थ में स्नान करता है वह करोड़ों यज्ञों के जितने फल का भागी बनता है और जो प्राणी इसी तिथि के दिन पृथ्वीश्वर महादेव के सानिध्य में स्नान करके अपने दिवंगत पूर्वजों का पिंडदान करता है, उनके पूर्वज एक वर्ष तक तृप्त होकर अपनी संतानों को सुख देते हैं।

महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने बंधु बांधव कौरवों और दूसरे सगे-संबंधियों का विनाश करने का प्रायश्चित करने के लिए यहीं पृथूदक में सरस्वती नदी के तट पर आए थे और यहां पिंडदान किया था।

यह पवित्र तीर्थ स्थल कुरुक्षेत्र के पास थानेश्वर से २० कि.मी. दूर व कुरुक्षेत्र से यह २७ कि.मी.की दूरी पर है।भारत पर विदेशी विधर्मी आक्रांताओं गजनी तथा गोरी ने थानेश्वर के साथ-साथ इस तीर्थ को भी लूटा और विध्वंस किया था। अंत में सिखों के शासन के दौरान यहां पुण: तीर्थों का उद्धार होना आरंभ हुआ।

सरस्वती नदी केवल इसी पवित्र स्थान पेहोवा में पूर्व दिशा में बहती है। यहां प्रतिवर्ष चैत्र चौदस, कार्तिक पूर्णिमा, भादो की अमावस्या एवं सोमवती अमावस्या के दिन स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार इस स्थान पर किया गया स्नान, दान आदि कई गुना फलदाई होता है।

इस स्थान पर मधुस्रवा, घृतस्रवा,ययाति,बृहस्पति तथा पृथ्वीश्वरादि अनेक तीर्थ है।

पेहोवा में सरस्वती सरोवर में गुरु नानक देव जी, गुरु गोविंद सिंह जी ने स्नान किया। महाराजा रणजीत सिंह जी भी इस पेहोवा तीर्थ में अपनी माता का कर्मकांड कराने के लिए आए थे।

पेहोवा मां सरस्वती की नगरी है। इसे विद्या की देवी मां सरस्वती की नगरी माना जाता है। यहां का प्रमुख तीर्थ सरस्वती घाट है। जहां प्राचीन पौराणिक काल में सरस्वती नदी प्रवाहित होती थी। मान्यता है कि वैदिक काल में यहीं सरस्वती नदी के इसी घाट के तट पर महर्षि विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना की थी।

पौराणिक ग्रंथों के कथानकों के अनुसार सरस्वती नदी को कलयुग में अदृश्य हो जाने का श्राप मिला था।

सरस्वती देवी मंदिर –

पेहोवा में सरस्वती सरोवर के तट पर वैदिककालीन विद्या की देवी वीणा-वादिनी मां शारदा का प्राचीन मंदिर है। पूरे वर्ष भर यहां दर्शन पूजा के लिए श्रद्धालुओं के आने का तांता लगा रहता है, लेकिन बसंत पंचमी के अवसर पर यहां विशेष पूजा अर्चना होती है।

प्रसिद्ध इतिहासकार कनिंघम ने मां सरस्वती के इस प्राचीन मंदिर को ८८२ ईसा पूर्व का बताया है। इसी मंदिर में लगे शिलालेख से भी इसके ८९५ ईसा पूर्व का होने का पता चलता है। मंदिर के द्वार पर गुप्तकालीन मूर्तिकला के दर्शन होते हैं। यहां मंदिर में अन्य स्थानों पर लगे अभिलेखों और शिलापटों से भी इस स्थान के अति प्राचीन होने के साक्ष्य मिलते हैं।मराठों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इस मंदिर में ही अंदर जाकर कई छोटे-छोटे मंदिर हैं जिनमें परशुराम मंदिर, श्री कृष्ण युधिष्ठिर मंदिर महाभारत काल का स्मरण कराता हैं।

पेहोवा तीर्थ के मुख्य सरस्वती मंदिर के अतिरिक्त अनेक तीर्थ एवं प्राचीन मंदिर हैं। जिनकी यात्रा एवं दर्शन करना पुण्य फल प्रदान करने वाले कहे गए हैं।

पेहोवा के प्रसिद्ध तीर्थ एवं मंदिर -पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर, माता सरस्वती मंदिर, माता संतोषी माता मंदिर, माता वैष्णो मंदिर, स्वामी कार्तिकेय मंदिर, श्री हनुमान मंदिर, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, महर्षि वाल्मीकि मंदिर, श्री परशुराम मंदिर, बगलामुखी मंदिर श्री दक्षिण काली पीठ मंदिर, शनि मंदिर।

इस तीर्थ के पास ही सूर्य तीर्थ, सोम तीर्थ, शुक्र तीर्थ, पाणिखात आदि अनेकों तीर्थ है। कपिल यक्ष, सोमेश्वर, भूतेश्वर, सर्पदमन (सफीदों) आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है वामन पुराण में इन तीर्थों का वर्णन मिलता है।

यहां सरस्वती नदी के इसी तट पर अति प्राचीन पीपल का वृक्ष है। जोकि प्रेत पीपल के नाम से जाना जाता है। स्प्रे पीपल के वृक्ष पर यहां आने वाले यात्री अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए जल चढ़ाते हैं।

* बड़ा शिवालय – श्री पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर –

यह मंदिर पेहोवा का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। यह वही प्राचीन मंदिर है जिसे महाराजा पृथु ने बनवाया था। विधर्मी हमलावरों ने दूसरे अन्य स्थानों की तरह इस पवित्र स्थान को भी बर्बाद कर दिया था। विभिन्न परिवर्तनों के बाद भी इसका अस्तित्व आज भी बरकरार है। मराठों ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और इसका जीर्णोद्धार महाराजा रणजीत सिंह जी ने करवाया था। बड़े शिवालय के साथ ही पापांतक तीर्थ है जो पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।

* स्वामी कार्तिकेय मंदिर –

बडा शिवालय श्री पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर के साथ ही भगवान शिव के बड़े पुत्र स्वामी कार्तिकेय का मंदिर है। यह मंदिर भी महाभारत काल का माना जाता है। यहां इस मंदिर में तेल और सिंदूर चढ़ाया जाता है। इस बारे में पौराणिक कथा है –

भगवान शंकर अपने बड़े पुत्र कार्तिकेय का राजतिलक करने का विचार करने लगे, तब माता पार्वती भगवान शंकर से अपने छोटे पुत्र गणेश जी का राजतिलक करवाने का हट करने लगी।

तभी वहां ब्रह्मा, विष्णु, शंकर जी सहित सभी देवी-देवतागण एकत्रित हुए और उस सभा में यह निर्णय लिया गया कि दोनों भाइयों में से जो कोई भी सबसे पहले समस्त पृथ्वी की परिक्रमा लगाकर यहां पहुंचेगा वही राजतिलक का अधिकारी होगा।

भगवान कार्तिकेय अपने प्रिय वाहन मोर पर सवार होकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा लगाने के लिए चल पड़े। जब गणेश जी अपने वाहन चूहे पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा लगाने के लिए जाने लगे तो उन्हें माता पार्वती ने कहा कि पुत्र तुम यहीं पर एकत्र समस्त देवगणों के साथ भगवान शंकर की परिक्रमा करो, क्योंकि त्रिलोकी के नाथ स्वयं यहीं विद्यमान है।

माता पार्वती के कहे अनुसार गणेश जी ने तीन परिक्रमा लगाकर भगवान शंकर को प्रणाम करके कहा कि – हे तात मैंने संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा कर ली है।

भगवान शंकर सहित वहां उपस्थित सभी देवगणों ने गणेश जी का राजतिलक करके उन्हें सभी शुभ कार्यों में प्रथम पूजा का अधिकार दे दिया।

उधर मार्ग में भगवान कार्तिकेय को नारद जी ने इस सारे वृतांत को बताया। भगवान कार्तिकेय अति शीघ्र समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करके सभा स्थल पर आ पहुंचे।

वह माता पार्वती से सारी बात जानकर बोले की हे माता आपने मेरे साथ छल किया है। बड़ा पुत्र होने के नाते भी यह मेरा अधिकार था। आपके ही दूध से यह मेरी खाल, मांस- मज्जा बनी हुई हैं। मैं अभी इनको उतार देता हूं। अत्यंत क्रोध में भरे कार्तिकेय ने अपने खाल और मांस मज्जा को उतारकर माता पार्वती के चरणों में रख दिया और साथ ही समस्त नारी जाति को श्राप दिया की मेरे इस स्वरूप का जो भी स्त्री दर्शन करेगी वह सात जन्मो तक विधवा रहेगी।

उस समय सभा में उपस्थित सभी देवगणों ने शारीरिक शांति के लिए भगवान कार्तिकेय का तेल और सिंदूर से अभिषेक किया। जिससे उनका क्रोध शांत हुआ। भगवान शंकर और उपस्थित सभी देवताओं ने भगवान कार्तिकेय को समस्त देवताओं का सेनापति नियुक्त किया। तब भगवान कार्तिकेय पृथुदक में सरस्वती नदी के तट पर पिंडी स्वरूप में स्थित हो गए और कहा कि जो मनुष्य मेरा तेल से अभिषेक करेगा उसके मृत्यु को प्राप्त हुए पितृगण आदि वैकुंठ में प्रतिष्ठित होकर मोक्ष को प्राप्त करेंगे। सरस्वती के तट पर कर्म, क्रिया और पिंडदान आदि किए गए कार्य करने के बाद मेरे साक्षी होंगे।

महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए युधिष्ठिर के सगे संबंधियों का यहां पृथूदक में सरस्वती नदी के तट पर उनके द्वारा कर्म पिंडादि संपन्न करा कर भगवान कार्तिकेय जी पर तेल का अभिषेक कराया और यहां युधिष्ठिर जी के द्वारा ही ज्योति प्रज्वलित करवाई थी। वह अखंड ज्योति आज भी कार्तिकेय जी के मंदिर में प्रज्वलित है।
चैत्र चौदस के अवसर पर यहां आने वाले लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्री भगवान कार्तिकेय पर तेल चढ़ाने से कभी नहीं चूकते हैं। इस दिन यहां लगने वाले में देश के कोने कोने से लाखों श्रद्धालु आते हैं, इनमें भी विशेषकर लाखों की संख्या में पंजाब से आए श्रद्धालु होते हैं।

* भगवान पशुपतिनाथ मंदिर –

इस मंदिर में भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा श्रद्धा का केंद्र है। कसौटी के पत्थर से बनी यह प्रतिमा कला का बेजोड़ नमूना और आकर्षण का केंद्र मानी जाती है।

* अवकीर्ण तीर्थ –

मानव कल्याण के लिए ब्रह्मा जी ने इस तीर्थ को बनाया था। मान्यता है कि यहीं पर ऋषि बकदाल्भ्य ने जप, तप तथा यज्ञ किए थे और उन्होंने क्रोधी धृतराष्ट्र को उनके वाहन समेत होम कर दिया था, उसके बाद ही राजा को ज्ञान मिला था। यहां यज्ञोपवित संस्कार कराए जाते हैं। श्रद्धालु इस स्थान पर पवित्र स्नान करके ब्रह्मा जी का पूजन करते हैं। यह स्थान पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर के समीप ही स्थित है।

* बृहस्पति तीर्थ –

इस स्थान पर देवताओं के गुरु बृहस्पति जी ने यज्ञों का आयोजन किया था। यह तीर्थ स्थान अवकीर्ण तीर्थ के पास ही स्थित है। श्रद्धालु यहां स्नान करके देवगुरु बृहस्पति का पूजन करते हैं।

* पापान्तक तीर्थ –

बृहस्पति तीर्थ के घाटों के समीप ही यह पवित्र स्थान है।

* ययाति तीर्थ –

पृथूदक में सरस्वती नदी के इसी पावन तट पर महाराजा ययाति ने यज्ञ किए थे। महाराजा ययाति की कामना के अनुसार ही सरस्वती नदी ने यहां दुग्ध, धृत एवं मधु को बहाया था। इसी से यह घाट दुग्धस्रवा तथा मधुसस्र‌वा के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस स्थल पर सरस्वती नदी के दोनों तटों पर कई घाट बने हुए हैं। श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करने के लिए शास्त्रों के अनुसार धार्मिक कार्य संपन्न कराते हैं। चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किस स्थान पर मेला लगता है।

* विश्वामित्र तीर्थ –

पौराणिक साल में इस स्थान पर मह‌र्षि विश्वामित्र का आश्रम और उनके तप करने का स्थान था।

* संगमेश्वर महादेव अरुणाय –

वामन पुराण में इस तीर्थ का माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। गरुड़ पुराण, स्कंद पुराण और महाभारत आदि ग्रंथों में भी इस स्थान की महिमा को वर्णित किया गया है। भगवान शंकर का यह तीर्थ पेहोवा से ४ कि.मी. अरुणाय गांव के पास है।

किसी समय पौराणिक काल में यहां अरुणा व सरस्वती का संगम था। इस बारे में एक पौराणिक कथा है। इन नदियों के संगम पर आदिदेव भगवान शिव की स्थापना की गई और यह स्थान संगमेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तीर्थ का नाम अरुणा संगम पडने का मुख्य कारण दो महर्षियों वशिष्ठ एवं विश्वामित्र की तपस्या है। इन्हीं दो महर्षियों के कारण सरस्वती नदी इस स्थान पर एक वर्ष तक रक्त मिला जल बहाती रही। ऋषि, देवता, गंधर्व एवं अप्सराएं सरस्वती नदी की इस स्थिति को देखकर बहुत दुखी हुए। तब भगवान देवाधिदेव शंकर की आराधना करने से सरस्वती नदी का उद्धार हुआ।

इस तीर्थ के विषय में यह भी बताया जाता है कि प्राचीन काल में यहां दवि ऋषि चार समुद्रों को ले आए थे। सरस्वती और समुद्र के संगम में स्नान करने से मनुष्य हजारों गोदान के फल प्राप्त करने के साथ स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है और वह पुण्य आत्मा मनुष्य अपने तेज से सदा अग्नि की तरह प्रकाशमान होता है।

इस स्थान पर ही इंद्र को भी ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।

घोर कलयुग के आने और अधर्म के फैलने पर अरुणाय संगम पर स्नान करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है।

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार बलराम जी एवं वामन पुराण के कथनानुसार भक्त शिरोमणि प्रहलाद जी इस पावन तीर्थ में आए थे। अपनी तीर्थयात्रा के क्रम में पांडव भी यहां आए। सिख राज्य के संस्थापक महाराजा रंजीत सिंह ने इस मंदिर के दर्शन किए।

पृथूदक में सरस्वती नदी के तट पर पवित्र घाट

* पृथूदक –

इस स्थान पर महाराजा पृथु ने तप किया था और अपने परम तत्व में लीन हुए थे। इसी से यह स्थान पृथूदक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी स्थान पर ऋषि उतंक और मनु इत्यादि ने तप किया था।

* ब्रह्मयोनि –

मान्यता है कि इसी स्थान पर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम सृष्टि की रचना की थी। यही वह स्थान है जहां महर्षि विश्वामित्र, देवापि, सिंधु, आष्र्टिषेण और अग्नि ने मोक्ष प्राप्त किया था। इस तीर्थ को इन ऋषियों के नाम से भी जाना जाता है। यह भी मान्यता है की विश्वामित्र ने यहीं पर ब्राह्मत्व प्राप्त किया था।

* सोम तीर्थ (फल्गु तीर्थ) –

यह स्थान कुरुक्षेत्र के सात पवित्र वनों में गिना जाता है। प्राचीन काल में यहां पर पवित्र फलों का वन था। आजकल यहां फरल नाम का गांव स्थित है। पौराणिक समय में दृषद्वती नदी इसी स्थान से होकर बहती थी। यहां के पवित्र सरोवर पर आश्विन मास के पित्र पक्ष में एवं सोमवती अमावस्या के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। उस समय यहां श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान करने पर गया के समान ही फल प्राप्त होता है। महाभारत काल में यहां इस स्थान पर आकर पांडवों ने श्राद्ध किया था।

* वशिष्ठ प्राची –

प्राचीन काल में इस स्थान पर मह‌र्षि वशिष्ठ का आश्रम था। इसी स्थान पर उन्होंने यज्ञों का आयोजन किया था। इस स्थान पर दो शिव मंदिरों के बीच में एक गुफा बनी हुई है जिसे वशिष्ठ गुफा कहा जाता है तथा एक कुआं स्थित है। श्रद्धालु तीर्थयात्री यहां अपने पितरों के कल्याण के लिए धार्मिक संस्कार करते हैं।

* रामतीर्थ –

सरस्वती नदी के तट पर ही यह परशुराम जी के यज्ञ का स्थान है। यहां श्रद्धालु परशुराम जी तथा उनके माता-पिता का पूजन करते हैं।

यहां प्रतिवर्ष शिवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला लगता है। प्रत्येक माह की त्रयोदशी के दिन भी यहां दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु आते हैं और भगवान शंकर की पूजा- अर्चना करते हैं। सावन के महीने में तो यहां हर दिन भक्तों का मेला लगा रहता है। श्रद्धालु यात्रियों के लिए यहां बहुत ही सुंदर व्यवस्था की गई है।

* पेहोवा में पितरों का पिंडदान करने से मोक्ष मिलता है। ब्रह्म योनि व प्राची तीर्थ का भी विशेष महत्व है। यहां का प्राची तीर्थ पवित्रतम माना गया है श्रद्धालुओं की आकांक्षाओं के अनुसार इसे प्राची सरस्वती का चिंतामणि नाम दिया गया है। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से इस स्थान के बारे में कहा -जो मनुष्य प्राची सरस्वती ने श्राद्ध करेंगे वह दस को लागे के और दस कुल पीछे के और एक स्वयं ऐसे इक्कीस कुल स्वर्ग जाएंगे। प्राची तीर्थ गया से भी अधिक पुण्य फलदायी है।

* पेहोवा में ही सरस्वती सरोवर के तट पर गुरुद्वारा नौवीं पातशाही तथा गुरुद्वारा बावली साहब विशेष श्रद्धा के केंद्र हैं।

महान तीर्थ स्थल पेहोवा में प्रतिवर्ष चतुर्दशी को भारी मेला लगता है लाखों की संख्या में श्रद्धालु यात्री यहां चौदस के दिन स्नान करते हैं इस विशाल मेले की विशेषता है कि इस अवसर पर बड़ी संख्या में सिख समुदाय के श्रद्धालु आते हैं यह चतुर्दशी मेला हिंदू सिख एकता का प्रतीक माना जाता है।

पेहोवा कुरुक्षेत्र की पौराणिक व महाभारत युद्ध की ४५ कोस की सीमा में ही आता है। धर्म इतिहास और पर्यटन में रुचि रखने वाले पर्यटन प्रेमियों के लिए पेहवा महत्वपूर्ण है।

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