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मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत) के 100 कि.मी. के दायरे में गंगा यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** गाजियाबाद जनपद
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** मुरादनगर  –

* मुरादगाजी की दरगाह

मुरादनगर के संस्थापक कहे जाने वाले मोहम्मद मुराद गाजी रहमतुल्ला अले की दरगाह पर हर साल उर्स मुबारक मेला लगता है।
 
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*** बिजनौर जनपद
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** चंदक –

* महल वाले पीर

चंद्र क्षेत्र के गांव फतेहपुर के पास महलवाले पीर (बादशाह सलीम) की मजार है। इस मजार पर हर जुम्मेरात के दिन सभी वर्गों के लोग मन्नतें मांगने आते हैं।
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** बिसौली  –

* बाबा खानकाह  –  हाजी मशरूर खां की मजार
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** नजीबाबाद –

* नवाब नजीबुद्दौला और उसकी पत्नी की कब्र स्थित मकबरा –

नवाब नजीबुद्दौला के बसाए शहर नजीबाबाद में उसका व उसकी पत्नी की कब्र स्थित मकबरा हर वर्ग के लोगों का
आस्था का केंद्र है। यहां पर हर गुरुवार को अकीदत मंद नतमस्तक होकर खुशहाली की मन्नत मांगते हैं।
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*** मेरठ़ जनपद

** फलावदा कस्बा -(मवाना तहसील)

* कुतुबशाह जमालुद्दीन की मजार

फलावदा कस्बे के कुतुबशाह जलालुद्दीन की याद में कई सौ सालों से लगने वाले ऐतिहासिक सालाना उर्स मुबारक पर बड़ी संख्या में अकीदतमंद आते हैं। कुतुबशाह की मजार पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु चादर चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं।

कुतुबशाह जमालुद्दीन ने बचपन से ही कई जन भलाई के कार्य करके अपने वली होने के सबूत दे दिए थे। कहते हैं कि कुतुबशाह के वली होने का सबूत तो तब दिखाई दे गया था, जब एक अमन के दुश्मन जादूगर के द्वारा रमजान के पाक महीने में ईद से 2 दिन पहले 28 शब को उसने अपने जादू से आसमान में चांद दिखा दिया था। इलाके की जनता 28 शब का चांद को देखने के बाद काफी परेशानी में आ गई थी, लेकिन कुतुबशाह की दुआओं से वह चांद आसमान से नीचे गिर गया था।

कहते हैं कुतुबशाह के मजार के पास बांसों पर चावल की पैदावार होने लगी थी। बांस पर लगने वाले चावलों को किसी महिला ने बेच दिया था, तब से बांसों पर चावल की पैदावार होनी बंद हो गई थी।

कुतुबशाह की मजार के आसपास स्थित जमीन पर बेर, जामुन, आम, अमरूद, इमली,आदि के बहुत से पेड़ हैं। इन पेड़ों पर लगने वाले फलों को आने जाने वाले श्रद्धालु बिना पैसा दिए लुफ्त उठाते हैं। कहते हैं कुतुब शाह की ऐसी दुआ है कि मजार के पास के पेड़ों पर पैदा होने वाले फलों को अगर कोई बेच देगा तो इन पेड़ों पर फल आने बंद हो जाएंगे।

उर्स मेले में पंखा जुलूस का आयोजन किया जाता है। पंखा जुलूस फलावदा कस्बे के मौहल्ला कानी पट्टी से शुरू होकर मौहल्ला बिश्नोईयान, मैन बाजार, पैठ बाजार से होते हुए कुतुबशाह के मजार पर संपन्न होता है। पंखा जुलूस में बैंड बाजा, पट्टा, पंखा, डीजे आदि आकर्षण का केंद्र रहते हैं। जुलूस में पट्टाबाजी के कलाकार तरह-तरह के प्रदर्शन करते हैं।

कुतुबशाह के मेले में झूला, सर्कस, कुश्ती, बच्चों के खिलौने आदि की दुकानें सजाई जाती हैं। सालाना उर्स मेले में कमेटी की ओर से मुशायरा, कव्वाली मुकाबला, पंखा जुलूस आदि के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
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*** मुजफ्फरनगर जनपद
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** सौरम गांव

* हजरत शाह गरीब की मजार

मुजफ्फरनगर जिले के शाहपुर कस्बे के पास सौरम गांव का गौरवशाली इतिहास रहा है। यह गांव अपने दामन में अनेक बेमिसाल खूबियों को समेटे हुए हैं।

सौरम गांव की पूर्व दिशा में हजरत शाह गरीब और उनके शागिर्द पीर जी की चमत्कारिक मजार है। हजरत शाह गरीब की मजार को लेकर अनेक किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं।

शाहगरीब पीरशाह मजार एक ऐसा धर्मस्थल है जिसके प्रति हर धर्म के मानने वालों की श्रद्धा और आस्था है। लोगों का मानना है कि यदि इस मजार पर सच्चे मन से कोई मन्नत मांगी जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं और यहां के लोगों का मानना है कि इस मजार के बारे में एक कहावत है कि इसे एक ही रात में अदृश्य शक्तियों ने बनाकर तैयार कर दिया था।

बताते हैं कि कई सौ वर्ष पूर्व सौरम गांव में किन्ही अदृश्य शक्तियों ने शाहगरीब पीरशाह मजार को बनाया था। उस समय गांव के बाहर दूर के जंगल में एक बड़ा सा तालाब था जहां कुछ भी निर्माण नहीं किया गया था लेकिन एक रात गुजरने के बाद जब गांव के लोग सुबह सवेरे सो कर उठे तो उन्होंने तालाब वाले स्थान पर एक मजार पर बड़ी सी आलीशान इमारत को खड़े हुए देखा।

यहां के लोग बताते हैं और उनका मानना है कि वे अदृश्य शक्तियां पूरी रात मजार पर इमारत का निर्माण कार्य करती रही लेकिन तड़के भोर के समय उन्होंने किसी महिला के द्वारा चक्की पर कुछ पीसने की आवाज सुनी और वह अदृश्य शक्तियां गायब हो गई। इस प्रकार इस मजार पर कुछ स्थान पर निर्माण का कार्य बाकी रह गया।

सुबह के समय जब गांव वालों ने मजार की इमारत को देखा तो वे हतप्रभ रह गए तुरंत ही यह खबर आसपास के गांवों में फैल गई। सौरम गांव के अलावा आसपास के गांव के लोग भी यहां इकट्ठा हो गए और वे आश्चर्यचकित थे कि वे ऐसी कौन सी अदृश्य शक्तियां थी जिन्होंने एक ही रात में इतनी भव्य इमारत का निर्माण कर डाला।

इस मजार की इमारत का निर्माण बहुत ही कलात्मक शैली में किया गया है। मजार की इमारत की दीवारें पत्थर पर खूबसूरत नक्काशी करके बनाई गई हैं। बड़ी कलात्मकता शानदार नक्काशी करके ऊंची-ऊंची मीनारें बनाई गई हैं। मजार के मुख्य दरवाजे को भी बड़ी सुंदरता से बनाया गया है। इसे देखने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि इस मजार को एक ही रात में बनाया गया था। इमारत के अधूरे रह गए कार्य को बाद में श्रद्धालुओं के द्वारा पूरा कराया गया।

बताने वाले यह भी कहते हैं किस मजार में वह शक्ति है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है और यहां से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता है।

इस मजार पर मुराद में हत्था (झाड़ू) व सीरनी प्रसाद बोलने से खटमल, कलीली जम जूं व शरीर पर होने वाले सभी प्रकार के अनगिनत मस्से अपने आप ही दूर हो जाते हैं।

मजार पर मुस्लिमों से ज्यादा हिंदू समाज के लोग आते हैं। आसपास के गांवों से भी जब किसी के भी खेती, व्यापार तथा अन्य बाधा आने पर मजार पर चादर चढ़ाते हैं।

यहां के लोग बताते हैं कि इस गांव में लड़के की शादी में घुड़चढ़ी मजार से होकर जाती है। यहां के ग्रामीणों का मानना है कि शाहगरीब को मनाए बगैर गांव में शादी ठीक-ठाक तरह से संपन्न नहीं हो सकती।

हजरत शाह गरीब के बारे में बताया जाता है कि ये इराक के बगदाद शहर में अब्बासियों के खानदान में पैदा हुए थे। इब्राहिम बचपन में हिंसक प्रवृत्ति के होने के कारण यह रोजाना शिकार खेलते थे कि एक दिन शिकार खेलते हुए इन्होंने एक गर्भवती हिरणी को तीर मारा। तीर लगने से घायल तड़पती हुई उस हिरनी को इन्होंने चीर कर देखा तो उसकी कोख में पल रहे दो बच्चे भी तड़प तड़प कर मर गए। इब्राहिम के दिल पर हिरनी और उसकी कोख में पल रहे दो बच्चों के मरने से बहुत गहरा आघात लगा। इसी घटना से इब्राहिम के दिल में घर बार छोड़ने इच्छा घर कर गई। एक रात अपने को अल्लाह की इबादत में लगाने के लिए इन्होंने अपना घर परिवार और बगदाद को छोड़ दिया।

इब्राहिम ने बगदाद से ईरान और अफगानिस्तान में रहकर अल्लाह की इबादत की और कई बार हज करने के लिए मक्का मदीना गए। वहां पर इन्होंने कुफेका भी देखा। कुफा वह स्थान जहां पर हजरत अली के बेटे मजीद को बुला कर मार डाला गया था। इब्राहिम को ईरान और अफगानिस्तान में रहकर वह अंदर की शांति नहीं मिली जिसको वे चाहते थे। उसी अंदर की शांति की खोज में घूमते हुए ये हिंदुस्तान आ गए।

हिंदुस्तान आकर साधु-संतों और फकीरों की संगत में रहकर पीर पैगंबरों और हिंदुओं के पवित्र स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, अयोध्या, काशी, मथुरा आदि का भ्रमण भी इन्होंने किया।

यहां के साधु-संतों और फकीरों का बहुत गहरा प्रभाव इनके दिल पर पड़ा। ईश्वर भक्ति और अल्लाह की इबादत से इब्राहिम हजरत शाहगरीब कहलाने लगे थे।

बाद में आप सौरम गांव की पूरब दिशा में स्थित बौद्धों के पवित्र स्थान पर आकर रहने लगे। जिस समय हजरत गरीब शाह सौरम गांव में रहने के लिए आए उस समय यहां वन (बनी) में एक जोगी रहते थे। जिनकी सिद्धियों के आगे यहां के सभी लोग नतमस्तक होते थे। अल्लाह की इबादत करते-करते हजरत शाह गरीब का ईल्म भी बहुत ऊंचे दर्जे का हो गया था।

कहते हैं कि एक दिन जोगी तथा हजरत शाहगरीब के बीच हो रही बातचीत में जोगी ने हजरत शाह गरीब से कहा कि तुम सूखे पेड़ के नीचे क्यों बैठे हो, इस पर हजरत शाहगरीब ने जोगी से कहा कि नजर उठा कर देखो पेड़ हरा-भरा है और उस पर फल भी लगे हुए हैं। इस घटना की और शाहगरीब की शक्तियों की जानकारी आसपास के गांवों में भी फैल गई।

ऐसा भी बताया जाता है कि एक बार यहां के जंगल में चरवाहे गायों को चरा रहे थे। हजरत शाहगरीब भी उसी स्थान पर बैठे हुए थे। उन्होंने एक गाय को हाथ के इशारे से बुलाया तो उस गाय ने अपना दूध स्वयं हजरत शाह को पिलाया। उन चरवाहों ने यह देखा तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उन चरवाहों ने गांव में जाकर बताया कि गांव के जंगल में कोई पहुंचे हुए फकीर आए हुए हैं। चरवाहों की बात सुनकर गांव वाले हजरत शाहगरीब को देखने के लिए आने लगे। हजरत शाहगरीब यहां की बौद्ध कालीन भव्य एवं पवित्र इमारत में रहने लगे।

इस इमारत के बारे में क्षेत्र के लोग बताते हैं कि यह भव्य इमारत हजारों वर्षों पहले देवों द्वारा एक रात में बनाई गई थी। यह बौद्ध कालीन इमारत बहुत ही भव्य व कलात्मकता से बनाई गई है।

हजरत शाहगरीब अल्लाह की इबादत के साथ-साथ ईश्वर की भक्ति में गायत्री का जाप भी किया करते थे। हजरत शाहगरीब ईद उल फितर के अवसर पर 1 माह तक के धर्म सम्मेलन को बुलाते थे। सम्मेलन में धर्म चर्चा के साथ-साथ अल्लाह के प्रति इबादत और ईश्वर के प्रति हिंदू साधु संतों से यज्ञ करवाते थे। 1 माह तक चलने वाले इस सम्मेलन में भारी संख्या में लोग एकत्रित होते थे। परंपरा के अनुसार यह मेला आज भी जोर शोर से भरता चला आ रहा है।

इस पवित्र स्थान के दर्शनों के लिए देश विदेश से लोग आते हैं और यहां मन्नतें मांगते हैं। मन्नतें पूरी होने के बाद श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाते हैं। इमारत में हजरत शाहगरीब और उनके गुजरे शागिर्द की समाधि आज भी मौजूद है जिसे देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु लोग पूजते हैं।
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** पुरकाजी –

* बंदगीशाह अली अहमद की दरगाह

पुरकाजी कस्बे में नेशनल हाईवे पर ही पीर बंदगीशाह अली अहमद की दरगाह है। इस दरगाह पर हर जुम्मेरात (बृहस्पतिवार) के दिन लोग जियारत करके मन्नत मांगते हैं। मान्यता है कि इनके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं जाता है।

बताते हैं कि 700 साल से भी पहले अली अहमद पुरकाजी कस्बे के ईदगाह पर आकर इबादत करने लगे थे। पुरकाजी के लोग इन्हें पीर बंदगीशाह के नाम से जानते थे। कहा जाता है कि ये पास के ही कस्बे मंगलौर के रहने वाले थे।

इनके बारे में एक किस्सा सुनाया जाता है कि एक बार कुम्हार अपने गधों पर शक्कर (खाण्ड) भरकर कहीं ले जा रहे थे। रास्ते में बाबा बंदगी शाह ने उस कुम्हार से पूछा कि भाई क्या ले जा रहे हो। इस पर कुम्हारों ने झूठ बोल दिया और बताया कि बाबा रेत ले जा रहे हैं।

कुम्हारों ने घर जाकर देखा तो उन्हें पता चला की बोरो में तो रेता ही भरा है। वह रोते हुए बाबा के पास आए और पूरा वाक्य बता कर उन्होंने कहा कि बाबा हमने आपसे झूठ बोला था। बाबा ने उनसे कहा कि इस रेते को जोहड़ में फेंक दो और उसके पास से ही मिट्टी भर लो। कुम्हारों ने बाबा कहे अनुसार ही किया और घर जाकर देखा तो बोरों में खांड (शक्कर) ही भरी थी। उस समय से ही इस जोहड़ का नाम ‘खांड्या’ पड़ गया।

बाबा का जब इंतकाल हो गया तब मंगलौर कस्बे के बहुत से लोग यहां आए और बाबा के जनाजे को मंगलौर ले जाने की जिद करने लगे। पुरकाजी के लोगों ने ऐसा करने से मना कर दिया। तब मंगलौर के लोग कफन में पुराल को भरकर और एक पुतले के रूप में सीकर मंगलौर ले गए। जब मंगलौर के लोग उस पुराल से भरे पुतले रूपी जनाजे को दफनाने लगे। उस समय किसी व्यक्ति ने जनाजे का मुंह खोल दिया तब बाबा बंदगीशाह का शव भी वहां मौजूद मिला। यह देख कर सब लोग आश्चर्यचकित रह गए। तभी से इनके प्रति लोगों की श्रद्धा और भी अधिक बढ़ गई।

मंगलौर में भी बाबा बंदगी साहब की एक दरगाह है।

बाबा बंदगीशाह की दरगाह को समाज के सभी लोग मानते हैं तथा प्रत्येक जुम्मेरात (बृहस्पतिवार) के दिन समाज के सभी वर्गों के लोग यहां प्रसाद चढ़ाने आते हैं।

हर साल सब्बेरात पर रोशनी भरी जाती है। मेले का आयोजन होता है। लोगों का विश्वास है कि सच्चे दिल से यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।
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** बुढ़ाना कस्बा

* हजरत पीरशाह विलायत की मजार –

बुढ़ाना कस्बे में कांधला मुजफ्फरनगर रोड पर पीरशाह विलायत की मजार है। जिनकी याद में हर साल उर्स के मौके पर मेला लगता है।

बताया जाता है कि सैकड़ों साल पहले यहां के राजा बुडढन राव के साथ पीर शाह विलायत का युद्ध हुआ था जिसमें वह शहीद हो गए थे। उनके साथ ही उनका घोड़ा व संदेशवाहक कबूतर भी मारा गया। जहां वे शहीद हुए थे वही उनका, उनके घोड़े व कबूतर का मजार बनवा दिया गया था।

उनकी याद में यहां सैकड़ों वर्ष पुरानी मजार स्थित है। इस मजार पर श्रद्धालु मन्नते मांगते हैं और चादर चढ़ाते हैं।
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* बुढ़ाना कस्बा में मुजफ्फरनगर मेरठ-करनाल हाईवे पर भसाना पीर स्थित है। श्रद्धालु यहां पर प्रसाद चढ़ाते हैं।
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** खेड़ा मस्तान गांव (बुढ़ाना कस्बा)

* मस्तानशाह की मजार –

मुगलों के जमाने में मस्तान शाह के नाम पर बसे खेड़ा मस्तान गांव का महत्व और उसकी प्रसिद्धि पुराने समय से आज भी ज्यों की त्यों है।

शामली-बुढ़ाना मार्ग के बीच में सड़क से करीब 2 फर्लांग की दूरी पर मुगलकालीन खेड़ा मस्तान गांव बसा हुआ है इस गांव की अपनी अलग पहचान है।

इस गांव का नाम खेड़ा मस्तान कब और क्यों पड़ा इसकी एक अलग कहानी है। कहते हैं कि मुगल खानदान के आलमगीर नामक बादशाह के वंशज मस्तान शाह बचपन से ही वैरागी प्रवृत्ति के थे। उनकी शाही ठाठ-बाट और सत्ता में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

वैरागी प्रवृत्ति के होने के कारण वह मुल्ला-मौलवियों व साधु-महात्माओं की संगत में रहते थे। बाद में वे दिल्ली के बादशाही ठाट-बाट को छोड़कर पिरान कलियर आकर रहने लगे थे। यहां वे अपना सारा समय इबादत में लगाते थे। लेकिन मस्तान शाह ज्यादा दिनों तक पिरान कलियर में नहीं रहे और बाद में पटना-पटनी पहुंच गए। इस समय तक उन्हें काफी सिद्धियां प्राप्त हो चुकी थी।

जिस समय वह पटना-पटनी में थे, वहां उन्होंने एक बेऔलाद महिला को कुछ जड़ी-बूटी और भभूत देकर मातृत्व सुख प्राप्त होने का आशीर्वाद दिया। उनके आशीर्वाद से उस महिला के दो लड़के हुए, उनमें से एक लड़के को उसने मस्तान शाह को दे दिया। आगे चलकर वह लड़का मस्तान शाह का शिष्य अलमस्त के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मस्तान शाह बाद में अपने शिष्य के साथ पटना-पटनी को छोड़कर यहां पास ही की खरड़ की जूड़ में आ गए और फिर उसी स्थान पर धूनी रमा कर इबादत करने में लीन हो गए। लेकिन वे इस स्थान पर भी अधिक दिन नहीं रहे और पड़ोस के ही गांव भोगल खेड़ा में एक तालाब के किनारे बड़े झाड़ के पास इबादतगाह बनाकर इबादत करने लगे।

भोगल खेड़ा गांव में वे दीन दुखियों का दुख दूर करने के काम में लग गए। इसी दौरान की बात है कि दिल्ली बादशाह का गुलाम अब्दुल कादिर उधर से गुजरा और वह मस्तान शाह को सलाम किए बिना ही वहां से निकलने लगा। उसका घोड़ा चार कदम आगे जाने के बाद ही गिर पड़ा। गुलाम अब्दुल कादिर को फकीर का ध्यान आया और वह मस्तान शाह के पैरों में जाकर गिर पड़ा।

अब्दुल कादिर ने बादशाह से सिफारिश करके 3 गांव भोगलखेड़ा, करौदा व फुगाना मस्तानशाह के नाम से वसीयत करा दिए। आगे चलकर बाद में केवल भोगलखेड़ा गांव ही इनके नाम पर रह गया। आज भी इस गांव की सरकारी मालगुजारी का पैसा मस्तानशाह के खाते में जाता है।

गूगल खेड़ा गांव में मस्तान शाह ने अपना शरीर छोड़ा था। अंग्रेजी शासनकाल में उस समय के यहां के कलक्टर आर. मिल्टन व्हाइट मस्तान शाह की प्रसिद्धि से प्रभावित हुए और उन्होंने यहां कुछ मन्नतें मांगी। उनकी मन्नते पूरी हो गई। कहते हैं कि एक दुर्घटना के बाद यह कलक्टर बाबा के भक्त हो गए थे। मिस्टर व्हाइट ने सन 1928 में उनकी कब्रगाह पर एक बहुत भव्य इमारत को बनवाया और उसके परिसर के बीच में मस्तानशाह का मकबरा बनवाया। पुरानी इमारत के मुख्य द्वार पर इनके नाम का पत्थर आज भी पुरानी याद दिला देता है। मकबरे की इमारत के एक तरफ मस्जिद का निर्माण कराया गया है।
मस्तानशाह के शरीर पूरा करने के बाद भोगलखेड़ा गांव का नाम ही मस्तान शाह के नाम पर खेड़ा मस्तान पड़ गया।

मकबरे के ऊपर लगाए गए सफेद पत्थर इस बात की गवाही देते हैं कि इस इमारत का निर्माण मि. व्हाइट ने ही करवाया था। इस ऐतिहासिक धरोहर का इस क्षेत्र में विशेष स्थान है।

– पीर बाबा मस्तानशाह का उर्स

पीर बाबा मस्तान शाह के सालाना उर्स का आयोजन हर साल किया जाता है। जिसमें दूरदराज से आए हजारों श्रद्धालु तथा क्षेत्र के ग्रामीण प्रसाद चढ़ाकर तथा माथा टेक कर मन्नतें मांगते हैं। मान्यता है कि पीर बाबा सबकी सहायता करते हैं तथा मन्नते पूरी करते हैं।

यह मेला प्रतिवर्ष बकरीद के 18 दिन बाद लगता है। तीन दिवसीय मेला चांद की 28 तारीख की छोटी रोशनी, 29 तारीख की बड़ी रोशनी तथा 30 तारीख को मेले का समापन हो जाता है।

सालाना उर्स में बड़ी रोशनी के दिन प्रातः काल से ही पीर बाबा मस्तानशाह के मजार पर प्रसाद चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। गांव तथा आस-पास के देहातों के ग्रामीण बाबा के मजार पर देसी घी का चूरमा एवं सरसों के तेल का दीपक जला कर मन्नतें मांगते हैं। वही मुस्लिम श्रद्धालु बाबा के मजार में फातिहा पढ़कर दुआएं मांगते हैं।

सालाना उर्स मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद हर वर्ष पहले से अधिक बढ़ती जाती है।
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** बिहारगढ़ – (मोरना)

* आला हजरत खुशहाल मियां की चिल्लागाह –

मोरना कस्बे से गांव बिहारगढ़ के गांव से सटे जंगल में हजरत बाबा पीर खुशहाल मियां की मजार पर सालाना उर्स का आयोजन किया जाता है। सालाना उर्स में देश के कोने कोने हरियाणा, महाराष्ट्र, मुंबई, मेरठ दिल्ली आदि से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं।

उर्स के दौरान बाबा की शान में कव्वाल अपने कलाम पेश करते हैं।इस अवसर पर विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है।
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** ककरौली गांव

* हजरत इमाम महबूब सब्जवारी की मजार –

हजरत सब्जवारी की मजार पर पंखा चढ़ाने की परंपरा है। सन1957 से चली आ रही इस परंपरा में नागरिक शौकिया तौर पर हजरत महमूद सब्जवारी साहब की मजार पर पंखा चढ़ाते हैं। इस परंपरा में यहां के 20-25 घरों से पंखों को सजा- सजा कर हजरत इमाम साहब की मजार पर चढ़ाया जाता है। पंखा चढ़ाने वाले घर-घर पहुंचकर हजरत इमाम की याद में कव्वाली गजलें व नज्में पढ़ते हैं। बैंड बाजों के साथ बाद में पंखों को एक-एक करके उठाया जाता है। सुबह से शुरू हुआ यह सिलसिला शाम तक जारी रहता है। बाद में पंखों को इकट्ठा करके जुलूस के रूप में कस्बे के मुख्य बाजार से होता हुआ बीती शाम हजरत महबूद सब्जवारी साहब की मजार पर पहुंचकर श्रद्धा के साथ इन पंखों को चढ़ाया जाता है।

पंखों के जुलूस में विभिन्न स्थानों पानीपत, जलालाबाद नकुड, गंगोह आदि जगहों के अखाड़ों के नवयुवकों के द्वारा आकर्षक पट्टेबाजी का प्रदर्शन किया जाता है।
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** कैथोड़ा गांव

* लतीफ शाह की मजार –

कैथोडा गांव में लतीफ साहब की मजार है। आईने अकबरी में इसका जिक्र है। मुजफ्फरनगर गजेटियर में तत्कालीन आईसीएस विलियम इरविन ने इसे लतीफ शाह की मजार बताया है।
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** कादरी कोठिया गांव

* हजरत इस्माइल शाह का मकबरा –

कला का एक उत्कृष्ट नमूना मुजफ्फरनगर जिले के कादरी कोठिया गांव में 25 वर्षों में बनकर तैयार हुआ हजरत इस्माइल शाह का बहुमंजिला मकबरा। गौर करने वाली बात यह है कि इस मकबरे को गांव के ही राज-मिस्त्रियों ने स्वयं नक्शा बनाकर तैयार किया है।
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** तितावी गांव

* दरगाहे आलिया –

दरगाह ए आलिया के उर्स के अवसर पर मुशायरे का आयोजन किया जाता है।
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** खतौली

* पीर बाबा शेख जलालुद्दीन की मजार –

खतौली रेलवे स्टेशन के पास रेल लाइन वाले पीर बाबा की मशहूर मजार है। हर जुम्मेरात(बृहस्पतिवार)के दिन इस मजार पर चादर चढ़ाने वालों और प्रसाद लेने वालों का तांता लगा रहता है। दूर-दराज के लोग यहां आकर मन्नतें मांगते हैं।

बाबा की मजार को अंग्रेजी सरकार भी हटा नहीं सकी थी और थकहार कर हुकूमत को झुकना पड़ा था।

यह मजार दो रेलवे लाइनों के बीच में बनी हुई है। इस दौरान कई ट्रेनें मजार की अगल-बगल की रेलवे लाइनों से धड़धड़ाती हुई गुजर जाती हैं। यहां से गुजरने वाली ट्रेनों के चालक भी पीर बाबा के सामने सिर झुकाते हैं।

जिस स्थान पर आज खतौली रेलवे स्टेशन बना है कहते हैं क‌ई सौ साल पहले बाबा शेख जमालुद्दीन ने इस स्थान को अपनी कर्म स्थली बना लिया था। यहीं बाबा लोगों को नेकी और इंसानियत का पाठ पढ़ाते थे। बाबा का शरीर पूरा होने पर लोगों ने उन्हें यही सुपुर्देखाक कर कच्ची मजार बनाई थी। पास में ही उनके नाम से बसा गांव शेखपुरा स्थित है।

ब्रिटिश काल में सन1860 में जब यहां रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी तो पीर बाबा की मजार मुख्य रेलवे ट्रैक के सामने आ गई। रेलवे के अंग्रेज इंजीनियरों ने बाबा की मजार को हटाकर उस स्थान पर रेलवे लाइन बिछा दी। कहा जाता है कि बाद में जब यहां से ट्रेन गुजारी गई तो वह ट्रेन मजार स्थल से आगे जा ही नहीं सकी। रेलवे के इंजीनियरों ने बहुत कोशिश की बाद में पस्त अंग्रेजों को मुख्य ट्रैक के बगल में उसी स्थान पर पीर बाबा की मजार बनानी पड़ी। तब से लेकर आज तक यह मजार यहीं पर स्थित है कुछ ही वर्षों पहले मजार का जीर्णोद्धार कर पक्का बनवा दिया गया था।
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*** हरिद्वार जनपद (उत्तराखंड)
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** रुड़की

प्रसिद्ध सूफी संत हजरत शाह रुकूनुद्दीन रहमतुल्ला इलाही का सालाना उर्स मनाया जाता है। सालाना उर्स के अवसर पर एक शानदार ऑल इंडिया मुशायरा का आयोजन भी किया जाता है।
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** भगवानपुर कस्बे के निकट के गांव मंसूरशाह में कई सौ साल पुराना दरगाह पीर है। यहां सालाना उर्स के अवसर पर दूर-दूर के लोग मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। यह स्थान मंसूरशाह के पास घने जंगल में स्थित है।
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*** करनाल जनपद (हरियाणा)
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** इन्द्री

हजरत इलाही बू-अली शाह कलंदर साहिब की इंद्री दरगाह पर सालाना उर्स मुबारक व भंडारे का अगाज दरगाह शरीफ पर दरगाह कमेटी की ओर से चादर पेश करने के बाद होता है।सालाना उर्स मुबारक 2 दिन तक जारी रहता है।
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