__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र. – भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद में नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर ‘पर्वतों की रानी- मसूरी’ भारत का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। पर्वतीय सैरगाहों में विशेष स्थान रखने वाली यह सुंदर नगरी देश की राजधानी दिल्ली के सबसे समीप स्थित है और पर्यटक इसकी ओर खींचे चले आते हैं।

प्रकृति ने अपनी सारी सुंदरता मसूरी को प्रदान की है। हरे-भरे और ऊंचे-नीचे मैदान, टेढ़े-मेढे रास्ते, दूर तक फैला नीला गगन, बर्फ से लक-दक ऊंची पहाड़ियां, मंद-मंद बहते शीतल हवा के झोंके सब कुछ तो है यहां।

पर्यटक यहां आते हैं तो उनके मन में मसूरी के रमणीय प्राक‌तिक झरनों-जैसे कैम्पटी फॉल, मौसी फॉल,टाईगर फॉल और हिमालय की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों की उठती-गिरती ढ़लानों को और यहां के दूर तक फैले बांज,चीड़ और देवदार के पेड़ों व फूल-पौधों को देखने का अनुभव करने की लालसा होती है।

सन 1827 में अंग्रेज सेना के एक अधिकारी कैप्टन यंग शिकार खेलने के दौरान जब इस स्थान पर पहली बार आए तो उन्हें यहां का नैसर्गिक सौंदर्य, यहां की जलवायु आदि इतनी पसंद आई कि उन्होंने उसे अपना नगर, अपना घर बना लिया और उसे हर तरह से सुंदर और मनोरम बनाने का प्रयास किया।

मसूरी, देहरादून से 36 कि.मी. दूर समुद्रतल से लगभग 2005 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ों पर बसी हुई खूबसूरत नगरी है। मसूरी पहुंचने के लिए कहीं से भी आएं, देहरादून उतरना पड़ता है। देहरादून से मसूरी तक का मार्ग ही अपने आप में आनंद प्रदान करता है। धनुषाकार और हेयर पिन बैंडस की तरह घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए सिनरी सरीखे पहाड़ों के लुभावने दृश्य देखने को मिलते हैं। सुंदरता बिखरी पड़ी है,बस उसे नयनों में समेटना है।

गनहिल मसूरी का प्रमुख दर्शनीय स्थान है। यह यहां की 2242 मी. ऊंचाई की सबसे ऊंची चोटी है। यहां पहुंचने के लिए 2 किलोमीटर लंबा पैदल का रास्ता है। इस स्थान से हिमालय पर्वत की बद्रीनाथ, केदारनाथ एवं नंदादेवी गिरि की पर्वत चोटियां नजर आती हैं।

गनहिल पहुंचने पर कुछ पर्यटकों के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि गनहिल में गन क्यों जुड़ा हुआ है जबकि यहां कोई गन तो है ही नहीं। इसके पीछे एक इतिहास जुड़ा है। आज के समय में यहां लन्डौर में जिस स्थान पर घंटाघर की घड़ी समय बताती है, उस जमाने में यहां घड़ी नहीं थी, समय बताने के लिए यहां गनहिल पर एक तोप लगाईं गई थी, जिससे हर एक घंटा होते ही गोला दाग कर समय की सूचना दी जाती थी। गनहिल पर अब कोई गन नहीं है,अब इस स्थान पर ज्यादातर फोटोग्राफरों की दुकाने हैं।

एक ओर लाल टिब्बा की बड़ी पर्वत चोटी है। यह मसूरी से 5 कि.मी. की दूरी पर 2438 मीटर ऊंचे शिखर पर स्थित है। यहां से टेलिस्कोप की सहायता से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों को देखा जा सकता है।

मसूरी नगरी कुलरी बाजार से लाइब्रेरी बाजार तक फैली हुई है। माल रोड की रौनक देखते ही बनती है।

कैमिल बैक रोड़ ट्रैकर्स के लिए पैराडाइज के समान है। इस रोड़ पर घोड़े पर बैठकर घूमने का अलग ही मजा है। कैमिल बैक शायद इसीलिए कहलाती है, क्योंकि यह ऊंट के आकार की है।

कंपनी गार्डन इसे म्युनिसिपल पार्क भी कहते हैं। 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित इस स्थान पर पैदल, रिक्शा या खच्चर के द्वारा भी जाया जा सकता है। यह एक सुंदर पिकनिक स्थल है।

मौसी फॉल मसूरी से 6 कि.मी. दूर बालीगंज के समीप एक नयनाभिराम स्थल है। इस स्थान पर पहाड़ी से झरने के रूप में गिरता हुआ पानी एक नयनाभिराम दृश्य उत्पन्न करता है।

भट्टा फॉल जाने के लिए पैदल तथा खच्चर का मार्ग मात्र साढ़े छह कि. मी. दूरी का है जबकि मोटर से जाने का सड़क मार्ग 13 कि.मी. का है।

झडीपानी स्थान मसूरी से चार कि. मी. की दूरी पर है। अंग्रेजों के समय में नेपाल के महाराजा ने इस स्थान पर अपना महल बनवाया था।

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