_____________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** पार्वती मंदिर – शुकतीर्थ
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पौराणिक तीर्थस्थल शुकतीर्थ में फिरोजपुर मार्ग पर स्थित कई हजार वर्ष प्राचीन महाभारत कालीन पार्वती मंदिर।

शुकतीर्थ में शिव धाम के निकट पश्चिम की ओर पांडवों के समय का माता पार्वती का मंदिर जमीन से निकला है।

बताते हैं कि शुकतीर्थ में रहने वाले एक ज्योतिषाचार्य पंडित अयोध्या प्रसाद मिश्र को रात के समय स्वप्न में पार्वती मंदिर दिखाई देता था। पंडित अयोध्या प्रसाद मिश्र स्वप्न में दिखाई देने वाले पार्वती मंदिर की खोज में जुट गए लेकिन उन्हें कोई सफलता हाथ नहीं लगी।

उसी दौरान इस मंदिर को जमीन के अंदर धंसे हुए सबसे पहले करहेड़ा गांव के कुछ श्रद्धालु व्यक्तियों ने देखा था। वे श्रद्धालु व्यक्ति घूमते हुए इधर आए थे। उन्हें रेतीले टीले में धंसी हुई इस मंदिर की बुर्जी दिखाई दी थी। इसके बाद वहां से मिटटी हटाने का कार्य शुरू किया गया। क‌ई जनों के सहयोग से मंदिर को मिट्टी से बाहर निकाल लिया गया था। मंदिर से पत्थर के चौखट कांच के टुकड़े तथा एक कुइंया भी निकली थी। मंदिर का निर्माण लखोरी ईटों से किया गया था। मंदिर की दीवारों पर प्राचीन काल की शिल्पा कृतियां भी बनी हुई थी। पंडित अयोध्या प्रसाद जी जब वहां पहुंचे तो वह मंदिर उनके स्वप्न में दिखाई देने वाले मंदिर जैसा ही था।

उन्होंने उसी समय मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया। मंदिर के लिए भूमि खरीद कर शीघ्र ही मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्य शुरू कर दिया गया। बाद में इस स्थान पर पूजा अर्चना शुरू कर दी गई थी। यहां पांडव मंदिर, शिव मंदिर, यज्ञशाला, भागवत हाल, गौशाला आदि का निर्माण कराया गया।

इस स्थान पर 72 फुट ऊंची मां बगलामुखी की मूर्ति का निर्माण कराया गया है।

बताया जाता है कि इस पार्वती मंदिर का उल्लेख महाभारत ग्रंथ में भी है। महाभारत काल में कौरवों से जुए में हारने के बाद पांडव वनवास का समय बिताने के लिए सबसे पहले यहां पहुंचे थे। उसी समय यहां माता पार्वती ने उन्हें दर्शन देकर समझाया और आश्वासन दिया था की वनवास के बाद तुम्हें तुम्हारा राज्य वापस मिल जाएगा। उस समय युधिष्ठिर ने माता पार्वती से कहा कि मुझे राज्य की चिंता नहीं है, बल्कि मुझे अपने परिवार एवं ऋषि-मुनियों के भोजन की व्यवस्था करने की चिंता है। तब माता पार्वती ने युधिष्ठिर को बताया कि पास ही स्थित गंगा में खड़े होकर सूर्य देव की आराधना करो, भगवान सूर्य देव अवश्य ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करेंगे।

माता पार्वती के कहे अनुसार युधिष्ठिर ने पूरी रात गंगा जी में खड़े होकर सूर्य देव की आराधना की। प्रातः काल के समय सूर्य देव ने प्रसन्न होकर महाराज युधिष्ठिर को अक्षय पात्र भेंट किया। अक्षय पात्र की विशेषता थी कि जिस किसी भी भोजन करने वाले की जो इच्छा होती थी, वही भोजन इस अक्षय पात्र से प्राप्त हो जाता था। तब तक अक्षय पात्र में भोजन समाप्त नहीं होता था जब तक की भोजन कराने वाला स्वयं ही भोजन ने कर ले। महाराज युधिष्ठिर ने सूर्यदेव से प्राप्त वह अक्षय पात्र द्रौपदी को सौंप दिया था।

वनवास के दौरान सूर्य देव ने यहां पांडवों को दर्शन देकर अक्षय पात्र भेंट किया था। उस समय यह क्षेत्र कामयक वन के नाम से जाना जाता था।

*** नीलकंठ महादेव मंदिर –

पार्वती मंदिर के पास ही फिरोजपुर-शुकतीर्थ मार्ग पर प्राचीन नीलकंठ महादेव का मंदिर भी स्थापित है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार यह दोनों मंदिर खुदाई के दौरान ही जमीन से निकले हैं।

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