__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के लगभग१००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध पौराणिक नगर पेहोवा आज से हजारों वर्ष पूर्व बहुत संपन्न और उन्नतशील नगर था। परम पावन देव सलिला सरस्वती के तट पर स्थित यह नगर मंदिरों एवं तीर्थों का नगर माना जाता है।

महाराजा पृथु की बसाई नगरी पेहोवा प्राचीन काल से एक तीर्थ का महत्व रखती है। पौराणिक काल में इसे पृथूदक के नाम से जाना जाता था। पौराणिक ग्रंथों में वर्णन है कि महाराजा पृथु ने अपने पिता वेण का अंतिम संस्कार और श्राद्ध इसी स्थान पर किया था।

पवित्र सरस्वती नदी के तट पर बसे इस पौराणिक एवं पावन स्थल की पवित्रता और महत्व का गुणगान वामन पुराण, वायु पुराण, गरुड़ पुराण मार्कंडेय पुराण एवं महाभारत में किया गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार कुरुक्षेत्र को पवित्र कहते हैं और कुरुक्षेत्र से भी पवित्र सरस्वती नदी है। सरस्वती नदी के तट पर भी बहुत से तीर्थ हैं, उन सभी में पृथूदक(पेहोवा)अत्यंत श्रेष्ठ है।

सनातन हिंदू धर्म में मृत लोगों की आत्मा की सद्गति एवं शांति के लिए श्राद्ध एवं पिंडदान किया जाता है। परंपरा के अनुसार आश्विन मास के श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों का शाद करने की परंपरा है। किंतु कुछ ऐसे स्थान हैं जहां पूरे वर्ष पिंडदान करने का महत्व है।

पौराणिक ग्रंथों एवं शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि श्राद्ध का महत्व गया (बिहार) और पेहोवा में है।
पेहोवा में पिंडदान करने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक ही पिंड से तृप्त हुए पितर ब्रह्मलोक में जाते हैं, ऐसा पुराणों में बताया गया है। इस तीर्थ में मृत प्राणियों के कर्मकांड, नारियल बलि, पिंडदान करवाने से उन्हें अक्षय मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जब भी कोई अवगति मृत्यु हो जाती है उसकी सद्गति के लिए लोग देश के कोने कोने से पेहोवा पहुंचकर अपने पितरों की तृप्ति करते हैं।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चैत्र मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि(चैत्र चौदस) को सभी पितृ और हमारे जितने भी पूर्वज होते हैं वह सभी और सभी देवता पृथूदक पहुंचते हैं और आशा करते हैं कि हमारे परिवार से कोई यहां इस स्थान पर आए और हमारे लिए पिंडदान, तर्पण करके दान करे। ऐसा शास्त्रों में पढ़कर और विद्वानों से सुनकर देश-विदेश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां इस दिन आते हैं।वे प्राची सरोवर में स्नान करके अपने पितरों की अक्षय तृप्ति के लिए तिलकुट का पिंडदान करते हैं। इसे ‘प्रेत मोचणी’ चतुर्दशी भी कहते हैं। इस दिन इस सरोवर में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को अश्वमेघ यज्ञ का फल और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

पेहोवा में अपने पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान की परंपरा युगो-युगांतरों से चली आ रही है।

महाभारत युद्ध में जितने भी वीर योद्धा मारे गए उनकी आत्मा भटक रही थी। युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से पूछा कि हम युद्ध तो जीत गए और हस्तिनापुर का राजपाट भी मिल गया। लेकिन मन में शांति नहीं है। मन बहुत परेशान रहता है आत्मा विचलित रहती है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा की इस युद्ध में जो मृत्यु को प्राप्त हुए हैं सभी मुक्ति को प्राप्त कर चुके हैं पर उनकी सद्गति एवं आत्मा की शांति का कार्य करवाओ।

भगवान श्री कृष्ण युधिष्ठिर एवं अन्य पांडवों को अपने साथ पृथूदक तीर्थ में सरस्वती नदी के तट पर लेकर आए और युद्ध में मारे गए उन सभी मृत आत्माओं की शांति एवं तृप्ति के लिए पिंडदान एवं तर्पण आदि करवाए। उसके बाद से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।

पेहोवा में सरस्वती नदी पूर्व दिशा में होकर बहती थी। शास्त्रों में कहा गया है इस स्थान पर दान पुण्य एवं तप करने पर तेरह गुना फल मिलता है।

भगवान शंकर ने चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भूत प्रेत एवं पिशाचों को दिव्य लोक प्रदान किया था और राक्षसों ने भी स्नान करने से मोक्ष को प्राप्त किया था। इसी से इस तिथि को पिशाच मोचन चौदस कहा जाता है।

त्रेता युग में भगवान श्री राम इस स्थान पर आए थे और उन्होंने अपने पिता महाराजा दशरथ का श्राद्ध इस पावन धरा पर किया था। भगवान श्रीराम ने फल्गु (फरल) तीर्थ में भी पिंडदान करवाया था।

इस तीर्थ की पावन धरा पर सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी आए। उन्होंने यहां धर्म का प्रचार किया। यहां जिस स्थान पर गुरु नानक देव जी ठहरे थे उस स्थान का नाम बावली साहब है। जहां विशाल गुरुद्वारा बना हुआ है।

यहां ९वीं पातशाही गुरु तेग बहादुर जी एवं १०वीं पातशाही गुरु गोविंद सिंह जी भी स्वयं पेहोवा तीर्थ में आए हैं। उन्होंने यहां पवित्र सरोवर में स्नान करके पिंडदान किए। इनकी स्मृति में सरस्वती तट पर गुरुद्वारा साहिब बना हुआ है।

सिख गुरुओं के बाद महाराजा रणजीत सिंह जी इस तीर्थ स्थान पर अपनी माता का कर्मकांड करवाने के लिए आए थे।

यह देवभूमि प्राचीन काल से मृत आत्माओं की सद्गति एवं शांति के लिए शास्त्रों व पुराणों में वर्णित रही है। आज भी हजारों-लाखों यात्री दूर-दूर से अपने पितरों की तृप्ति के लिए इस तीर्थ पर श्राद्ध करने के लिए आते हैं।

यहां श्राद्धदेव का मंदिर भी है। पेहोवा में स्थित दशनामी डेरा में धर्मराज जी के मंदिर में आज भी श्राद्धदेव जी की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। महाभारत काल में सरस्वती नदी के तट पर श्राद्धदेव जी महाराज का मंदिर था। जिसका वर्णन भागवत पुराण के दशम स्कंध के बीच में विदुर जी की तीर्थ यात्रा वर्णन में मिलता है। यहां श्राद्धदेव के रूप में यमराज उपस्थित रहते हैं। पिहोवा तीर्थ पर पिंडदान का ‘गयाजी’ से भी अधिक महत्व है। मात्र पेहोवा में ही श्राद्धदेव जी की पूजा होती है।

चैत्र चौदस मेले के अवसर पर पेहोवा को खूब सजाया जाता है और यहां विशाल मेला लगता है। जिसमें भारत के विभिन्न हिस्सों से लाखों की संख्या में धर्मनिष्ठ श्रद्धालु आकर पृथूदक में स्नान कर पितरों को पिंडदान करते हैं।

इस तीर्थ का जहां इतना महत्व है वहीं पर यहां के पंडे और पुरोहितों का भी काफी महत्व है। यहां के तीर्थ पुरोहितों के पास हजारों वर्ष पुराने विभिन्न जातियों के उनके पूर्वजों की वंशावलियों के नाम से संबंधित पुराने रिकॉर्ड मिलते हैं। जो समय-समय पर यहां इस तीर्थ स्थान पर पिंडदान करने के लिए आते रहे। पेहोवा के पंडों के पास बही या पोथी के रूप में कई प्राचीन अभिलेख रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित हैं। यहां के पुरोहितों के पास उन पुराने रिकॉर्ड को देखा जा सकता हैं। पुरोहितों के द्वारा उनके पास आए यात्रियों को उनकी वंशावली बताई जाती है एवं उनके पूर्वजों के द्वारा पुरोहितों की बहियों में किए हुए हस्ताक्षर दिखाए जाते हैं। भविष्य के लिए उनके आने का प्रयोजन, परिवार के सभी सदस्यों के नाम लिखकर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त प्राचीन राजा-महाराजाओं के द्वारा अपने मंत्रियों एवं कुल पुरोहितों के द्वारा भेजे गए दान का भी वर्णन इन पुराने रिकार्डो में मिलता है। इन रिकार्डों को देख कर पता चलता है कि पुरोहितों को कई बार दान में पूरा गांव ही दे दिया जाता था।

पुरोहितों के पास गुरु नानक देव, गुरु रामदास, गुरु अर्जुन देव, गुरु हरगोविंद राय की वंशावली भी लिखी हुई है।इतना ही नहीं महाराजा रंणजीत सिंह के परिवार का लेखा-जोखा भी इनकी बहियों में सुरक्षित है।

पेहोवा तीर्थ के अंतर्गत अनेक अन्य तीर्थ जैसे ब्रह्मयोनि तीर्थ,अवकी‌र्ण तीर्थ,अरुणा तीर्थ,प्राची तीर्थ,हरिश्रवा तीर्थ,मधुवा तीर्थ आते हैं।

इन तीर्थों के अलावा यहां श्री कृष्ण मंदिर, श्री सरस्वती मंदिर, पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर, बाला सुंदरी मंदिर, हनुमान जी का मंदिर तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत से मंदिर हैं।

चैत्र चौदस मेले के अवसर पर यहां दर्शन करने के लिए बड़े-बड़े धार्मिकनेता व बड़े-बड़े राजनीतिक और भारत के कोने-कोने से हजारों साधु-संत भी आते हैं।

पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और आजादी से पहले पाकिस्तान के रहने वाले आज जहां कहीं भी भारत में रह रहे हैं उन सारे इलाके के लोग इस अवसर पर यहां पहुंचते हैं।

चैत्र चतुर्दशी जिसे पिशाच मोचनी चतुर्दशी भी कहते हैं लाखों श्रद्धालु इस दिन यहां अपने पूर्वजों की सद्गति के लिए पिंडदान करते हैं। अपने पूर्वजों से आशीर्वाद और अपने घर परिवार की सुख समृद्धि के लिए यहां पिंडदान और दान पुण्य करते हैं।
श्रद्धालु अपने पितरों की तृप्ति के लिए इस स्थान पर स्थित प्राचीन पीपल के पेड़, जिसे प्रेत पीपल कहा जाता है जल चढ़ाते हैं।

यह धार्मिक मेला हिंदुओं एवं सिखों की एकता का प्रतीक माना जाता है। इस मेले में सबसे अधिक सिख ही शामिल होते हैं। जो भारत के दूरदराज के कोने कौन है से यहां आते हैं।

राज्य सरकार की ओर से मेले के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। जिसमें विभिन्न प्रांतों से आए हुए कलाकार अपनी कला को प्रस्तुत करते हैं।

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