_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित महाभारत क्षेत्र

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शामली जनपद
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गंगेरू गांव – बेडशीट, कालीन आदि

गंगेरू गांव में बड़े पैमाने पर हथकरघा के समूह खुले हुए हैं। हथकरघा मंत्रालय के प्रोत्साहित करने पर समूह के लोग अपने द्वारा निर्मित बेडशीट सीट, कालीन आदि कपड़ों को बेचने के लिए देश विदेश के विभिन्न राज्यों में आयोजित सरस मेलों में जाते हैं।

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बागपत जनपद
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अमीनगर सराय –

यह कस्बा हथकरघा उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

 

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गाजियाबाद जनपद

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मुरादनगर  –

दिल्ली से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित
मुरादनगर प्रमुख हथकरघा औद्योगिक नगर है।

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नोएडा – ग्रेटर नोएडा (गौतम बुध नगर जनपद) –

जेवर कस्बा –

जेवर के दरी, कालीन (गलीचे), दुतई, रजाई के बुनकरों की कारीगरी का कोई मुकाबला नहीं रहा है। यहां के कारीगर सैकड़ों वर्षो से पूरे भारत में अपनी कलात्मक विशेषता व टिकाऊपन के लिए मशहूर रहे हैं।

जेवर के कारीगरों व बुनकरों के इस व्यवसाय का इतिहास लगभग डेढ़ सौ वर्षो से भी अधिक पुराना है। सबसे पहले सन 1845 में मशहूर कारीगर कालेखा बरूनदास ने यहां दरी व कालीन के निर्माण की शुरुआत की थी यहां के अच्छी किस्म के बने दरी कालीन की बढ़ती मांग को देखकर पठानों के अन्य परिवार इस कार्य में रुचि लेकर अपने पुश्तैनी काम को अपनाते गए उस समय के रियासती काल में श्रेष्ठ कारीगरी के लिए नवाबों के द्वारा इनाम भी मिलता था मुंबई के सेठों और लखनऊ के नवाबों की विशेष मांग पर यहां के कारीगर उनके लिए काम करते थे और बदले में अच्छी कीमत और इनाम प्राप्त करते थे

यहां के कारीगरों की आज भी यह विशेषता है कि मात्र नमूना देखकर ही कैसी भी दरी और कालीन बना सकते हैं इनके बने सामान सालों साल चलते हैं यहां के कारीगरों के द्वारा बनाई गई दरी सालों साल इस्तेमाल होने के बाद भी फट तो सकती है लेकिन कभी सिकुड़न नहीं आ सकती दरी पर बाल्टी भर कर पानी उड़ेल दो लेकिन बूंद भर भी पानी पार नहीं हो सकता ऐसी विशेषता होती है यहां की बनी दरियों की।

पहले समय में यहां दरी व कालीन बनाने के कई बड़े कारखाने थे और सैकड़ों घरों में बुनाई का काम होता था हजारों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पाते थे लेकिन अब कई कारणों से इस कारोबार में पहले जैसी बात नहीं रही है।

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